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लाचारी जनित निर्ममता

आवारा कुत्तों से बेशक इनसान की सुरक्षा खतरे में पड़ी है। चूंकि इसका कोई संवेदनशील और व्यावहारिक समाधान सामने नहीं है, अतः कोर्ट एक विवादास्पद निर्णय पर पहुंचा है। एक तरह से यह लाचारी जनित फैसला है।

सर्वोच्च न्यायालय ने रेबीज या किसी अन्य गंभीर रोगों से ग्रस्त आवारा कुत्तों को मार डालने का रास्ता साफ कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने दो टूक कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर लोगों- विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। पिछले अगस्त में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की बेंच ने दिल्ली-एनसीआर से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। बाद में नवंबर में कोर्ट ने इस आदेश को और स्पष्ट किया था। कई एनजीओ और डॉग लवर्स ने इस आदेश को चुनौती दी। उन पर सुनवाई के बाद अब अदालत “सार्वजनिक सुरक्षा के हित में” अपने निर्णय पर कायम रही है।

कोर्ट ने साफ किया है कि रिहाइशी इलाकों, आम सड़कों, और शहरों के खुले स्थलों पर ये फैसला लागू नहीं होगा। जबकि अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, धार्मिक स्थल और पर्यटन स्थल जैसी सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाना होगा। ऐसा करना नगर निकाय और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी होगी। मारने के पहले यह प्रमाणित करना अनिवार्य होगा कि कुत्ता रेबीज ग्रस्त या खतरनाक है। बहरहाल, तय की गई शर्तों और सुप्रीम कोर्ट की भावना के अनुरूप ही इस आदेश का पालन होगा, इसको लेकर वाजिब अंदेशे मौजूद हैं।

आशंका यह है कि नगर अधिकारी कुत्तों को हटाने के बजाय उन्हें मार डालने का सहज रास्ता अपना सकते हैं। दरअसल, ये समस्या खड़ी ही इसलिए हुई है, क्योंकि शहरों के अनियंत्रित विस्तार से वहां तमाम तरह की व्यवस्थाएं चरमराती चली गई हैं। आवारा कुत्तों या अन्य पशुओं को सार्वजनिक स्थलों से दूर रखने की व्यवस्था होती, तो आज जैसी समस्या नहीं आती। कुत्तों को बेलगाम छोड़ देने से बेशक इनसान की सुरक्षा खतरे में पड़ी है। इससे सार्वजनिक स्थलों पर एक तरह का भय देखा जाता है। चूंकि इसका कोई संवेदनशील और व्यावहारिक समाधान सामने नहीं है, अतः कोर्ट इस विवादास्पद निर्णय पर पहुंचा है। एक तरह से यह लाचारी जनित फैसला है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमें आज इस तरह की कई लाचारियां के बीच जीना पड़ रहा है।

By NI Editorial

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