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रैंकिंग से सोचें आगे

वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स का अपना महत्त्व है। इसलिए उन पर गौर किया जाना चाहिए। लेकिन कृत्रिम ढंग से उनमें दर्जा बढ़ाने की कोशिशें हानिकारक हैं। फिर रैंकिंग्स में उभरने वाली छवि से बंध जाना सही सोच नहीं है।

यह अच्छी खबर है कि क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी है। 500 विश्वविद्यालयों की इस ताजा सूची में भारत की 54 यूनिवर्सिटीज शामिल हुई हैं। इसमें भारत की नुमाइंदगी अब आईआईटी या आईआईएस जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों तक सीमित नहीं रह गई है। बल्कि कई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज, राज्यों के विश्वविद्यालय और केंद्रीय संस्थानों ने भी इसमें जगह बनाई है। हालांकि यह अप्रिय तथ्य अब भी कायम है कि टॉप 100 यूनिवर्सिटीज में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय नहीं है। टॉप 200 में भारत के सिर्फ तीन विश्वविद्यालय ही आए हैं। सबसे ऊपर 118वें स्थान पर आईआईटी दिल्ली आई है।

बहरहाल, शिक्षा संस्थानों के स्तर को जानने के लिए रैंकिंग्स भले एक प्रचलित माध्यम हों, लेकिन इनके आधार पर किसी देश में शिक्षा की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगाना सही नजरिया नहीं होगा। मसलन, क्यूएस रैंकिंग की यह एक बड़ी आलोचना है कि इसमें विश्वविद्यालय की अकादमिक प्रतिष्ठा को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता है। इसका भार 40 प्रतिशत तक है। प्रतिष्ठा मनोगत पैमाना है, जो सर्वेक्षण में शामिल व्यक्तियों की जानकारी एवं पूर्व-धारणाओं से तय होती है। एक अन्य पैमाना विश्वविद्यालय में विदेशी छात्रों की उपस्थिति है। भारतीय विश्वविद्यालय इस पैमाने पर पिछड़ जाते हैं। इसलिए क्यूएस या ऐसी अन्य रैंकिंग्स में भारत की स्थिति अपने-आप में समस्या नहीं है। समस्या यूनिवर्सिटी शिक्षा तक सीमित वर्गों की पहुंच, वास्तविक अनुसंधान पर कम ध्यान, और जाने वाली शिक्षा का रोजगार बाजार से कमजोर संबंध हैं।

इस ओर ध्यान देने के बजाय रैंकिंग में आगे बढ़ने की होड़ का खराब असर यह हुआ है कि विश्वविद्यालयों में प्रति फैकल्टी प्रकाशनों की संख्या बढ़ाने और उन प्रकाशनों का आपस में उद्धरण देने जैसी विकृतियां उभरी हैं। इसलिए आवश्यकता रैंकिंग्स से आगे सोचने की है। इसके लिए उच्च शिक्षा के लिए जीडीपी का अधिक हिस्सा आवंटित करना, शिक्षक-छात्र अनुपात सुधारना और शोध संस्कृति को बढ़ावा देना अनिवार्य है। वैश्विक शोध नेटवर्क से जुड़ने और संकाय आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की भी जरूरत है। रैंकिंग्स को पूरी तरह ठुकराना ठीक नहीं होगा, लेकिन इसमें उभरने वाली छवि से बंध जाना सही सोच नहीं है।

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By NI Editorial

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