याद करें 14 मई 2014 से पहले के समय को! तब हवा में, लोगों की सांसों में, उम्मीदों में क्या कुछ था? उमंग थी, उम्मीदें थीं, ‘अच्छे दिनों’ की आहट थी। हिंदू कोई हो, वह भारत का अवसर आया बूझ रहा था। मानों हिंदुओं का कलियुग खत्म होने वाला है, सतयुग आ रहा है। काला धन, काली अर्थव्यवस्था खत्म होगी। भारत शक्तिमान बनेगा। आत्मनिर्भर होगा। तब भारत को स्वच्छ भी बनना था, स्मार्ट होना था, स्मार्ट शहर बनने थे और नई पीढ़ी का अमृतकाल बस आया!
मैं भी तब अवसर की ऐसी ही उम्मीदों में था।
पर मैं संभवत: अब उन चुनिंदा लोगों में हूं, जिसने कई दफा प्रत्यक्षत: लाइव भारत के अवसर को आता समझा। उस बात को पचास साल होने वाले हैं, जब 1977 में दिल्ली के जंतर-मंतर रोड के जनता पार्टी दफ्तर (कांग्रेस, फिर संगठन कांग्रेस का मूल मुख्यालय) में सुरेंद्र मोहन, लालकृष्ण आडवाणी की प्रेस कॉन्फ्रेंस तथा डुप्ले रोड पर मोरारजी देसाई के घर की उस भीड़ में मैं था जब सभी एक भाव परिवर्तन की आस में थे। चुनाव नतीजों के दिन कस्तूरबा गांधी मार्ग में हिंदुस्तान टाइम्स की बिल्डिंग के बाहर ज्योंहि राजनारायण से इंदिरा गांधी के पीछे होने की खबर आई थी तो भीड़ उछल पड़ी थी। उसमें मैंने भी जन मूड देख सोचा यह तो क्रांति है।
दिल्ली में तब पहली बार एक गैर-कांग्रेस केंद्र सरकार बनी थी। 19 महीने जेलों में रहे सच्चरित्र नेता प्रधानमंत्री और मंत्री बने। तब देश-दुनिया में भारत को लेकर जो उम्मीद की थी, वह अभूतपूर्व थी। आज उसकी कल्पना भी संभव नहीं है।
बावजूद इसके मोरारजी सरकार के अवसर से क्या हुआ? मौका जाया हुआ। लोगों ने अपने को छला महसूस किया। मतलब शासन करना और देश बनाना इन लोगों के बस की बात नहीं है। इसी बात पर इंदिरा गांधी छल-कपट की राजनीति करके वापस प्रधानमंत्री बनीं। जिसका त्रासद सत्य है कि शासन कर सकने की समर्थता की हवा से सत्ता में लौटी इंदिरा गांधी का तब पंजाब, कश्मीर, उत्तर-पूर्व राज्यों में वह कुशासन था, जिससे अलगाववाद फैला। ऑपरेशन ब्लूस्टार हुआ। भारत की प्रधानमंत्री अपने ही घर में गोलियों से छलनी हुईं।
फिर देश ने (मैंने भी) युवा राजीव गांधी से उम्मीद की। उन्होंने लोकसभा चुनाव में 415 सीट जीतने का वह रिकॉर्ड बनाया, जो आज तक नहीं टूटा है। संजय गांधी के कंट्रास्ट में राजीव गांधी भले और चाल-चेहरे-चरित्र में खरा युवा नायक थे। आधुनिकता, नई पीढ़ी, संचार-कंप्यूटर और भारत की पहचान में राजीव गांधी और उनकी दून मंडली ने वे प्रयोग किए, जिनकी यदि मोदी के बारह वर्षों के प्रयोगों से तुलना करें तो नई वास्तविकता उभरेगी। सोचें, विश्व में भारत की संस्कृति की पहचान के नाते बारह वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या किया है? मोदी ने देशों में जाकर भक्त प्रवासी भारतीयों की भीड़ इकट्ठी कराई। उनसे अपने लिए नगाड़े, भंगड़ा, कथक, नाच-गाना कराया। ताकि विदेशियों को लगे कि देखो वे कैसे हिंदुओं के विश्वगुरु! जबकि राजीव गांधी के समय में क्या था? उन्होंने विश्व राजधानियों में ‘फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ करवाए। भारत को अलग सांस्कृतिक क्षेत्रों में बांटा। और देश में संस्कृति की उत्सवता के आयोजन कराए। लोगों को सांस्कृतिक तौर पर चेतन किया। टीवी पर ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’, ‘चाणक्य’ दिखलवाया। वही आज मोदी और उनके आईपीएस अफसर क्या कर रहे है? अपनी धुरंधरी दिखलाकर अपनी मार्केटिंग कर रहे हैं। राजीव ने रामजी और कृष्णजी की कथाएं दिखलाईं, मोदी-डोवाल अपने को दिखा रहे हैं!
