राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

अधिकार के मूल में

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि भारत में समस्या अधिकारों का अभाव नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि अधिकारों का सार्थक ढंग से उपभोग किया जा सके। भारत की जमीनी हकीकत से परिचित लोग सहज ही इस राय से इस्तेफ़ाक रखेंगे।

अधिकारों पर जारी बहस के बीच प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत ने यह महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है कि ‘जिस अधिकार का व्यवहार में उपभोग ना किया जा सके, वह कागजी वायदे के ज्यादा कुछ नहीं है।’ उन्होंने कहा कि भारत में समस्या अधिकारों का अभाव नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि अधिकारों का सार्थक ढंग से उपयोग किया जा सके। भारत की जमीनी हकीकत से परिचित लोग सहज ही प्रधान न्यायाधीश की इस राय से इस्तेफ़ाक रखेंगे। बेशक, अपने देश में नागरिकों के लिए संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों की लंबी सूची है। मगर ये कड़वी हकीकत है कि अधिकांश नागरिकों के लिए वे अधिकार ज्यादा मायने नहीं रखते।

मसलन, जिन नागरिकों को उपयुक्त शिक्षा-दीक्षा और ऐसी परिस्थितियां प्राप्त नहीं हुईं, जिनसे वे राजकाज एवं सार्वजनिक मुद्दों पर कुछ कहने योग्य विचार विकसित कर पाएं, उनके लिए अभिव्यक्ति की आजादी महज ऐसा गहना है, जिसे वे कभी पहन नहीं पाते। फिर आसपास भयमुक्त वातावरण ना हो, तो उनके इस अधिकार के लिए खतरा सिर्फ सरकार के फरमानों से नहीं, बल्कि स्थानीय सामाजिक- आर्थिक ढांचे से भी पैदा होता है। जस्टिस कांत ने भी कहा कि भौगोलिक स्थितियों, इन्फ्रास्ट्रक्चर संबंधी कमियों और आर्थिक बाधाओं के कारण बड़ी संख्या में लोग अदालत और उन संस्थाओं के पास नहीं पहुंच पाते, जिनका मकसद उनके अधिकारों की रक्षा है।

सार यह कि अधिकारों का विमर्श तभी अपनी मंजिल तक पहुंचेगा, जब अधिकारों के उपभोग की परिस्थितियों को चर्चा में शामिल किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं होता, क्योंकि अधिकारों के हनन की सारी बहस सभ्रांत वर्ग के दायरे में सिमटी रहती है। संभवतः यही कारण है कि “नागिरक अधिकारों पर हमले” और “संविधान बचाओ” जैसी बातें आम जन मानस को नहीं छू पातीं। जो तबके ऐसे अधिकारों से वंचित हैं, उनमें वोट की ताकत उन हकों की रक्षा करने का जज्बा गायब रहता है। उलटे नकदी ट्रांसफर की योजनाएं उन्हें लुभा लेती हैं, क्योंकि उनसे भले ही सीमित, लेकिन वास्तविक फायदा उन्हें मिलता है। अतः जस्टिस कांत की टिप्पणियों को उनकी सही भावना में देखा जाना चाहिए। ऐसा करना अधिकारों को उनके असल संदर्भ में देखना होगा।

Tags :

By NI Editorial

The Nayaindia editorial desk offers a platform for thought-provoking opinions, featuring news and articles rooted in the unique perspectives of its authors.

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

4 × one =