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अगड़े, शंकराचार्य: ये भाजपा के प्रयोग है!

यह संयोग नहीं है कि करीब तीन साल तक आधा दर्जन से ज्यादा पिछड़ी जाति के नेताओं को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की चर्चा करने के बाद भाजपा ने अगड़ी जाति के नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया और उसके बाद यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के नाम पर ऐसा नियम पेश किया, जिसके खिलाफ पूरा सवर्ण समाज आंदोलित हुआ। यह भी संयोग नहीं है कि एक शंकराचार्य को माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन स्नान से रोका गया और 11 दिन के अनशन के बाद भी किसी ने अनशन समाप्त कराने का प्रयास नहीं किया। उलटे शंकराचार्य की साख बिगाड़ने और उनके पट्टाभिषेक को विवादित साबित करने वाले काम हुए।

शंकराचार्य को मेला प्रशासन ने नोटिस देकर उनकी पदवी के बारे में सफाई मांगी और दूसरी नोटिस में उनको धमकाया कि जमीनें ले ली जाएंगी और सुविधाएं छीन ली जाएंगी। हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी अगर हिंदू धर्म की धार्मिक व आध्यात्मिक परंपरा के शिखर पर बैठे चार में से एक शंकराचार्य को धमकी दे रही है तो वह अनायास नहीं हो सकता है।

संभव है कि ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ रविवार, 18 जनवरी को जो घटना हुई वह अचानक हो गई हो। वे पालकी से स्नान के लिए जा रहे थे और भीड़ बहुत होने की वजह से उनको रोका गया हो। लेकिन उसके बाद जो कुछ भी हो रहा है वह एक राजनीतिक योजना का हिस्सा प्रतीत होता है। ऐसा लग रहा है कि शंकराचार्य से पुरानी बातों और उनके बयानों का बदला लिया जा रहा है और उस पद के महत्व को हमेशा के लिए समाप्त किया जा रहा है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अक्सर विवादित बयान देते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनके विवादित बयानों से अछूते नहीं रहे हैं। उन्होंने पिछले साल प्रयागराज के महाकुंभ में हुई भगदड़ और लोगों की मौत को लेकर राज्य की योगी आदित्यनाथ की सरकार को भी कठघरे में खड़ा किया था।

ध्यान रहे भारत में शंकराचार्य का पद कभी भी ईसाई धर्म के वेटिकन के पोप की तरह या इस्लाम धर्म के मौलानाओं, शाही इमामों या खलिफाओं की तरह नहीं रहा है। वे हिंदू धर्म के लिए कोई दिशा निर्देश नहीं जारी करते हैं और उनके प्रति सम्मान का भाव रखने वाला हिंदू समाज भी उनके हिसाब से अपना जीवन चलाने के लिए बाध्य नहीं होता है। वे सनातन की आध्यत्मिक परंपरा के सर्वोच्च प्रतिनिधि होते हैं। आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत का जो सिद्धांत दिया वे उसका प्रतिनिधित्व करते हैं और भारत के एक राष्ट्र राज्य के तौर पर उभरने से पहले शंकराचार्य द्वारा निर्धारित की गई भौगोलिक सीमा के चारों कोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस लिहाज से उनका अपना महत्व है।

शंकराचार्यों की बातों को हिंदू जीवन पद्धति में हस्तक्षेप के तौर पर कभी नहीं देखा गया लेकिन पिछले कुछ समय से कुछ शंकराचार्यों और अन्य धर्मगुरुओं या कथावाचकों का राजनीति में हस्तक्षेप बढ़ा है। अपने समर्थकों या प्रशंसकों की संख्या बढ़ाने के लिए वे लोकप्रिय भावना के अनुरूप बयानबाजी करने लगे। इसमें कथावाचक और धर्म को कारोबार बनाने वालों ने तो सहज रूप से सबसे शक्तिशाली दल और सरकार के समर्थन में बोलना शुरू कर दिया लेकिन आध्यात्मिक परंपरा का पालन करने वाले शंकराचार्यों ने ऐसा नहीं किया।

तभी जब सौंदर्यीकरण के नाम पर मंदिर तोड़े गए तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की तुलना औरंगजेब से कर दी या जब अयोध्या में राममंदिर संपूर्ण नहीं हुआ था, उसका शिखर नहीं बना था, उस पर ध्वजा नहीं फहराई गई थी तो चारों शंकराचार्य उसके उद्घाटन में शामिल होने नहीं गए। हो सकता है कि इससे राजसत्ता में नाराजगी हुई हो। राजसत्ता ने धर्मसत्ता को अपने लिए चुनौती की तरह देखा हो और अविमुक्तेश्वरानंद के पुराने राजनीतिक बयानों को आधार बना कर उनके बहाने शंकराचार्य की समूची व्यवस्था की साख बिगाड़ने और उसका महत्व कम करने का प्रयास किया जा रहा हो।

