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अपनी सफलता पर प्रहार

यूपीआई

यूपीआई के जरिए 2000 रुपये से अधिक के भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट तय कर नरेंद्र मोदी सरकार ने वह रास्ता खोला है, जिससे आगे चलकर यह माध्यम आम कारोबार में आकर्षक नहीं रह जाएगा।

तकनीक की दुनिया में भारत की जिस एक सफलता को दुनिया भर में सराहा गया है, वह यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) है। लोगों की जिंदगी आसान बनाने की कसौटी पर यह वित्तीय तकनीक (फिनटेक) खरी उतरी है। मगर अब खुद भारत सरकार ने इसकी राह में रुकावटें खड़ी करने की शुरुआत कर दी है। 2000 रुपये से अधिक के भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) तय कर नरेंद्र मोदी सरकार ने वह रास्ता खोला है, जिससे आगे चलकर यह माध्यम आम कारोबार में आकर्षक नहीं रह जाएगा। यही बात भारत के अपने कार्ड नेटवर्क रुपे पर भी लागू होती है। फिलहाल, 2000 रु. से अधिक के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर/ भुगतान शुल्क तय हुआ है।

यह सिर्फ कहने की बात है कि एमडीआर का भुगतान खरीदारों को नहीं, बल्कि विक्रेताओं को करना होगा। क्रेडिट कार्ड के पुराने तजुर्बे के आधार पर यह कहने का आधार है कि अनेक स्थानों पर शुल्क भुगतान का बोझ उपभोक्ता को भी साझा करना होगा। इससे भी आपत्तिजनक पहलू यह शिकायत है कि ये कदम अमेरिका के दबाव में उठाया गया है। अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने कई रिपोर्टों में जीरो-एमडीआर और रुपे नेटवर्क को बढ़ावा देने की भारतीय नीति को को ‘व्यापार बाधा’ बताया था। डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन विभिन्न देशों पर डिजिटल पेमेंट्स में अमेरिकी कंपनियों के लिए रास्ता सुगम बनाने के लिए दबाव डालता रहा है।

यूपीआई जैसे ही ब्राजील के पिक्स पेमेंट सिस्टम, तथा इंडोनेशिया और वियतनाम के घरेलू पेमेंट नेटवर्कों पर भी इसी तरह की आपत्तियां उसने उठाई हैं। यह भी गौरतलब है कि यूपीआई पेमेंट्स का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी कंपनियों के ऐप- फोनपे, गूगलपे, अमेजन आदि के जरिए होता है। अब 2000 रुपये से ज्यादा के हर भुगतान पर वसूले गए शुल्क में इन कंपनियों को 20 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। इससे उनका बाजार भाव बढ़ेगा। अपना आईपीओ लाने की तैयारी में जुटे वॉलमार्ट के फोनपे के लिए यह अच्छी खबर है। साथ ही यूपीआई से अमेरिकी कंपनियों वीजा और मास्टरकार्ड के लिए आई चुनौती भी हटेगी। इसीलिए भारत के राष्ट्रीय नजरिए से ताजा निर्णय को आत्म-प्रहार समझा गया है।

By NI Editorial

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