ओमान के साथ पिछले वित्त वर्ष में भारत का कुल कारोबार 10.6 बिलियन डॉलर था। न्यूजीलैंड के साथ 1.3 बिलियन डॉलर का कारोबार हुआ था। उम्मीद है कि इन देशों में भारत के सेवा क्षेत्र की अब अधिक पैठ बन सकेगी।
खबर है कि यह साल खत्म होने से पहले न्यूजीलैंड के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता हो जाएगा। पिछले हफ्ते ओमान के साथ भारत का ऐसा समझौता हुआ। उस पर दस्तखत के मौके पर उपस्थित रहने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां गए। जब से अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ (जिसमें रूसी तेल खरीदने के दंड के रूप में 25 फीसदी आयात शुल्क शामिल है) लगाया है, भारत सरकार की प्राथमिकता अधिक से अधिक देशों के साथ व्यापार समझौता करना बनी हुई है। यह अपने-आप में सही नीति है, लेकिन यह प्रश्न कायम है कि क्या इनसे अमेरिका से कारोबार में संभावित नुकसान की भरपाई की जा सकेगी?
ओमान के साथ पिछले वित्त वर्ष में भारत का कुल कारोबार 10.6 बिलियन डॉलर था। न्यूजीलैंड के साथ 1.3 बिलियन डॉलर का कारोबार हुआ था। भारत को उम्मीद है कि इन देशों के साथ करार होने पर भारत के सेवा क्षेत्र की वहां अधिक पैठ बन सकेगी। ऐसा हुआ, तो यह अच्छी बात होगी। लेकिन इस वक्त मुख्य चुनौती वस्तु निर्यात के उन क्षेत्रों को नया बाजार दिलाने की है, जो अमेरिकी टैरिफ से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। नवंबर में अमेरिका के लिए भारत का निर्यात 22 प्रतिशत जरूर बढ़ा, लेकिन कारोबार क्षेत्र ने इसे अपने लिए राहत नहीं माना है।
इस बढ़ोतरी का कारण पहले से आ चुके ऑर्डर की सप्लाई और ट्रेड डील की आस में निर्यातकों का अपने मुनाफे को न्यूनतम रखते हुए ग्राहकों को जोड़े रखने की कोशिश को माना गया है। फिर ध्यान दिलाया गया है कि बड़ी बढ़ोतरी मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी वस्तुओं में हुई, जिन्हें ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ से बाहर रखा है। अमेरिका से जल्द ट्रेड डील होने की उम्मीद कमजोर पड़ी हुई है। इसलिए प्रभावित क्षेत्रों के लिए नया बाजार ढूंढने की चुनौती सरकार के सामने है। उस दिशा में फिलहाल कोई प्रगति होती नजर नहीं आती। फिर यह देखने की बात यह भी होगी कि जिन देशों से मुक्त व्यापार समझौते हुए हैं, वहां की वस्तुओं के लिए अपना बाजार खोलने का क्या असर भारतीय कारोबार पर पड़ेगा?


