पश्चिम बंगाल में जिन अर्जियों पर अगले 18 दिन में फैसला नहीं हो पाएगा, उनसे संबंधित मतदाताओं के अधिकार की उपेक्षा करते हुए चुनाव कराना किस लिहाज से उचित माना जाएगा? एक भी नागरिक के मताधिकार का हनन अवांछित है।
पश्चिम बंगाल में 60 लाख व्यक्तियों के मताधिकार पर अंतिम निर्णय हुए बिना निर्वाचन आयोग ने राज्य विधानसभा के चुनाव कार्यक्रम का एलान कर दिया है। ये वो लोग हैं, मतदाता सूची में जिनके नाम पर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान विवाद खड़ा हुआ। उनसे संबंधित अर्जियां विचाराधीन हैं, जिन्हें निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर न्यायिक अधिकारियों की सहायता ली जा रही है। लेकिन ये काम इतना पेचीदा है कि इस बारे में फैसले की रफ्तार धीमी बनी हुई है। इस बीच घोषित कार्यक्रम के मुताबिक छह अप्रैल को परचा भरने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
मुद्दा है कि जिन अर्जियों पर अगले 18 दिन में फैसला नहीं हो पाएगा, उनसे संबंधित मतदाताओं के अधिकार की उपेक्षा करते हुए चुनाव कराना किस लिहाज से उचित माना जाएगा? कहा जाता है कि लोकतंत्र में प्रत्येक मत महत्त्वपूर्ण है। वोट हर नागरिक का मूलभूत अधिकार है। एक भी नागरिक के इस अधिकार का हनन लोकतंत्र की मूलभूत भावना पर प्रहार होगा। ऐसा हुआ, तो उसके लिए सीधे तौर पर निर्वाचन आयोग को दोषी माना जाएगा, जिसने जल्दबाजी में एसआईआर कराने का फैसला किया। साथ ही ये प्रक्रिया निर्विवाद ढंग से हो तथा संदेह से परे रहे, इसका इंतजाम करने में वह विफल रहा।
रविवार को आयोग ने पश्चिम बंगाल के अलावा असम, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के लिए चुनाव कार्यक्रम घोषित किए। इनमें अच्छी बात तो यह है कि इस बार टुकड़ों- टुकड़ों में मतदान कराने की परिपाटी छोड़ दी गई है। पश्चिम बंगाल में दो चरणों में और बाकी राज्यों में एक चरण में मतदान होगा। मगर असम, केरल और पुडुचेरी में नौ अप्रैल को मतदान के बाद मतगणना के लिए 25 दिन के इंतजार की अवांछित स्थिति बनेगी। हाल में ऐसी परिस्थितियों से संदेह का माहौल बनता रहा है। अतः बेहतर होता कि हर राज्य में मतदान और मतगणना में न्यूनतम संभव अंतर रखा जाता। बहरहाल, अब आयोग के सामने चुनौती चुनाव प्रक्रिया को तमाम संदेहों और सवालों से परे रखने की है। ऐसा वह सभी पक्षों के प्रति समान नजरिये का परिचय देकर कर सकता है।


