वेदांता कंपनी के बिजली संयंत्र में बॉयलर फटने से कम-से-कम 14 मजदूर मारे गए और 30 से ज्यादा कर्मचारी घायल हो गए। अनुमान लगाया जा सकता है कि ये खबर मीडिया में महज एक दिन की सुर्खी बन कर रह जाएगी।
भारत सरकार की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस नीति किस तरह मजदूरों के लिए ईज ऑफ डाइंग की दुर्भाग्यपूर्ण सूरत में तब्दील हो गई है, उसकी एक ताजा मिसाल छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में हुआ हादसा है। सिंघीतराई में स्थित वेदांता कंपनी के बिजली संयंत्र में मंगलवार को बॉयलर फटने से कम-से-कम 14 मजदूरों की मौत हो गई और 30 से ज्यादा कर्मचारी घायल हो गए। अनुमान लगाया जा सकता है कि ये खबर मीडिया में महज एक दिन की सुर्खी बन कर रह जाएगी। ना तो नीति-निर्माता, ना मीडिया कर्मी और ना ही सामाजिक कार्यकर्ता ये सवाल उठाने की जरूरत महसूस करेंगे कि आखिर ऐसी औद्योगिक दुर्घटनाओं की संख्या हाल के वर्षों में क्यों बढ़ती चली गई है?
सिर्फ 2026 पर नज़र डालें, तो अब तक कारखानों में कम-से-कम ऐसे सात बड़े हादसे हुए हैं, जिनमें मजदूरों की जान गई है। ये दुर्घटनाएं छत्तीसगढ़ से लेकर मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, और आंध्र प्रदेश तक में हुईं। बीते हफ्ते तेलंगाना में एक रासायनिक कारखाने में भीषण विस्फोट हुआ, हालांकि उसमें किसी जान नहीं गई। हलकी आग, छत गिरने या गैस लीक होने जैसी ऐसी घटनाओं की सूची तो लंबी है, जिनमें हताहत होने वाले मजदूरों की संख्या सीमित रहती है। सिर्फ छत्तीसगढ़ में 2024 से 2026 में अब तक औद्योगिक हादसों में 296 मजदूरों की जान गई है।
एक अध्ययन के मुताबिक देश में हर रोज औसतन तीन श्रमिकों की जान औद्योगिक हादसों में जाती है। इनमें से ज्यादातर मामलों को मामूली मुआवजा देकर निपटा दिया जाता है। मगर हादसों की जड़ में जाने और उसके लिए प्रबंधन को जवाबदेह बनाने की चर्चा शायद ही कभी सुनने को मिलती हो। कानून की किताब में ऐसे प्रावधान हों भी, तो ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के जमाने पर उन्हें गंभीरता से लेने का चलन नहीं रहा। स्पष्टतः कारोबार में ये आसानी श्रमिकों की कीमत पर है। अतः याद रखना चाहिए कि ऐसी कारोबारी आसानी से निवेशकों को मुनाफा बढ़ाने में भले आसानी होती हो, उससे फूलता- फलता उपभोक्ता बाजार तैयार नहीं हो सकता। ना ही ये कारोबारी संस्कृति आम खुशहाली का आधार बन सकती है।
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