राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

टूटा-फूटा अमेरिकन ड्रीम

भारतीय मूल के 40 फीसदी अमेरिकी नागरिकों के मन में पिछले साल कभी ना कभी अमेरिका से चले जाने का भाव आया। ताजा राजनीतिक एवं आर्थिक स्थितियों तथा सामाजिक दबावों के कारण ऐसे हालात बने हैं।

किसी तरह अमेरिका पहुंच जाना भारतीय मध्य वर्ग का सपना रहा है। अगर वहां बसने का इंतजाम भी हो जाए, तो इसे सौभाग्य की पराकाष्ठा ही समझा जाता रहा है। मगर अब हालात ऐसे हैं कि ऐसे ‘सौभाग्यशाली’ तकरीबन 40 फीसदी लोगों के मन में पिछले साल कभी ना कभी अमेरिका से कहीं और चले जाने का भाव आया! थिंक टैंक कारनेगी एंडॉवमेंट की ताजा अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका की मौजूदा राजनीतिक एवं आर्थिक स्थितियों तथा सामाजिक दबावों के कारण ऐसे हालात बने हैं, जिनमें भारतीय मूल के अमेरिकियों को वहां रहना मुफीद नहीं लग रहा है। भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की संख्या तकरीबन 52 लाख है।

अध्ययन से बात सामने यह आई कि इस समुदाय के एक बड़े हिस्से में हाल में असंतोष तेजी से बढ़ा है। जिन लोगों के मन में अमेरिका से चले जाने की बात आई, उनमें से 54 प्रतिशत ने उसका कारण बढ़ती जा रही महंगाई को बताया। 41 प्रतिशत लोगों ने लोगों ने कहा कि अपनी निजी सुरक्षा को लेकर उनकी चिंता बढ़ती जा रही है। इन हालात के लिए लगभग साठ प्रतिशत लोगों ने अमेरिकी राजनीति में आए मोड़ को दोषी बताया। कोरोना काल के बाद से अमेरिकी आवाम पर मंहगाई की मार तेज होती गई है। सीबीएस टीवी चैनल के एक ताजा सर्वे में 70 फीसदी से ज्यादा अमेरिकियों ने कहा कि उनके लिए भोजन, आवास और चिकित्सा का खर्च उठाना कठिन हो गया है।

इसके बीच भारतीय समुदाय के लिए डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने मुश्किलें और बढ़ाई हैं। वीजा और ग्रीन कार्ड पाना अब पहले जितना आसान नहीं रहा। इसके लिए अर्जियों की लंबी कतार लगी हुई है। नतीजतन, अपने परिजनों को अमेरिका बुलाना बेहद मुश्किल हो गया है। सोशल मीडिया पर नफरती अभियानों का असर अलग है, जिससे भारतीय समुदाय की मनोदशा प्रभावित हुई है। विडंबना है कि अपनी नाक तले बदतर हो रहे हालात को नजरअंदाज कर ट्रंप भारत को नरक बताने का दुस्साहस अक्सर दिखा जाते हैं। जबकि असलियत में अपनी नीतियों से अमेरिकन ड्रीम को दुःस्वप्न बना डालने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है।

By NI Editorial

The Nayaindia editorial desk offers a platform for thought-provoking opinions, featuring news and articles rooted in the unique perspectives of its authors.

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

two × four =