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पिछली बार से कम

भारत हांगझाउ की सफलताओं को कायम रखते हुए नई स्पर्धाओं में आगे बढ़ता, तो इस बार वह तीसरे स्थान के लिए दक्षिण कोरिया से होड़ कर सकता था, जिसने 39 गोल्ड के साथ डेढ़ सौ पदक जीते हैं।

एशियाड के आखिरी दो दिन में प्रभावशाली प्रदर्शन के साथ भारत पदक तालिका में चौथे नंबर पर पहुंच गया। 21 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 85 मेडल हासिल करना अपने-आप में बहुत निराशाजनक प्रदर्शन नहीं है, लेकिन तीन साल पहले चीन के हांगझोउ में हुए एशियाड में भारत की अपनी सफलताओं की तुलना में इस बार का प्रदर्शन खासा कमजोर रहा। तब भारत ने 28 स्वर्ण के साथ 107 मेडल जीते थे। दोनों एशियन गेम्स में भारत के प्रदर्शन की तुलना से जाहिर हुआ है कि तब जिन खेलों में भारत ने कामयाबियां हासिल कीं, उनमें से अधिकांश की रक्षा वह इस बार नहीं कर पाया।

जापान के आइची-नगोया में संपन्न हुए 20वें एशियाई खेलों में भारत के लिए सबसे चमकता स्थल तीरंदाजी रही, जिसमें पांच स्वर्ण पदक सहित कुल नौ मेडल हासिल हुए। उसके साथ हॉकी, कबड्डी और क्रिकेट में मिले दो-दो (महिला और पुरुष वर्गों में) स्वर्ण पदकों ने पदक तालिका में सम्मानजनक स्थान दिलाने में खास योगदान किया। लेकिन बैडमिंटन, टेनिस, और स्क्वैश में पूर्ण निराशा हाथ लगी, जबकि एथलेटिक्स, निशानेबाजी, कुश्ती आदि में उम्मीद से कम सफलता मिली। इससे फिर यही जाहिर हुआ है कि खेल जगत में भारत की सफलताएं अभी भी खिलाड़ियों की व्यक्तिगत लगन और प्रतिभा पर टिकी हुई है।

टीम खेलों में सिस्टम का कुछ योगदान बना है, लेकिन व्यक्तिगत स्पर्धाओं में कामयाब प्रतिभाओं को तराशने की व्यवस्था लचर है। वरना, भारत हांगझाउ की सफलताओं को कमोबेश कायम रखते हुए नई स्पर्धाओं में जमीन मजबूत करता, तो इस बार वह तीसरा स्थान पाने के लिए दक्षिण कोरिया से होड़ कर सकता था, जिसने 39 गोल्ड के साथ डेढ़ सौ पदक जीते हैं। वैसे, एशियाई खेलों की आम कथा यही बनी हुई है कि पहले स्थान के लिए चीन की टक्कर में कोई नहीं है। पिछली बार का होम एडवांटेज ना होने के बावजूद चीन ने स्वर्ण पदकों के मामले में दूसरे स्थान पर रहे जापान से लगभग 85 और कुल पदकों के मामले में 70 से ज्यादा पदकों का फासला बनाए रखा। भारत को इन सबसे सीख लेकर आगे की तैयारी करनी चाहिए।

By NI Editorial

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