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चुनाव बहिष्कार से क्यों डरना?

संवैधानिक संस्थाएं चुनाव की पवित्रता की रक्षा करने में विफल साबित हुई हैं। इस बीच वोट चोरी और चुनाव चोरी जैसे कथानकों को खुद विपक्षी दलों ने प्रचारित किया है। उसके साथ उम्मीदवार और दल चोरी, तथा सांसद- विधायक खरीदारी के कथानकों को जोड़ दें, तो लोकतंत्र की बात एक भद्दा मजाक बनी दिखने लगती है। इन्हीं हालात ने जागरूक नागरिकों में लाचारी की भावना भरी है।  तो प्रश्न है कि क्या विपक्षी दलों की साथ-साथ प्रतिरोध एवं चुनाव लड़ने की सोच से इस भावना को दूर किया जा सकता है?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पर दो निर्वाचन आयुक्तों के दस महीने में कम-से-कम 14 बार गंभीर एतराज जताने की खबर सामने आने के बाद से भारत में हो रहे चुनावों पर संदेह का साया और गहराया है। इसी सिलसिले में यह बहस खड़ी हुई है कि क्या अब विपक्ष को चुनाव बहिष्कार का फैसला करना चाहिए? या इसे इस रूप में भी पूछा जा रहा है कि क्या अब विपक्षी दलों के सामने चुनाव बहिष्कार के अलावा भी कोई और विकल्प रह गया है?

वैसे तो यह सवाल काफी समय से आपसी चर्चाओं में उठता रहा है या दबी ज़ुबान में इसे सार्वजनिक रूप से भी इसे कहा गया, लेकिन अब यह राजनीतिक बहस का एक प्रमुख मुद्दा बन चुका है। संभवतः इसे सबसे सटीक और दो-टूक अभिव्यक्ति हाल में कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजित दीपके ने दी। दरअसल, इस संबंध में उनके सोशल मीडिया पोस्ट के बाद ही इस पर खुलेआम सार्वजनिक बहस खड़ी हुई है। विपक्ष को संबोधित करते हुए दीपके ने कहा,

“हां, चुनावों में धांधली हो रही है। लेकिन जब आप धांधली वाले चुनावों में भाग लेना जारी रखते हैं, तो आप इन चुनावों को वैधता प्रदान करते हैं। आप यह भ्रम बनाए रखने में मददगार बनते हैं कि ये चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं।…

शायद आप चुनाव लड़ना जारी रखते हैं, क्योंकि आपको डर है कि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे, तो आपका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन जब वोट चुराए जा रहे हों, आपके विधायकों और सांसदों को खरीद लिया जा रहा हो, और आपकी पार्टियों को तोड़ा जा रहा हो, तो आप किस तरह से अपने अस्तित्व की रक्षा करने की कोशिश कर रहे हैं?….

यह राजनीतिक अस्तित्व को बचाना नहीं है। आप बस एक ऐसी व्यवस्था में जीवित रहने की कोशिश कर रहे हैं, जो जब चाहे आपको कमजोर कर सकती है, आपकी पार्टी को विभाजित कर सकती है या आपके निर्वाचित प्रतिनिधियों को आपसे छीन सकती है। इस तरह आप कब तक टिके रह सकते हैं?….

और आप चुनावों में धांधली के बारे में केवल तभी बात नहीं कर सकते, जब यह उन राज्यों में हो, जो आपके लिए मायने रखते हैं, और जब यह कहीं और हो तो आप चुप रहें! अगर चुनावों में धांधली हो रही है, तो इससे फर्क पड़ना चाहिए- चाहे राज्य कोई भी हो या कोई भी पार्टी प्रभावित हो रही हो…

आप खेल जारी रखते हुए यह नहीं कह सकते कि खेल में धांधली हुई है। आपकी भागीदारी ही एकमात्र ऐसी चीज है, जो इन धांधली वाले चुनावों को वैधता देती है।

अपने राजनीतिक अस्तित्व के बारे में सोचने से पहले देश और इसके लोकतंत्र के बारे में सोचें। एक रुख तय करें और धांधली वाले चुनावों में भाग लेना बंद करें।”

