नक्सलवाद खत्म होने में अब दो हफ्ते से कम समय बचे हैं। अगर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के तय किए गए लक्ष्य के मुताबिक बिल्कुल सटीक कहें तो आज से 14 दिन के बाद 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। लेकिन क्या सचमुच उग्र वामपंथी हिंसा समाप्त हो जाएगी या इसके समाप्त होने की सरकारी घोषणा होगी और किसी न किसी रूप में इसका अस्तित्व बचा रहेगा? यह सवाल इसलिए है क्योंकि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार देश को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर चुकी है लेकिन देश के दूसरे हिस्सों की तो छोड़िए राजधानी दिल्ली में ही रोज सुबह हजारों लोग हाथ में पानी से भरी बोतल लेकर शौच के लिए जाते दिख जाते हैं।
बहरहाल, यह सवाल उठाने का मकसद सरकार की मंशा पर सवाल उठाना नहीं है। सरकार की मंशा अच्छी और स्पष्ट है और साथ ही सरकार का अभियान भी बहुत कारगर तरीके से चल रहा है। इसका परिणाम है कि सीपीआई माओवादी से जुड़े अनेक बड़े उग्रवादी मारे जा चुके हैं और बचे हुए उग्रवादियों ने सरेंडर कर दिया है। नम्बाला केशव राव उर्फ बसवराजू और माधवी हिडमा का मारा जाना और देवजी का सरेंडर करना इस अभियान की कामयाबी का एक अहम अध्याय है। इनके अलावा सैकड़ों उग्रवादी मारे गए और हजारों ने सरेंडर किया।
असल में वामपंथी उग्रवाद पिछले कई दशकों से देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बना रहा है। छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में तो नक्सली गतिविधियों ने लंबे समय तक शासन व्यवस्था और विकास को प्रभावित किया। यूपीए की सरकार के समय ऑपरेशन ग्रीन हंट ने पश्चिम बंगाल में और कोबरा बटालियन की कार्रवाई ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में नक्सलवाद को निर्णायक रूप से नुकसान पहुंचाया। पिछले कुछ सालों से केंद्र और राज्य सरकारों ने साझा तौर पर नक्सलवाद के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया। इसमें लगातार मिल रही कामयाबी से उत्साहित होकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया कि 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद निर्णायक रूप से समाप्त हो जाएगा। इसके लिए उन्होंने खुद बड़ी मेहनत की। वे पहले केंद्रीय गृह मंत्री बने, जिन्होंने नक्सल प्रभावित बस्तर में रात्रि विश्राम किया। वे लगातार नक्सल प्रभावित इलाकों का दौरा करते रहे और सुरक्षा बलों की साझा कार्रवाई को मॉनिटर करते रहे।
केंद्र सरकार ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के साथ साथ दूसरे अर्धसैनिक बलों को भी नक्सलवाद खत्म करने के लक्ष्य को पूरा करने में लगाया और साथ ही राज्यों की पुलिस और डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड यानी डीआरजी और खासतौर से इस काम के लिए बनाई गई टास्क फोर्स का भी इस्तेमाल किया। इसके बावजूद यह समझने की जरुरत है कि नक्सलवाद सिर्फ कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह एक विशेष सामाजिक परिस्थितियों में पैदा हुआ आंदोलन है। पिछली सदी में साठ के दशक में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से इसकी शुरुआत हुई थी।