यह भी हो सकता है कि प्रयागराज में माघ मेले में हुई घटना के बहाने सबक देने की कोशिश हुई हो ताकि आगे यह सुनिश्चित किया जा सके कि धर्मसत्ता कभी भी राजसत्ता का विरोध न करे। शंकराचार्य इस बात को समझ रहे हैं तभी धीरे धीरे बाकी तीन शंकराचार्यों, द्वारिका की शारदा पीठ के सदानंद जी महाराज, पुरी की गोवर्धन पीठ के स्वामी निश्चलानंद जी महाराजा और शृंगेरी पीठ के स्वामी भारती तीर्थ जी महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया है। पहले अगर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक को लेकर कुछ संशय़ था तो उसे दरकिनार करके तीनों शंकराचार्य उनके समर्थन में उतरें हैं।

ध्यान रहे शंकराचार्य का चयन शंकराचार्य ही करते हैं। उसके बाद ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि बाकी शंकराचार्य उसका समर्थन करें। इस लिहाज से अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति विवादित नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि उनके गुरू और शारदा पीठ व ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उनकी नियुक्ति की थी। ज्योतिषपीठ विवाद में इसलिए फंसा क्योंकि स्वरूपानंद सरस्वती दो पीठों के शंकराचार्य थे। सवाल उठाया गया कि एक व्यक्ति दो पीठ का शंकराचार्य नहीं हो सकता है। इसी तरह से यह भी परंपरा है कि कोई भी पीठ खाली नहीं रहेगी। सो, अगर अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य नहीं माना जाए तो क्या तीन साल से ज्यादा समय से ज्योतिषपीठ खाली है?

बहरहाल, सरकार को इन तमाम बातों की जानकारी है। इसके बावजूद शंकराचार्य से जुड़े विवाद को बढ़ने दिया गया और उनको ससम्मान स्नान करा कर विदा करने और विवाद समाप्त करने की बजाय उनको धमकाया गया। सोचें, जो सरकार या जो पार्टी हत्या और बलात्कार के दोषी ठहराए गए या आरोपी बनाए गए कथावाचकों व कथित संतों को समस्त सुविधाएं देती हो वह एक शंकराचार्य के साथ ऐसा बरताव करे तो क्या इसे सामान्य घटना मान सकते हैं? असल में देश हजारों की संख्या में जो कथावाचक पैदा हुए हैं या कथित साधु, संत, बाबा, महामंडलेश्वर पैदा हुए हैं उनका स्वार्थ है। वे ज्यादा से ज्यादा शिष्य या श्रोता बनाने के लिए काम करते हैं और पैसे कमाने, राजनीति को प्रभावित कर सकने वाली हस्ती बनाने और तमाम भौतिक सुख सुविधाएं हासिल करने के लिए काम करते हैं। इनमें कुछ अपवाद भी होंगे लेकिन ज्यादातर ऐसे ही हैं। ऐसे लगभग सभी लोग भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करते हैं और दिन रात प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्रियों का गुणगान करते हैं। शंकराचार्य ये काम नहीं करते हैं और न कर सकते हैं। वे धर्म, आध्यात्म और समाज से जुड़े गंभीर प्रश्न उठाते हैं, जिससे सरकार असहज होती है।

तभी अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने शंकराचार्य के पद की प्रतिष्ठा को समाप्त किया जा रहा है। उनकी जगह कथावाचकों व अनाप शनाप बयानबाजी करने और हिंदू मुस्लिम नैरेटिव को बढ़ाने का काम करने वाले कथित साधु संतों का महिमामंडन किया जा रहा है। एक बारीक बात यह है कि शंकराचार्य पारंपरिक रूप से ब्राह्मणवादी व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस तरह से यूजीसी के नए नियमों का मकसद पिछड़ी जातियों को एक संदेश देना है उसी तरह शंकराचार्य को टारगेट करके भी पिछड़ी जातियों को संदेश दिया जा रहा है कि सरकार पारंपरिक ब्राह्मणवादी व्यवस्था को समाप्त कर रही है।

असल में भाजपा को लग रहा है कि कांग्रेस, सपा, राजद जैसी विपक्षी पार्टियां ‘जितनी आबादी, उतना हक’ का नारा देकर अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी आबादी को अपने साथ जोड़ रही हैं। विपक्ष का यह वोट अपनी ओर करने की दीर्घकालिक योजना के तहत भाजपा नए प्रयोग कर रही है। वह कुछ आगे बढ़ेगी और कुछ पीछे हटेगी लेकिन यह प्रयोग चलेगा। उसको लग रहा है कि अंत में सवर्ण मतदाताओं के पास भाजपा के अलावा कोई चारा नहीं होगा। इसलिए वह एससी, एसटी और ओबीसी वोट सुरक्षित करने का प्रयास कर रही है। इसका एक बड़ा हिस्सा पहले से भाजपा के साथ है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद पिछड़ी जाति का प्रतीक चेहरा हैं। प्रधानमंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व का भी चेहरा हैं। इसलिए यह मैसेज भी दिया जा रहा है कि उनके रहते शंकराचार्यों की क्या जरुरत है! राजनीति में अक्सर नेता यह गलती करते हैं। वे अपना मूल छोड़ कर दूसरे का वोट हथियाने की कोशिश करते हैं और इस कोशिश में अपना मूल भी गंवा देते हैं।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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