बेशक, भारत में मौजूदा परिस्थितियों के बीच चुनाव बहिष्कार की यह एक ठोस और बेलाग वकालत है। लेकिन यह बात संभवतः विपक्षी दलों को रास नहीं आई। चूंकि सभी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया इस स्तंभकार से पास नहीं है, इसलिए सबके बारे में कुछ कहना उचित नहीं होगा। लेकिन कम-से-कम दो दलों के रुख का अनुमान उनके प्रमुख नेताओं की टिप्पणी से लगाया जा सकता है। और उनमें एक पार्टी तृणमूल कांग्रेस है, जिसके बारे में समझा जाता है कि एसआईआर प्रक्रिया की गड़बड़ियों की वह सबसे बड़ी भुक्तभोगी है। दरअसल, वह उन सभी तौर-तरीकों की भुक्तभोगी है, जिसका जिक्र दीपके ने किया है।

उसके नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने कहाः

“विपक्ष का चुनावों का बहिष्कार करना = भाजपा का सभी सीटों पर जीत जाना। एक बार जब ऐसा हो जाएगा, तो वे अपने सभी अपराधों को कानूनी रूप देने के लिए संविधान में संशोधन कर देंगे…

इसके अलावा चुनाव ना लड़ने का अर्थ है जमीन पर मौजूद उन लाखों कार्यकर्ताओं के साथ विश्वासघात, जो अपनी जान जोखिम में डाल कर लड़ रहे हैं।… इसीलिए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए चुनाव लड़ना महत्त्वपूर्ण है, और इसके साथ ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए संघर्ष करना भी उतना ही आवश्यक है।”

इसी से मिलती-जुलती सोच कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी विशेष आमंत्रित सदस्य गुरदीप सिंह सप्पल ने अपने एक लेख में जताई। उन्होंने कहा,

“निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर गुस्सा बढ़ रहा है और कुछ लोग अब कहने लगे हैं कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को चुनाव लड़ना ही बंद कर देना चाहिए। उनका सवाल है कि अगर रेफरी ही बेईमान है, तो मैच क्यों खेलें? उनका तर्क है कि चुनाव लड़ना सिर्फ एक धांधली ग्रस्त प्रक्रिया को वैधता देना है…

गुस्सा जायज है। लेकिन निष्कर्ष गलत है। बहिष्कार पलायन है, और पलायन प्रतिरोध नहीं है। चुनावों का बहिष्कार भारतीय लोकतंत्र की रक्षा नहीं करेगा। बल्कि उसे पूरी तरह खत्म करने के रास्ते खोल देगा।।।।।

अब सोचिए कि विपक्ष मैदान छोड़ दे। तब नई पार्टियां गढ़ी जाएंगी। झूठे प्रचार से असली विपक्ष को बदनाम कर एक नया, आज्ञाकारी विपक्ष तैयार किया जाएगा। लोकतांत्रिक असहमति की जगह कठपुतलियों से भर दी जाएगी। और जिन चुनावों का कुछ लोग बहिष्कार करना चाहते हैं, उन्हीं चुनावों से धांधली वाले चुनावों को वैधता दी जाएगी। सत्ता पर पकड़ पूरी हो जाएगी, और वह कानूनी भी दिखेगी…

इसकी एक व्यावहारिक क़ीमत भी है। जो पार्टी चुनाव लड़ती है, उसके पोलिंग एजेंट हर बूथ पर होते हैं। उसके पास फॉर्म 17-C की कॉपियां होती हैं। उसके उम्मीदवार अदालत में नतीजों को चुनौती दे सकते हैं। वे पूरी मशीनरी को करीब से देखते हैं। राहुल गांधी ने देश के सामने जो भी सबूत रखे हैं, वे इसी प्रक्रिया के भीतर रह कर जुटाए गए। बहिष्कार चोरी को नहीं रोकता। वह गवाहों को ही हटा देता है।”

चुनाव बहिष्कार पलायन है या नहीं, इस प्रश्न पर हम बाद में आएंगे। लेकिन “बहिष्कार से गवाहों के हट जाने” के मुद्दे पर फिलहाल यह सवाल उठाना उचित होगा कि राहुल गांधी ने “जो सबूत रखे”, उसका परिणाम क्या हुआ है? उन “साक्ष्यों” का यह महत्त्व निर्विवाद है कि उनसे भारतीय चुनावों में हो रही धांधली का तर्क और मजबूत हुआ। यह जाहिर हुआ कि धांधली की शिकायत महज एक धारणा नहीं, बल्कि इसके ठोस और परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद हैं। लेकिन सवाल है कि क्या “साक्ष्यों” से सुनियोजित धांधलियों को रोकने की कोई राह भी निकली है? दरअसल, कांग्रेस सहित कुछ दलों एवं संगठनों ने प्रतीकात्मक प्रतिरोध जरूर आयोजित किए हैं, लेकिन उनके अलावा क्या जमीनी या आम जन के स्तर पर किसी बड़ी हलचल की सूरत बनी है?

