बूढ़ा पहाड़
बेमौसम की बारिश

वैज्ञानिक दशकों से चेतावनी दे रहे हैं कि सरकारों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने रणनीति नहीं बनाई, तो ये समस्याएं बढ़ती जाएंगी।

जलवायु परिवर्तन की मार

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की इस राय से सहज ही सहमत हुआ जा सकता है कि उनके देश पर जलवायु परिवर्तन की मार पड़ी है।

चिंता जताना काफी नहीं

यह बात तो अब दुनिया भर में कही जाने लगी है कि जलवायु परिवर्तन कोई भविष्य में आने वाला संकट नहीं है। बल्कि इसे हम अपने वर्तमान में होता देख रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन से यह भी

डेढ़ डिग्री तक की वृद्धि से आठ प्रतिशत पौधे अपनी आधी से ज्यादा किस्में खो देंगे।

जीना मुहाल हो जाएगा

अगर कार्बन उत्सर्जन को कम नहीं किया गया, तो जल्द ही भारत रहने लायक ही नहीं रह जाएगा।

जलवायु परिवर्तन से जीवन मुश्किल

दुनिया भर के देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने की कसमें खाते हैं लेकिन कम होने की बजाय कार्बन उत्सर्जन में 14 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है।

अज्ञान है असली समस्या

सूखा, बाढ़, अत्यधिक गर्मी और सर्दी जैसी आपदाओं की संख्या बढ़ी है। लेकिन सर्वे में शामिल दो तिहाई लोगों ने यही कहा कि यह सब ईश्वर की कृपा है।

किलर हीटवेव से लेकर बाढ़ तक, जलवायु परिवर्तन ने 2021 में मौसम की चरम सीमा को खराब कर दिया

वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी और भी बहुत कुछ होना बाकी है और इससे भी बदतर। क्योंकि पृथ्वी का वातावरण अगले दशक और उसके बाद भी गर्म होता जा रहा है।

सबक सीखें तो ठीक

अब यही न्यू नॉर्मल है। हम जलवायु परिवर्तन के जो असर को देख रहे हैं, जो हमारी पीढ़ी का सबसे बड़ा संकट है। लेकिन क्या इस बात से अमेरिकी राजनेता, खास कर रिपब्लिकन पार्टी सबक लेगी।

भड़, भड़, भड़….सिर्फ शोर

पृथ्वी मुश्किल में है और भविष्य धूमिल क्योंकि हर साल सबसे गर्म वर्ष हो रहा है और हर साल सबसे ठंडा वर्ष भी होता जा रहा है।.

कॉप का नकाब अब उतर गया है

दुनिया की सबसे धनी एक फीसदी आबादी बाकी पूरी आबादी की तुलना में 30 गुना ज्यादा उत्सर्जन कर रही है।

बरबादी साक्षात, फिर भी खबर नहीं!

लोग जलवायु परिवर्तन, आपदाओं-बीमारियों में मर रहे हैं, बरबाद हो रहे हैं लेकिन न खबर लेने और देने वाले और न ही घटनाओं की अखबार-टीवी चैनलों पर पहली खबर!

भारत और बाकी देश

डेंगू के मच्छर का खतरा है तो सड़क के ट्रैफिक की अनियंत्रित-अराजक भीड़ में दर्दनाक मौतों की घटनाओं की दहशत भी है।

हर मौसम मौत का सामान

जलवायु परिवर्तन की चिंता पिछले 50 साल की परिघटना है। उससे पहले किसी को इसकी चिंता नहीं थी लेकिन भारत तब भी इसकी मार झेलते हुए था और आज भी है।

परिवहन, प्रदूषण और जान-माल

छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में परिवहन के साधन नहीं हैं तो बड़े शहरों में निजी गाड़ियों की इतनी तादाद हो गई है कि सड़कों पर चलने के लिए जगह नहीं है।

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