राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

सुरक्षा आउटसोर्सिंग के खतरे

गुजरे दशकों में नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों पर अंधाधुंध अमल का परिणाम यह हुआ है कि विभिन्न देशों ने सैनिकों की सामाजिक सुरक्षा के अपने दायित्व से मुंह मोड़ने के लिए सुरक्षा की आउटसोर्सिंग की है। लेकिन अब इसके खतरे खुल कर सामने आ गए हैं।

रूस भीषण गृह युद्ध में उलझने से बच गया। इसका श्रेय बेलारुस के राष्ट्रपति अलेक्सांद्र लुकाशेंको की परिपक्व मध्यस्थता को दिया जाए, या प्राइवेट आर्मी वागनर ग्रुप के सरदार येवगेनी प्रिगोझिन को आखिर में हुए हकीकत के अहसास को- यह अलग चर्चा विषय है। लेकिन अहम बात यह है कि इस सेना ने यूक्रेन के युद्ध में खास भूमिका निभाई है। बाखमुट के मोर्चे पर इसे मिली बड़ी फतह के बाद प्रिगोझिन की बढ़ी महत्त्वाकांक्षा और अहंकार ही वो कारण थे, जिसने रूस को ऐसे संकट के दरवाजे तक पहुंचा दिया था, जहां से सचमुच उसके विनाश की शुरुआत हो सकती थी। अब प्रश्न है कि एक प्राइवेट आर्मी को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कार्य में किसने लगाया, जो अनिवार्य रूप से आधुनिक काल में राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए? यह भी गौरतलब है कि वागनर ग्रुप से लड़ने के लिए चेचन आर्मी के दस्ते संबंधित क्षेत्र की तरफ कूच गए थे, जिसका चरित्र भी काफी कुछ निजी सेना की तरह है। उस लड़ाई में चाहे जिसकी जीत होती, खून रूसी नागरिकों का गिरता और बर्बाद भी रूस ही होता।

तो अब यह दुनिया भर के देशों के लिए गहन विचार का विषय है कि राज्य के अनिवार्य कार्यों का निजीकरण होना चाहिए? अमेरिका ने भी गुजरे दशकों में बड़ी संख्या में प्राइवेट आर्मी को अपने युद्धों में लगाया है। इराक और अफगानिस्तान में ऐसी इकाइयों के बेहरमी और उनकी तरफ से किए गए मानव अधिकारों के हनन की कहानियां बहुचर्चित हैं। इसी पैटर्न पर कई और देश चले हैँ। रूस में हुआ यह कि अपराधियों को लेकर बनी एक प्राइवेट आर्मी बगावत पर उतर आई। ऐसे खतरे हर उस जगह मौजूद हैं, जहां सुरक्षा की इस तरह की आउटसोर्सिंग की गई है। गुजरे दशकों में नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों पर अंधाधुंध अमल का परिणाम हुआ है कि विभिन्न देशों ने सैनिकों की सामाजिक सुरक्षा के दायित्व से मुंह मोड़ने के लिए ऐसी आउटसोर्सिंग का सहारा लिया है। लेकिन अब इसके खतरे खुल कर सामने आ गए हैं। सबक यह है कि राज्य अपने मूलभूत कर्त्तव्य किसी और को सौंप कर देश की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं रह सकता।

Tags :

By NI Editorial

The Nayaindia editorial desk offers a platform for thought-provoking opinions, featuring news and articles rooted in the unique perspectives of its authors.

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 × 5 =