ट्रंप की नीतियों ने विभिन्न देशों को नए साथी और नए अवसर ढूंढने के लिए मजबूर किया है। जब अमेरिका ने अपने साथ सम्मानजनक ढंग से कारोबार के रास्ते बंद कर दिए हैं, तो लाजिमी है, देश नए विकल्प की तलाश करेंगे।
भारत और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति बनने की खबर आते ही अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ईयू को आगाह कि वह अपने खिलाफ युद्ध के लिए धन मुहैया कराने जा रहा है। कहा कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीद कर उसे व्यापारिक सहारा देता है। यूरोप रूस के हमले की आशंका से पीड़ित है, लेकिन अब वह भारत को लाभ पहुंचाने जा रहा है। इसके पहले कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने चीन से व्यापार समझौता किया, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भड़क गए।
अपने चिर-परिचित अंदाज में कार्नी के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कनाडा पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी है। मगर अब कार्नी ने मार्च में भारत आने का इरादा जता दिया है। इसी बीच ट्रंप दक्षिण कोरिया पर भी खफा हो गए हैं और उस पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने इस महीने के पहले हफ्ते में चीन की यात्रा की थी। उनके बाद स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाय पार्लेलिन भी चीन गए और अब अगले मंगलवार को ब्रिटिश प्रधानमंत्री कियर स्टार्मर बीजिंग पहुंच रहे हैं। इस यात्रा से ठीक पहले ब्रिटिश सरकार ने लंदन में चीन के प्रस्तावित भव्य दूतावास के निर्माण को हरी झंडी दे दी, जिसे कई साल से रोक रखा गया था।
उपरोक्त तमाम घटनाओं में एक समान तत्व की तलाश की जा सकती है। खुद ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने विभिन्न देशों को नए साथी ढूंढने और नए अवसर तलाशने के लिए मजबूर किया है। जब अमेरिका ने अपने साथ सम्मानजनक ढंग से कारोबार के रास्ते बंद कर दिए हैं, तो लाजिमी है, विभिन्न देश नए विकल्प की तलाश करेंगे। लेकिन ऐसी हर घटना से ट्रंप की महत्त्वाकांक्षा पर आघात पहुंचता है। उससे व्यग्र होकर ट्रंप उग्र प्रतिक्रिया जताते हैं। लेकिन उससे वे विपरीत संदेश दुनिया को दे रहे हैं। हर विवेकशील देश इससे सोचने को मजबूर हो रहा है कि जब हर डील ट्रंप का भविष्य ट्रंप के मूड से जुड़ा है, तो आखिर उसके लिए कितनी हांव-पांव मारी जाए?


