अध्ययन के दौरान 26 राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों की लगभग 400 ग्राम पंचायतों में करीब 7,800 लोगों के बीच सर्वेक्षण हुआ। उससे सामने आया कि ग्राम सभा की बैठकों लोगों की मौजूदगी घटती चली गई है।
केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय की एक ताजा रिपोर्ट का सार है कि ग्रामीण इलाकों में पंचायती राज व्यवस्था नाकाम होने के कगार पर है। रिपोर्ट- राज्य/ केंद्र शासित प्रदेशों में ग्राम सभाओं में निम्न भागीदारी- शीर्षक से जारी हुई है। कहा गया है कि यह अध्ययन स्थानीय स्व-शासन पर देश के सबसे बड़े जमीनी आकलनों में से एक है। इसके तहत 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की लगभग 400 ग्राम पंचायतों में करीब 7,800 लोगों के बीच सर्वेक्षण किया गया। इससे सामने आया कि ग्राम सभा की बैठकों लोगों की मौजूदगी लगातार घटती चली गई है। आधे से ज्यादा लोगों ने कहा कि बैठकों में शामिल न होने की वजह रोजगार और कमाई से जुड़ी हैं। कामकाजी वर्ग के लिए काम-धंधा छोड़कर बैठक में आना कठिन होता है।
फिर बैठकों में स्थानीय रसूखदार लोगों का ही दबदबा बना रहता है। रिपोर्ट में जिक्र है कि ग्राम सभाएं स्थानीय मुद्दों की पहचान करने में लगभग 13 प्रतिशत समय लगाती हैं, लेकिन राजस्व बढ़ाने के उपायों पर केवल चार फीसदी समय खर्च करती हैं। चूंकि केंद्रीय अनुदान से मिलने वाला पैसा काफी हद तक पहले से तय केंद्रीय प्राथमिकताओं (जैसे जल जीवन मिशन) से जुड़ा होता है, इसलिए स्थानीय जरूरतों के मुताबिक योजना पर अमल लगभग नामुमकिन ही बना रहता है। इस रूप में पंचायती राज संस्थाएं केंद्र और राज्य सरकारों की एजेंसी बन कर रह गई हैं। जबकि 73वें और 74वें संविधान में परिकल्पना उन्हें शासन के तीसरे स्तर के रूप में स्थापित करने की गई थी।
वैसे, यह आरंभ में ही स्पष्ट हो गया था कि पंचायती संस्थाओं के लिए वित्त आयोग से तय अपना बजट और अपनी नौकरशाही नहीं होगी, तो उनका यही हाल होगा। फिर भी इस ओर कोई पहल नहीं हुई। इस सिलसिले में अक्सर उल्लेख होता है कि अमेरिका जैसी पूंजीवादी और चीन जैसी समाजवादी व्यवस्थाओं में एकमात्र समानता शासन का कारगर विकेंद्रीकरण है। दोनों जगहों पर इस नीति के सकारात्मक परिणाम जग-जाहिर हैं। मगर भारत में केंद्र हो या राज्य, अपने अधिकार क्षेत्र में कटौती के लिए तैयार नहीं हैं। नतीजा, ताजा रिपोर्ट में शामिल विलाप है।
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