पाकिस्तान की सेना संभवतः यह भूल गई है कि जब वहां किसी लोकप्रिय नेता को राजनीति से हटाने की जब कोशिशें हुईं, तो उसके कैसे नतीजे सामने आए। ऐसे कदमों से असंतोष बढ़ा और स्थायी समस्याएं पैदा हुईं। एक बार तो देश का बंटवारा ही हो गया।
अब यह साफ है कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को सियासी रूप से नष्ट करने में वहां का ‘ऐस्टैबलिशमेंट’ (सेना+खुफिया नेतृत्व) फिलहाल सफल हो गया है। इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) में अब गिने-चुने नेता ही बचे हैँ। बाकी नेता ऐस्टैबलिशमेंट का दबाव नहीं झेल पाए, जैसा करना पाकिस्तान में कभी आसान नहीं रहा है। जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1970 के दशक में ऐसा करने की कोशिश की थी, तो उसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। अब इमरान खान पर भी एक वकील की हत्या के मामले में मुकदमा दर्ज कराया जा चुका है। कई हलकों में इसे भुट्टो कांड की पुनरावृत्ति के रूप में देखा गया है। बहरहाल, इमरान खान के मामले में पाकिस्तान की सेना उस हद तक जाएगी या नहीं, यह अभी साफ नहीं है। यह स्पष्ट है कि पीटीआई की सियासी हत्या का काम काफी आगे बढ़ चुका है। पिछले दिनों पार्टी से निकले नेता जहांगीर खान तरीन ने अपनी नई पार्टी बना लीहै। इसका नाम इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान (आईपीपी) रखा गया है।
आम राय है कि में यह पार्टी ऐस्टैबलिशमेंट की शह पर और उसके निर्देशन में बनाई गई है। इसका मकसद इमरान खान को राजनीति से अलग-थलग करना और पाकिस्तान में ऐस्टैबलिशमेंट की मन-माफिक विपक्षी पार्टी का गठन है। आईपीपी में कई ऐसे नेता शामिल हुए हैं, जिन्होंने पिछले एक महीने के दौरान पीटीआई छोड़ी है। यह खेल इतने खुले रूप में खेला जा रहा है कि वहां के कुछ साहसी टीकाकार इसे सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं। उन्होंने यह बताया है कि इमरान खान को यह संदेश दिया गया कि वे या तो खुद को राजनीति से अलग कर लें या अपनी आंखों के सामने अपनी पार्टी नष्ट होती देखें। ऐसा करते हुए ऐस्टैबलिशमेंट यह भूल गया कि पाकिस्तान में लोकप्रिय नेता को राजनीति से हटाने की जब कोशिशें हुईं, तो उसके कैसे नतीजे सामने आए। ऐसे कदमों से असंतोष बढ़ा और स्थायी समस्याएं पैदा हुईं। शेख मुजीबुर रहमान के साथ पहले ऐसी कोशिश हुई थी और फिर भुट्टो के साथ। अब इमरान खान अगले ऐसे नेता बने हैं।
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