बात शुरू हुई तो बता दूं कि नेहरू, इंदिरा और राजीव से लेकर मनमोहन सिंह के समय तक विश्व में भारत की साख, लोकतांत्रिकता की धाक इसलिए भी थी क्योंकि भारत के ये प्रधानमंत्री वैश्विक पत्रकारों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जवाब देते थे। राजीव गांधी ने वाशिंगटन में नेशनल प्रेस क्लब में पत्रकारों को वे जवाब दिए, जिन्हें सुन दुनिया हतप्रभ थी। किसी पत्रकार का उनसे पाकिस्तान, खालिस्तान पर सवाल था तो राजीव गांधी ने तपाक से ध्यान दिलाया कि महाराजा रणजीत सिंह की राजधानी लाहौर थी। पाकिस्तान बिलबिला गया।
पर राजीव गांधी का समय भी धोखा था। कांग्रेस को दलालों से मुक्त करते-करते वे खुद दलालों-विभीषणों में फंसे। बोफोर्स हल्ला हुआ और वीपी सिंह ने लोगों के बीच जाकर कहा, “मेरी जेब में वह कागज है, जिसमें विदेशी बैंक का वह अकाउंट नंबर है, जिसमें बोफोर्स की दलाली का पैसा जमा हुआ है”!
तब देश (मैं भी) वीपी सिंह के पीछे दौड़ा। यह सोच कि राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है। और लोगों की उम्मीदों से फकीर सचमुच प्रधानमंत्री बना। उस समय की दिल्ली के जो गवाह हैं, वे सब जानते हैं कि मैंने ‘जनसत्ता’ में अपने कॉलम, लेख, रिपोर्टिंग सबमें फकीर से उम्मीदों में वैसी ही तूताड़ी बजाई, जैसे 2014 से पहले नरेंद्र मोदी के लिए अपने कॉलम, अपने ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम और इसी ‘नया इंडिया’ अखबार में बजाई थी!
वीपी सिंह से स्वच्छ, भ्रष्टाचार-मुक्त भारत होने का अवसर था। सभी ने सोचा ऐसा होगा। सभी को उम्मीद थी। मगर प्रधानमंत्री पद पाते ही फकीर सत्ता का ऐसा लोभी, भूखा बना कि उससे समझ बनी कि सत्ता में रहना है तो समाज को बांटो और राज पक्का बनाओ। शरद यादव, रामविलास, लालू यादव ने वीपी सिंह को चने की झाड़ पर चढ़ाया। मंडल आरक्षण की वह तुरुप चली जो वीपी सिंह और भारत दोनों के अवसर में सेल्फगोल था।
तुरंत कमंडल यानी हिंदू राजनीति रथ लेकर सड़कों पर उतर आई। कश्मीर घाटी से हिंदू भागे। वहीं पंजाब, उत्तर-पूर्व में अशांति, अर्थव्यवस्था, विदेशी मुद्रा कोष आदि सब कुछ बेकाबू!
कोई न माने इस बात को, लेकिन उसके बाद पीवी नरसिंह राव यदि नहीं आते तो भारत की भारी दुर्दशा होती। नरसिंह राव ने बतौर संकटमोचक सब संभाला। वे बिना उम्मीदों वाले प्रधानमंत्री थे। पर उन्होंने समय का उपयोग किया और वह किया, जिससे नई 21वीं सदी की राह, आगे की संभावना (आईटी, उदारीकरण, भूमंडलीकरण, परमाणु शक्ति, निवेश, भारतीयों के लिए विदेश में असर आदि) के खिड़की-दरवाजे खुले!
उनके आगे न देवगौड़ा, न आई. के. गुजराल का समय उम्मीदों का था और न अटल बिहारी वाजपेयी या डॉ. मनमोहन सिंह का समय लोगों के मनोभावों में उम्मीदों-अवसरों का था।
उस नाते मई 2014 में ही सिर्फ घर-घर उम्मीदों का विश्वास था। मतलब नरेंद्र मोदी आएंगे तो युग बदलेगा। वह भारत की नई आजादी होगी। स्वाभाविक था। आखिर 90 वर्षों से हिंदू राजनीति (रामराज्य परिषद, हिंदू महासभा, जनसंघ, भाजपा, आरएसएस से लेकर बाल ठाकरे की शिव सेना, सावरकर से बलराज मधोक सभी) हिंदू अवसर के सपनों से ही कई पीढ़ियों को खपाते हुए थी। मतलब मुगलों, मैकाले के मानस पुत्रों से भारत को कब मुक्ति मिलेगी और कब पृथ्वीराज चौहान के बाद लाल किले पर कोई खांटी हिंदू बतौर प्रधानमंत्री भाषण करेगा। ध्यान रहे, स्वंयसेवकों की इस हिंदू राजनीति में नेहरू से वाजपेयी सभी मैकाले की शिक्षा की पैदाइश थे। नेहरू यदि अंग्रेजों के मानस पुत्र थे तो वाजपेयी नेहरू के मानस उत्तराधिकारी।
सो, मई 2014 का समय भारत का वह मौका, वह अवसर था, जो अमृतकाल, रजतकाल, स्वर्णकाल, विकसित काल सभी के उदय की मानो नई सुबह!
