किलर हीटवेव से लेकर बाढ़ तक, जलवायु परिवर्तन ने 2021 में मौसम की चरम सीमा को खराब कर दिया

वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी और भी बहुत कुछ होना बाकी है और इससे भी बदतर। क्योंकि पृथ्वी का वातावरण अगले दशक और उसके बाद भी गर्म होता जा रहा है।

सबक सीखें तो ठीक

अब यही न्यू नॉर्मल है। हम जलवायु परिवर्तन के जो असर को देख रहे हैं, जो हमारी पीढ़ी का सबसे बड़ा संकट है। लेकिन क्या इस बात से अमेरिकी राजनेता, खास कर रिपब्लिकन पार्टी सबक लेगी।

भड़, भड़, भड़….सिर्फ शोर

पृथ्वी मुश्किल में है और भविष्य धूमिल क्योंकि हर साल सबसे गर्म वर्ष हो रहा है और हर साल सबसे ठंडा वर्ष भी होता जा रहा है।.

कॉप का नकाब अब उतर गया है

दुनिया की सबसे धनी एक फीसदी आबादी बाकी पूरी आबादी की तुलना में 30 गुना ज्यादा उत्सर्जन कर रही है।

बरबादी साक्षात, फिर भी खबर नहीं!

लोग जलवायु परिवर्तन, आपदाओं-बीमारियों में मर रहे हैं, बरबाद हो रहे हैं लेकिन न खबर लेने और देने वाले और न ही घटनाओं की अखबार-टीवी चैनलों पर पहली खबर!

भारत और बाकी देश

डेंगू के मच्छर का खतरा है तो सड़क के ट्रैफिक की अनियंत्रित-अराजक भीड़ में दर्दनाक मौतों की घटनाओं की दहशत भी है।

हर मौसम मौत का सामान

जलवायु परिवर्तन की चिंता पिछले 50 साल की परिघटना है। उससे पहले किसी को इसकी चिंता नहीं थी लेकिन भारत तब भी इसकी मार झेलते हुए था और आज भी है।

परिवहन, प्रदूषण और जान-माल

छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में परिवहन के साधन नहीं हैं तो बड़े शहरों में निजी गाड़ियों की इतनी तादाद हो गई है कि सड़कों पर चलने के लिए जगह नहीं है।

बच्चों की मौत, कुपोषण पर भी चर्चा नहीं

पिछले दिनों दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में अचानक बच्चों के मरने की खबरें आईं। किसी रहस्यमयी बीमारी से बच्चों की मौत शुरू हुई।

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56% युवा मानते है कि उनका भविष्य चौपट – अर्नस्ट गिबसन, जिये बसतिदा, क्लोवर होगन, फोर्स ऑफ नेचर, वनेसा नकाटे, युगांडा

सीओपी26 क्या है और क्या मायने रखता है

सीओपी भिन्न पक्षों के कांफ्रेंस को कहा जाता है – 196 देशों का वार्षिक, वैश्विक शिखर सम्मेलन जो संयुक्त राष्ट्र जलवायु संधि का हिस्सा है और जलवायु की तबाही को टालने की कोशिश कर रहा।

जलवायु की जुबानी सेवा

अलग-अलग देशों ने अपनी अलग-अलग समयसीमा तय की हुई है, लेकिन तमाम रिपोर्टें बताती हैं उस दिशा में यथोचित प्रगति नहीं हो रही है।

कोई फ़ौरी समाधान नहीं

2021 की इस संस्था की सूची में भारत उन पहले 10 देशों में है, जिनके लिए जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा खतरा पैदा हो रहा है।

खतरे की ये घंटियां!

हकीकत यही है कि भारत में जलवायु परिवर्तन या पर्यावरण क्षरण को लेकर ना तो कोई सामाजिक चेतना है, और ना ही देश के राजनीतिक दल इसको लेकर चिंतित नजर आते हैँ।

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