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क्वॉड बस औपचारिकता है?

अब चूंकि चीन की घेराबंदी अमेरिका की तात्कालिक प्राथमिकता नहीं है, तो जाहिर है, इस मकसद के लिए बने समूह भी उसकी प्राथमिकता सूची में नीचे चले गए हैँ। क्वॉड इसी परिवर्तन का शिकार बना है।

भारत में क्वाड्रैंगुलर सिक्युरिटी डॉयलॉग (क्वॉड) का शिखर सम्मेलन होना था, लेकिन महज विदेश मंत्रियों की बैठक से ये औपचारिकता निभाई जा रही है। भारत को 2025 की मेजबानी मिली थी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पूरे साल इसके लिए समय नहीं निकाल पाए। अब 2026 में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने नई दिल्ली आने का वक्त निकाला है, तो चार देशों के इस समूह की बैठक संभव हो पाई है। रुबियो के बयानों से साफ है कि भारत में उनका ज्यादा ध्यान द्विपक्षीय मसलों पर केंद्रित है।

आने से पहले उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत को उसकी जरूरत के मुताबिक तेल बेचने को तैयार है। साथ ही भारत अब वेनेजुएला से ज्यादा तेल खरीदेगा। इस वर्ष जनवरी में वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले और वहां के राष्ट्रपति निकलस मदुरो के अपहरण के बाद से वहां के तेल का कारोबार अमेरिकी कंपनियां ही कर रही हैं। वैसे रुबियो उन कंपनियों के लिए सौदे की तलाश को क्वॉड के एजेंडे से ज्यादा अहमियत दे रहे हैं, तो उसकी पृष्ठभूमि स्पष्ट है। क्वॉड स्पष्टतः चीन को घेरने की अमेरिकी रणनीति के तहत उस समय बना, जब अमेरिका की यही भू-राजनीतिक प्राथमिकता थी। जबकि अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप प्रशासन ने अलग रणनीति अपनाई है। उसने पहले पश्चिमी गोलार्द्ध पर अमेरिकी वर्चस्व कायम करने की रणनीति अपनाई है।

इसी समझ के तहत हाल में ट्रंप अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान चीन के साथ ‘रणनीतिक स्थिरता उन्मुख रचनात्मक संबंध’ के प्रस्ताव पर सहमत हो गए। अब चूंकि चीन विरोधी घेराबंदी अमेरिका की तात्कालिक प्राथमिकता नहीं है, तो जाहिर है, इस मकसद के लिए बने समूह भी उसकी प्राथमिकता सूची में नीचे चले गए हैँ। मगर अमेरिका के इस नीति- परिवर्तन से भारत, जापान, और ऑस्ट्रेलिया की चुनौतियां बढ़ी हैं। क्वॉड एक कारण था, जिससे इन देशों का चीन से तनाव बढ़ा। तब इन देशों ने अमेरिकी सुरक्षा रणनीति पर भरोसा कर अपना बड़ा दांव लगाया। मगर अब अमेरिका अपने “सहयोगियों” की चिंताओं को सिरे से नजरअंदाज कर रहा है। ट्रंप का ना आना इसकी मिसाल था। रुबियो की यात्रा भी उसी बात की पुष्टि कर रही है।

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By NI Editorial

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