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विकल्प और भी हैं!

भारत की असल चिंता यह है कि सितंबर में साल भर पहले की तुलना में सेवा क्षेत्र के निर्यात में 5.5 प्रतिशत की कमी आई। जबकि सेवा क्षेत्र ने वस्तु व्यापार में घाटे को काफी हद तक संभाले रखा है।

डॉनल्ड ट्रंप के टैरिफ वॉर का असर सितंबर में पड़ा। अमेरिका के लिए भारत के निर्यात में लगभग 12 प्रतिशत की गिरावट आई। इसके बावजूद भारत का कुल निर्यात सितंबर 2024 की तुलना में 6.74 प्रतिशत बढ़ा। स्पष्टतः अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच घटने की भरपाई दूसरे बाजारों ने की। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें चीन और यूएई की अहम भूमिका रही। चीन के लिए भारत का निर्यात 34 फीसदी, जबकि यूएई के लिए 24 फीसदी बढ़ा। चूंकि चीन से आयात में 16 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई, तो कुल मिला कर चीन से भारत के व्यापार घाटे की खाई कुछ पटी। मगर यूएई से व्यापार घाटा बढ़ गया, क्योंकि वहां से आयात 33 फीसदी बढ़ा। इसमें सबसे बड़ा योगदान सोने का रहा, जिसकी महंगाई का बोझ आयात बिल पर महसूस हुआ।

इसी तरह ऐसा लगता है कि मुक्त व्यापार समझौते का अधिक लाभ ब्रिटेन को हो रहा है, जिससे आयात में 54 फीसदी का इजाफा हुआ। ब्रिटेन के लिए भारतीय निर्यात में महज 12 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई। वैसे भारत की असल चिंता यह है कि सितंबर में साल भर पहले की तुलना में सेवा क्षेत्र के निर्यात में 5.5 प्रतिशत की कमी आई। जबकि सेवा क्षेत्र ने वस्तु व्यापार में घाटे को काफी हद तक संभाले रखा है। इसमें गिरावट आगे भी जारी रही, तो भारत की व्यापारिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं। ऐसा होने की आशंका इसलिए है, क्योंकि आर्टफिशियल इंटेलीजेंस के बढ़ते उपयोग का परिणाम सेवा क्षेत्र के निर्यात पर पड़ने की चर्चा आम है।

इसके मद्देनजर यह उचित होगा कि भारत इसकी भरपाई वस्तु निर्यात से करने की रणनीति बनाए। सितंबर में संकेत यह मिला कि अमेरिकी बाजार भले भारत के लिए महत्त्वपूर्ण हो, लेकिन वहां होने वाले नुकसान की भरपाई की गुंजाइशें भी मौजूद हैं। इस लिहाज से जो बाजार भारत के काम आ सकते हैं, उन देशों से आर्थिक संबंधों को मजबूती देना फिलहाल सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। यह दीगर है कि भारत सरकार की प्राथमिकता अभी तक उन विकसित बाजारों से जुड़ने की रही है, जहां पांव पसारने की ज्यादा संभावना नहीं है।

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By NI Editorial

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