नई दिल्ली। केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के जो फैसले होते हैं वो न्यायिक सुनवाई से ऊपर होते हैं। उनके फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते। साथ ही सरकार ने अदालत से यह भी कहा कि राज्यपालों और राष्ट्रपति को किसी मसले में निर्देश देने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को नहीं है। गुरुवार को हुई सुनवाई में केंद्र ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल की विधानसभा से पास बिलों पर कार्रवाई के खिलाफ राज्य सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर नहीं कर सकते।
केंद्र सरकार ने कहा कि राज्य सरकारें अनुच्छेद 32 का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। क्योंकि मौलिक अधिकार आम नागरिकों के लिए होते हैं, राज्यों के लिए नहीं। राष्ट्रपति की ओर से अनुच्छेद 143 के तहत भेजे गए रेफरेंस पर सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राष्ट्रपति जानना चाहती हैं कि क्या राज्यों को रिट याचिका दायर करने का अधिकार है? उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 361 के मुताबिक राष्ट्रपति और राज्यपाल अपने फैसलों के लिए कोर्ट में जवाबदेह नहीं होते।
केंद्र ने कहा कि कोर्ट राष्ट्रपति या राज्यपाल को कोई निर्देश नहीं दे सकती क्योंकि उनके फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते। दूसरी ओर अदालत ने कहा कि यदि कोई राज्यपाल छह महीने तक बिल लंबित रखता है तो यह भी सही नहीं है। चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने राज्य सरकारों की तरफ से भेजे बिलों पर राज्यपालों और राष्ट्रपति के दस्तखत करने के लिए डेडलाइन लागू करने वाली याचिका पर सुनवाई की। 15 मई, 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट को एक रेफरेंस भेजा और अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों से जुड़े 14 सवालों पर कोर्ट की राय मांगी थी।
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