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बेबाक विचार

अगर राजनीतिक साहस हो

ByNI Editorial,
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आसमान में जाने वाली ग्रीन हाउस गैसें किसी सीमा का पालन नहीं करती हैँ। ग्रीन हाउस गैसे चाहे धनी देशों में उत्पन्न हों, या गरीब देशों- शहर में या गांव में- जलवायु पर उनका समान असर होता है।

भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय की सलाहकार समिति ने एक उचित सिफारिश की है। उसने केंद्र सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि भारत को 2027 तक 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में डीजल से चलने वाली गाड़ियों पर पूरा बैन लगा देना चाहिए। उसने कहा है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती और प्रदूषित शहरों में इलेक्ट्रिक और गैस-ईंधन वाले वाहनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहिए। संभवतः इन कदमों से भारत को साल 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को नेट जीरो तक लाने का लक्ष्य  प्राप्त करने में मदद मिलेगी। लेकिन क्या सरकार (उस समय जो भी सत्ता में हो) यह सिफारिश मानने का राजनीतिक साहस दिखाएगी? यह सवाल इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि डीजल की कारें अब ज्यादातर महंगी- एसयूवी श्रेणी में बिक रही हैं। जाहिर है, इन कारों के साथ कार कंपनियों के अलावा देश के नव-धनिक वर्ग के हित भी शामिल हैं। फिर समिति की यह सिफारिश भी समस्याग्रस्त है कि ऐसा कदम सिर्फ शहरों में उठाया जाना चाहिए।

आसमान में जाने वाली ग्रीन हाउस गैसें किसी सीमा का पालन नहीं करती हैँ। ग्रीन हाउस गैसे चाहे धनी देशों में उत्पन्न हों, या गरीब देशों- शहर में या गांव में- जलवायु पर उनका समान असर होता है। इसलिए बेहतर यह होगा कि यह कदम पूरे देश के लिए उठाया जाए। गौरतलब है कि भारत ने अक्षय ऊर्जा से अपनी 40 फीसदी बिजली का उत्पादन करने का लक्ष्य भी घोषित किया है। ऐसे में उत्सर्जन के एक स्रोत पर पूरा नियंत्रण जरूरी है। समिति ने कहा है कि 2030 तक, ऐसी सिटी बसें नहीं जोड़ी जानी चाहिए जो बिजली से नहीं चलती हों। लंबी दूरी की बसों को भी लंबी अवधि में बिजली से ही चलाना होगा। समिति ने माल ढोने के लिए रेलवे और गैस से चलने वाले ट्रकों का अधिक इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। गौरतलब है कि भारत में डीजल की 80 फीसदी खपत ट्रांसपोर्ट सेक्टर में होती है। तो समिति ने सरकार के सामने एक रोडमैप रख दिया है। अब आगे सब कुछ सरकार के राजनीतिक साहस पर निर्भर है।

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