चुनाव स्वतंत्र एवं निष्पक्ष नहीं रह गए हैं, इस धारणा की पृष्ठभूमि लंबी है। इस संबंध में जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर का यह आकलन गौरतलब हैः

     चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से प्रभावित नहीं हुई है। ऐसा घटनाओं के एक लंबे सिलसिले के कारण हुआ है।

     दरअसल, देश भर में इस पर चर्चा होनी चाहिए कि एक पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त (राजीव कुमार) देश के सबसे बड़े निजी बैंक (एचडीएफसी) का चेयरमैन कैसे बन गया?

     पिछले कई वर्षों में चुनाव आयोग की कार्य शैली- विशेषकर चुनावों और अन्य मामलों में जिम्मेदारियों के निर्वहन के तरीकों- के कारण उसकी साख धूमिल हुई है। यह शिकायत पिछले 10 वर्ष से जारी है। इस दरम्यान चुनाव तारीखों के निर्धारण से लेकर चुनाव कितने चरणों में होंगे- हर चीज भाजपा की सुविधा से तय होती मालूम पड़ी है। (इस सिलसिले में आदर्श चुनाव आचार संहिता पर अमल में भेदभाव का उल्लेख भी किया जा सकता है।)

     चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति या चुनावों के व्यापक संचालन में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है। (इसे कानून बदल कर सरकार ने सुनिश्चित किया।)

     आज स्थिति यह है कि विपक्षी दल केवल वहीं चुनाव जीत पाते हैं, जहां भाजपा के खिलाफ आंधी चले। जहां जीत का अंतर थोड़ा हो, वहां विपक्षी उम्मीदवारों की हार तय कर दी जाती है।

यानी शिकायतों का सिलसिला लंबा है। एसआईआर में हुई गड़बड़ियां उस सिलसिले का ही हिस्सा बन कर सामने आई हैं। इस दौरान जिस पैमाने पर और जिस खुल्लमखुल्ला अंदाज में गड़बड़ियां की गईं, उसके बाद जनमत का एक बड़ा हिस्सा यह मानने लगा कि बात सिर्फ चुनावी धांधली की नहीं रह गई है, बल्कि अब चुनावों को नियंत्रित एवं नियोजित कर लिया गया है। इस धारणा ने लोगों में लाचारी की भावना भरी है। इस अहसास से ये भावना और गहरी हुई कि फरियाद का कोई मंच नहीं बचा है।

इसीलिए ये सवाल सबसे अहम हो गया है कि अब किया क्या जाए? इस सिलसिले में बहिष्कार, चुनाव लड़ने के साथ-साथ प्रतिरोध, और न्यायपालिका की शरण में जाने के विकल्प चर्चा में आए हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की गुजारिश करती कुछ याचिकाएं दायर भी की गई हैं।   इस पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास की ये टिप्पणी महत्त्वपूर्ण हैः

“…। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछली बार जब नागरिकों ने न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया, तब क्या हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने यह “सुनिश्चित” किया कि चुनाव से महज कुछ महीने पहले बंगाल में जैसे-तैसे एसआईआर हो जाए। जब बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने के परिणामों को नजरअंदाज़ करना असंभव हो गया, तो उस पीठ में शामिल न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने एक असाधारण टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा कि जो लोग “इस बार” वोट देने में असमर्थ हैं, वे “अगली बार” वोट दे सकते हैं…

उन्हें कौन बताए कि संभवतः चुराए जा चुके चुनाव के बाद कोई “अगली बार” नहीं होता? इसलिए, चूंकि अदालतें संवैधानिक संस्थाएं हैं, अतः ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इन नई याचिकाओं पर वे जितनी बार चाहें, उन्हें सुनवाई करने दें। वे जो चाहें, आदेश पारित करने दें। लेकिन ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही तय करने की अपनी लोकतांत्रिक मांग को हम अदालतों को “आउटसोर्स” नहीं करेंगे।

यह जनता तय करेगी। क्योंकि आखिरकार, ना तो कोई चुनाव आयुक्त और न ही कोई न्यायाधीश भारतीय लोकतंत्र का मालिक है। इसके मालिक हम, भारत के लोग हैं।”

