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मल्टीटास्किंग से दिमाग होता है ओवरलोड

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में मल्टीटास्किंग को एक खास स्किल माना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जिस मल्टीटास्किंग को हम अपनी क्षमता समझते हैं, वह असल में दिमाग के लिए एक तरह का दबाव बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हमारा मस्तिष्क वास्तव में एक समय में केवल एक ही काम पर सही तरीके से ध्यान दे सकता है। 

न्यूरोसाइंस की रिसर्च के मुताबिक, जब हम कई काम एक साथ करने की कोशिश करते हैं तो हमारा दिमाग उन्हें एक साथ नहीं करता, बल्कि वह तेजी से एक काम से दूसरे काम पर स्विच करता रहता है। यही लगातार स्विचिंग दिमाग की ऊर्जा को ज्यादा खर्च करती है।

अमेरिका की प्रमुख स्वास्थ्य अनुसंधान संस्था नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार, मानव मस्तिष्क को मूल रूप से एक समय में एक कार्य पर ध्यान केंद्रित करने के लिए विकसित किया गया है। इसलिए जब हम लगातार कई कामों के बीच ध्यान बदलते रहते हैं तो दिमाग को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। इस आदत का सबसे बड़ा असर हमारी याददाश्त और ध्यान की क्षमता पर पड़ता है। बार-बार काम बदलने से शॉर्ट-टर्म मेमोरी पर दबाव बढ़ता है और फोकस कमजोर हो जाता है। यही वजह है कि मल्टीटास्किंग करने वाले लोग अक्सर छोटी-छोटी बातें भूल जाते हैं।

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मल्टीटास्किंग का एक और असर मानसिक तनाव के रूप में सामने आता है। जब दिमाग लगातार कई कामों को संभालने की कोशिश करता है तो वह ओवरलोड महसूस करने लगता है। इस स्थिति में शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है। लंबे समय तक ऐसा होने पर व्यक्ति में चिंता, चिड़चिड़ापन और मानसिक अस्थिरता की समस्या बढ़ सकती है। जब दिमाग को पर्याप्त शांति और आराम नहीं मिलता तो भावनात्मक संतुलन भी प्रभावित होने लगता है।

कई लोग यह मानते हैं कि एक साथ कई काम करने से समय बचता है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग हो सकती है। जब हम एक काम छोड़कर दूसरे काम की ओर जाते हैं, तो दिमाग को दोबारा ध्यान केंद्रित करने में थोड़ा समय लगता है। अगर यह प्रक्रिया बार-बार होती है तो काम की गति धीमी हो जाती है।

उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति हर कुछ मिनट में मोबाइल नोटिफिकेशन चेक करता है, तो उसका मुख्य काम बार-बार रुकता रहता है। इससे न केवल समय ज्यादा लगता है बल्कि गलतियां होने की संभावना भी बढ़ जाती है।

लगातार मल्टीटास्किंग करने से मानसिक थकान भी जल्दी महसूस होने लगती है। कई लोग इसे ब्रेन फॉग कहते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति को साफ-साफ सोचने, निर्णय लेने या किसी विषय को समझने में कठिनाई होती है। अगर इसके साथ नींद की कमी और लंबे समय तक स्क्रीन का उपयोग भी जुड़ जाए तो समस्या और गंभीर हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक डिजिटल मल्टीटास्किंग करने से दिमाग के उन हिस्सों पर असर पड़ सकता है जो निर्णय लेने और भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।

Pic Credit : ANI

By Naya India

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