अब बारह साल बाद आज क्या भारत है? भारत की क्या आबोहवा है? कल अमेरिका के विदेश मंत्री दिल्ली में थे। उन्होंने कहा, “मैं यह भाषण छोटा रखना चाहता हूं क्योंकि यहां बहुत गर्मी है। मैं मयामी से आता हूं और वहां भी बहुत उमस व गर्मी होती है, लेकिन यहां की गर्मी तो अलग ही है!” कल ही एक और खबर थी, कॉकरोच जनता पार्टी अकाउंट के संस्थापक अभिजीत दीपके ने बताया, “सरकार ने हमारी वेबसाइट बंद कर दी है। सरकार कॉकरोच से क्यों इतनी डरी हुई है?”
सोचें, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद के भारत की मौजूदा आबोहवा पर? अच्छे दिन हैं या बुरे? 2014 के समय में पैदा हुए मौके में सत्ताखोर परजीवी, आश्रित, भय-भूख-भक्ति की गुलामी में जकड़े लोग तथा क्रोनी सेठ जरूर अपने दिन फिर गए हुए मानें, लेकिन उस आम भारतीय की क्या दशा है, जिसने ‘अच्छे दिनों’ की आस में नरेंद्र मोदी को जीताया था।
भारत का आज कैसा हैं? कैसी गर्मी, हवा, पानी, मिट्टी, शिक्षा, चिकित्सा, भीड़ और भीड़ की बुद्धि है? इन बारह वर्षों में भारत सत्य, विवेक, चरित्र, नैतिकता, चाल-चेहरा, चरित्र सब गंवा बैठा है। मेरी तुलना मैकाले बनाम संघ शिक्षा, बुद्धि बनाम लाठी शिक्षा से नहीं है, बल्कि व्यक्तियों के चेहरों और देश की 140 करोड़ आबादी की दशा-दिशा से है, जो 2014 से पहले क्या थी और आज क्या है। 2014 से पहले भारत की पहचान में मनुष्य थे। आज कॉकरोच हैं। हिंदू बनाम मुसलमान भी है। बेचारा मध्यवर्ग है तो गरीब-गुरबों की लाभार्थी यानी परजीवी जिंदगी भी है।
2014 से पहले भारत की जनता न कॉकरोच थी, न कॉकरोच कहलाना पसंद करती थी। तब भारत का सुप्रीम कोर्ट गणतंत्र के नागरिक को ‘कॉकरोच’ नहीं कहता था। तब मय दस्तावेजों के 27 लाख मतदाताओं के नरसंहार की चुनाव आयोग में हिम्मत नहीं थी। तब भारत में व्यवस्था इतनी संवेदनशील थी कि यदि विश्व समुदाय दक्षिण एशिया को जलवायु परिवर्तन का भावी नरक बता रहा है तो उसे समझा जाए, न कि आज जैसे सरकार उलटे कोयले की नई खानें चालू करवा दे। हवा को और प्रदूषित करे। वह जलवायु को हर तरह से और बिगाड़ने, गर्मी के वैश्विक रिकॉर्ड बनवाने के काम करे।
लब्बोलुआब? भारत अभिशप्त है। कलियुगी हिंदुओं को श्राप है कि वे झूठ में ही जिएं। ‘नरककुंड’ में जिएं मगर उसे स्वर्ग मानें! कौम न स्वतंत्र, निर्भयी, आत्मनिर्भर हो सकती है, न वह सत्य और झूठ में भेद कर सकती है। उसे परजीविता यानी कॉकरोच का जीवन जीते रहना है। तभी आज का अजब सत्य है जो भारत गणतंत्र में कॉकरोच उर्फ गणों पर भी बात कहने की पाबंदी है। भारत के कॉकरोच बोल भी नहीं सकते। क्या यह सब मई 2014 की उम्मीदों में था? मगर दोष मोदी का ही नहीं है। भारत के हिंदुओं के अभिशाप का है।


