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समझ व ठोस निर्माण से हो तीर्थों का जीर्णोद्धार

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उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के नए परिसर महाकाल लोकका 856 करोड़ रू के प्रोजेक्ट का लोकार्पण सात महीने पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। …एक साल से पहले ही मंदिर में सप्त ऋषियों की मूर्तियां पहली आँधी में ही ध्वस्त हो कर गिर गई तो यह किस बात का प्रमाण? क्या इस कॉरिडोर का निर्माण करने वाली गुजरात की कंपनी के पास वास्तव में इस तरह के कार्य करने का कोई अनुभव था? क्या यह ठेकेदार भी अन्य सरकारी काम करने वाले ठेकेदारों की तरह केवल दिखावटी काम करने में माहिर था, ठोस काम करने में नहीं?

बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर के मंदिर में सप्त ऋषियों की मूर्तियां पहली आँधी में ही ध्वस्त हो कर गिर गयीं। 856 करोड़ के इस प्रोजेक्ट का लोकार्पण सात महीने पहले ही प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। क्या इस भव्य कॉरिडोर का निर्माण व इस तीर्थ स्थल का जीर्णोद्धार सही समझ, अनुभव, श्रद्धा और कलात्मक अभिरूचि के साथ किया गया था? क्या इस जीर्णोद्धार करने वाले ठेकेदार ने पहले भी कभी किसी पौराणिक तीर्थ स्थल का जीर्णोद्धार किया था?

देश के मंत्री नरेंद्र मोदी मोदी जिस तरह से देश भर में नए भवनों और सड़कों आदि का निर्माण करवा रहे हैं वो हर मतदाता के लिए गर्व की बात है। जब भी देश में विकास होता है तो उसका श्रेय तत्कालीन सरकार को ही मिलता है। देश भर में होने वाले विकास कार्यों से जहां देश भर में तरक़्क़ी की लहर दौड़ती है वहीं रोज़गार के अवसर भी बढ़ते हैं। परंतु जहां सरकार को विकास का श्रेय मिलता है, वहीं यदि कभी इन विकसित स्थानों पर  कोई हादसा या दुर्घटना हो जाए तो उसका दोषी भी सरकार का ही माना जाता है। सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न हो? यदि वे श्रेय की हक़दार हैं तो गुणवत्ता की कमी के कारण होने वाले नुक़सान के लिए भी उतनी ही ज़िम्मेदार हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्टूबर 2022 को उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के नए परिसर ‘महाकाल लोक’ का लोकार्पण किया था। नवम्बर 2022 मुझे भी इस नवनिर्मित परिसर को देखने का मौक़ा मिला। वहाँ मौजूद दर्शनार्थियों की भीड़ को देख इस बात का अंदाज़ा लग गया था कि यह स्थान बहुत लोकप्रिय हो गया है। महाकाल के सेवायत गोसाईयों से बात करके पता चला कि इतने खुले परिसर के बन जाने से यहाँ पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी बड़ गई है। अपनी यात्रा में पूरे परिसर का दौरा करने के पश्चात एक अच्छी अनुभूति ज़रूर हुई। परंतु जब वहाँ पर फ़ाइबर की इतनी विशाल मूर्तियों को देखा तो विचार आया कि भगवान करे यह मूर्तियाँ सालों तक टिकी रहें। बीते रविवार जब यह हादसा हुआ तो मुझे उस दिन की चिंता याद हो आई।

सिर्फ 30 किलोमीटर की रफ़्तार से चलने वाली एक ही आँधी में सात में से छह मूर्तियों का ढह जाना वास्तव में चिन्ताजनक है। इस हादसे से सीधे तौर पर यही सवाल उठता है कि क्या इस कॉरिडोर का निर्माण करने वाली गुजरात की कंपनी के पास वास्तव में इस तरह के कार्य करने का कोई अनुभव था? क्या यह ठेकेदार भी अन्य सरकारी काम करने वाले ठेकेदारों की तरह केवल दिखावटी काम करने में माहिर था, ठोस काम करने में नहीं?

यदि ऐसा होता तो इतनी सी आँधी में ये मूर्तियाँ नहीं गिरतीं। 856 करोड़ रुपये की लागत से बने इस प्रोजेक्ट की गुणवत्ता पर अब सवाल उठने लग गये हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार इस प्रोजेक्ट पर लगभग 200 से 250 करोड़ ही ख़र्च हुए हैं। शेष राशि भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गई है। इस बात में कितनी सच्चाई है ये तो जाँच के बाद ही पता चलेगा। इस हादसे के बाद ऐसे सभी प्रोजेक्टों को शक की निगाह से देखा जा रहा है।

दरअसल जब भी कभी किसी तीर्थ स्थल का जीर्णोद्धार होता है तो वह कार्य कुछ सालों के लिए नहीं बल्कि सदियों के लिए होना चाहिए। सरकारें आएँगी और जाएँगी परंतु तीर्थ स्थल तो सदियों के लिए ही बनाए जाते हैं। मिसाल के तौर पर तेलंगाना के यदाद्रीगिरीगुट्टा क्षेत्र में बने भगवान लक्ष्मी-नृसिंह देव के एक अत्यंत भव्य मंदिर को ही लीजिए। मंदिर के निर्माण में कहीं भी ईंट, सीमेंट या कंक्रीट का प्रयोग नहीं हुआ है। सारा मंदिर ग्रेनाइट की भारी-भारी ‘श्री कृष्ण शिलाओं’ से बना है, जिन्हें प्राचीन तरीक़े के चूने के मसाले से जोड़ा गया है।

इस मंदिर के निर्माण में 80 हज़ार टन पत्थर लगा है। जो ये सुनिश्चित करेगा कि ये मंदिर सदियों तक रहे। मंदिर का सारा निर्माण कार्य आगम, वास्तु और पंचरथ शास्त्रों के सिद्धांतों पर किया गया है। जिनकी दक्षिण भारत के खासी मान्यता है। 2016 में तेलंगाना सरकार ने 1800 करोड़ रुपए की लागत से तिरुपति की तर्ज पर इसका भव्य निर्माण शुरू करवाया। पारम्परिक नक्काशी से सुसज्जित यह मंदिर मात्र साढ़े चार साल में बन कर तैयार हुआ है जो अपने आप में एक आश्चर्य है।

मंदिर का सात मंज़िला ग्रेनाइट का बना मुख्य द्वार, जिसे राजगोपुरम कहा जाता है, करीब 84 फीट ऊंचा है। इसके अलावा मंदिर के 6 और गोपुरम हैं। राजगोपुरम के आर्किटेक्चर में 5 सभ्यताओं द्रविड़, पल्लव, चौल, चालुक्य और काकातिय की झलक भी मिलती है। आज यहाँ लाखों दर्शनार्थियों का मेला लगा रहता है।

धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। पुरोहित समाज के पैतृक अधिकार, लोगों की धार्मिक भावनाएं, वहां आने वाले लाखों आम लोगों से लेकर मध्यम वर्गीय व अति धनी लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करना बहुत कठिन होता है। सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की सफ़ाई, ट्रैफ़िक, कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना बड़ी चुनौतियाँ हैं।

इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़ंजे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। इसलिए तीर्थस्थलों के विकास और जीर्णोद्धार के लिए विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है।

By रजनीश कपूर

दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के प्रबंधकीय संपादक। नयाइंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर।

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