भारत में संक्रामक रोगों पर काबू पाने में कामयाबी मिली है, जिससे लोगों का जीवन काल लंबा हुआ है। लेकिन खराब लाइफ स्टाइल या पर्यावरण बिगड़ने से फैले रोगों को थामने की सुविधाएं सुलभ नहीं हुई हैं।
कोरोना काल में भारत में जीवन प्रत्याशा (जन्म के समय शिशु का अपेक्षित जीवन काल) को जो झटका लगा, उससे देश उबर चुका है, लेकिन स्वस्थ जीवन के मामले में स्थिति लगभग जस की तस है। यह निष्कर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की 2023 के आंकड़ों पर आधारित ताजा रिपोर्ट से निकलता है। इसके मुताबिक भारत में स्वस्थ जीवन प्रत्याशा 2023 में 60.6 वर्ष रही, जो 2019 के 60.5 से मामूली रूप में ही ज्यादा थी। कुल जीवन प्रत्याशा 2019 में 70.5 वर्ष थी, जो 2021 में 68.1 वर्ष हो गई। 2023 में यह 71 साल हो गई। यानी 2023 तक भारत की जीवन प्रत्याशा कोरोना काल के आरंभ की तुलना में छह महीने अधिक हो गई थी।
इस बीच भारत में गैर-संक्रामक रोगों के कारण होने वाली मृत्यु दर में काफी बढ़ोतरी हुई है। डब्लूएचओ के मुताबिक भारत में मौत के प्रमुख कारणों में साल 2000 में संक्रामक रोगों का हिस्सा लगभग 62 फीसदी और कैंसर, डायबिटीज, स्ट्रोक, किडनी रोग जैसे गैर-संक्रामक रोगों का 34 फीसदी था। 2023 तक गैर-संक्रामक रोगों का हिस्सा 75 प्रतिशत और संक्रामक रोगों का 16 प्रतिशत हो गया। मतलब यह कि भारत में जन स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ने से संक्रामक रोगों पर काबू पाने में कामयाबी मिली है, जिससे लोगों का जीवन काल लंबा हुआ है। लेकिन उसी अनुपात में खराब लाइफ स्टाइल या पर्यावरण बिगड़ने के कारण फैले रोगों को थामने या उनके इलाज की सुविधाएं सुलभ नहीं हुई हैं।
इस कारण स्वस्थ जीवन प्रत्याशा में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। जीवन प्रत्याशा को मानव विकास का सबसे बुनियादी पैमाना समझा जाता है। पोषण, चिकित्सा सेवाओं, और जीवन शैली में सुधार होने की सीधी झलक एक शिशु के जन्म के समय उसके अपेक्षित औसत जीवन काल से मिलती है। लेकिन यह भी महत्त्वपूर्ण है कि जीवन स्वस्थ रहे। नई परिस्थितियों के साथ इससे संबंधित चुनौतियां बढ़ती चली गई हैं। डब्लूएचओ की रिपोर्ट एक मौका है, जिसका लाभ उठा कर इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है, ताकि लोगों की जिंदगी को लंबा और स्वस्थ बनाने के सभी संभव उपाय किए जा सकेँ।
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