इस सोशल मीडिया पोस्ट का सार है कि संवैधानिक संस्थाएं चुनाव की पवित्रता की रक्षा करने में विफल साबित हुई हैं। इस बीच वोट चोरी और चुनाव चोरी जैसे कथानकों को खुद विपक्षी दलों ने प्रचारित किया है। उसके साथ उम्मीदवार और दल चोरी, तथा सांसद- विधायक खरीदारी के कथानकों को जोड़ दें, तो लोकतंत्र की बात एक भद्दा मजाक बनी दिखने लगती है। इन्हीं हालात ने जागरूक नागरिकों में लाचारी की भावना भरी है।

तो प्रश्न है कि क्या विपक्षी दलों की साथ-साथ प्रतिरोध एवं चुनाव लड़ने की सोच से इस भावना को दूर किया जा सकता है? आखिर कितनी बार अपनी हार को ये दल वोट चोरी का परिणाम बताएंगे, कुछ रोज प्रतीकात्मक विरोध जताएंगे, और फिर अगले चुनाव की तैयारी में जुट जाएंगे? इन्हीं सवालों के क्रम में चुनाव बहिष्कार का मुद्दा उठा है।

इस सुझाव को सहज स्वीकार करना सियासी पार्टियों के लिए आसान नहीं है। इसकी वजह उनका दायरा और ढांचा है। आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का सार यह रहा है कि (एक हद तक आरएसएस समर्थित भाजपा को छोड़ कर) तमाम दलों के लिए राजनीति का अर्थ ही चुनाव हो चुका है। वे चुनावी चक्र में सोचते हैं, उसी के मुताबिक मुद्दे और उम्मीदवार चुनते हैं, और उसी के इर्द-गिर्द उनकी तमाम गतिविधियां सीमित रहती हैं। उनके कथित कार्यकर्ता दरअसल इस उम्मीद में उनसे जुड़े लोग हैं कि कभी किसी स्तर पर चुनाव लड़ने का मौका मिल जाएगा। उन्हें फंडिंग चुनाव जीत सकने की उनकी संभावना के आधार पर होती है। गुजरे वक्त के साथ पार्टी की टिकट बिक्री एक बड़ा धंधा- यानी पार्टियों या नेताओं के लिए आमदनी का जरिया बन गई है। स्वाभाविकतः चुनाव ना लड़ना उनके सोच के दायरे से बाहर की बात है। चुनाव उनके लिए किसी लक्ष्य को पाने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने आप में लक्ष्य हैं!

वैसे, राजनीति अगर किसी ऊंचे लक्ष्य और संकल्प से प्रेरित ना हो, तो चुनाव बहिष्कार सचमुच कोई समाधान नहीं है। यह निर्णय सिर्फ तब समाधान बन सकता है, जब राजनीति का अर्थ जनता के बीच जाना, उसकी अपेक्षाओं को समझना, उससे संवाद कायम करना, आम जन चेतना के विस्तार के प्रयास में जुटना और उस आधार पर जन गोलबंदी करना समझा जाए। इसी अर्थ में कहा जाता है कि भारत को आजादी चुनाव लड़ कर नहीं मिली थी। तब स्वतंत्रता सेनानियों ने राजनीति को व्यापक अर्थ में देखा था।

चुनाव में भाग लें या नहीं, इस बहस में उलझते हुए दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘राज्य के साथ, राज्य के विरुद्ध, राज्य से आगे’ नाम की माकूल रणनीति तय की थी। इसका अर्थ था, चुनाव में शामिल होकर राज्य-तंत्र में अधिकतम भागीदारी बनाना, साथ-साथ अपनी मांगें पूरी कराने के लिए राज्य के खिलाफ लगातार संघर्षरत रहना, और आम जन को संगठित करते हुए उनकी शक्ति निर्मित करना, ताकि वे अपने उद्देश्य को हासिल करने के संघर्ष के लिए तैयार हो सकें। लेकिन ये सब बड़ी बातें हैं। फिलहाल, हम जिन राजनीतिक दलों के संबंध में बात कर रहे हैं, संभव है कि वे इसे बेकार की बातें कहें या यह भी संभव है कि यह उनके सिर के ऊपर से गुजर जाए।

इसीलिए फिलहाल, भारत में बात कहीं आगे बढ़ने की संभावना नहीं दिखती। फिलहाल, यही अनुमान लगाया जा सकता है कि विपक्षी दल चुनाव के मामले ‘तुम्हीं से मोहब्बत- तुम्हीं से लड़ाई’ जैसी सीमित सोच के दायरे में बंधे रहेंगे!

By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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