इसकी शुरुआत भूमिहीन किसानों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए हुई थी। यह सही है कि समय के साथ यह हिंसक उग्रवाद में बदल गया और नक्सली संगठनों ने सरकारी संस्थानों, सुरक्षा बलों और विकास परियोजनाओं को निशाना बनाना शुरू किया। इसके बावजूद यह बुनियादी तत्व कहीं न कहीं मौजूद रहा कि राज्य के विरूद्ध यह लड़ाई कमजोर, शोषित और वंचित को अधिकार दिलाने के लिए है। आंदोलन से जुड़े रणनीतिकारों ने उन क्षेत्रों को खासतौर से निशाना बनाया, जहां शासन की कमजोर उपस्थिति थी, जहां गरीबी थी, विकास की कमी थी और स्थानीय स्तर पर आक्रोश विद्यमान था। उन्होंने इनका इस्तेमाल अपना आधार बढ़ाने के लिए किया।
जाहिर है इसकी जड़ें सामाजिक व आर्थिक विषमताओं में छिपी हैं और इसलिए यह एक जटिल सामाजिक समस्या के तौर पर लंबे समय तक मौजूद रही। तभी इसे खत्म करने के लिए बहुआयामी अभियान की जरुरत थी। देर से ही सही लेकिन सुरक्षा बलों की आक्रामक कार्रवाई के साथ साथ नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास पहुंचाने का प्रयास शुरू हुआ। प्रशासनिक सुधार हुए और शासन की उपस्थिति बढ़ाई गई। मौजूदा सरकार ने नक्सलवाद से लड़ने की रणनीति में बदलाव किया। सबसे पहले सुरक्षा बलों को जंगल की गहराई तक पहुंचाया गया। सुरक्षा बलों ने नक्सल प्रभावित इलाकों में लगातार सर्च ऑपरेशन चलाए। साथ ही जंगलों में स्थायी कैंप बनाए गए ताकि नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म किया जा सके। सुरक्षा बलों ने नक्सलवाद के खिलाफ अभियान में आधुनिक तकनीक का भी व्यापक इस्तेमाल हुआ। ड्रोन, सेटेलाइट इमेजिंग, बेहतर संचार प्रणाली और आधुनिक हथियारों ने सुरक्षा बलों की क्षमता को काफी बढ़ाया। इसके साथ ही, इंटेलिजेंस नेटवर्क को मजबूत किया गया। स्थानीय समुदायों के साथ बेहतर संबंध बनाए गए, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को महत्वपूर्ण सूचनाएं मिलने लगीं।
इसके साथ साथ बुनियादी ढांचे के निर्माण और विकास पर भी ध्यान दिया गया। सड़क, बिजली, मोबाइल नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा का प्रसार दूरदराज के जंगलों तक किया गया। जब सरकारी योजनाओं का लाभ जंगल के लोगों को मिलने लगा तो उनका नक्सलियों से मोहभंग हुआ। इसके बाद सरकार ने नक्सलियों के लिए आत्मसमर्पण और पुनर्वास की नीति शुरू की। इसके तहत हथियार छोड़ने वालों को आर्थिक सहायता, प्रशिक्षण और समाज में पुनर्वास की सुविधा दी गई। इससे बड़ी संख्या में नक्सली मुख्यधारा में लौटे। इन सबका मिलाजुला असर यह हुआ कि नक्सलवाद का प्रभाव काफी घट गया। एक एक करके नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या कम होती गई। पिछले कुछ समय में नक्सलवाद सिमट कर छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के कुछ क्षेत्रों में रह गया था। सो, सरकार और सुरक्षा बलों की ओर से चलाए जाने वाले अभियान का केंद्र इन इलाकों को बनाया गया। तभी कह सकते हैं कि सरकार की बहुआयामी रणनीति कामयाबी के बहुत नजदीक पहुंच गई है।
इसके बावजूद यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या नक्सलवाद के खिलाफ चल रहा अभियान 31 मार्च तक पूरी तरह समाप्त हो सकता है? यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि नक्सलवाद के खिलाफ अभियान पूर्णता तक पहुंच जाएगा। परंतु इस बात को भी ध्यान में रखने की जरुरत है कि लंबे समय से चल रहे किसी भी उग्रवादी आंदोलन को एक निश्चित तारीख तक पूरी तरह खत्म करना कठिन होता है। हो सकता है कि छिटपुट तरीके से उसके बाद भी हिंसा हो। हो सकता है कोई छोटा समूह या कुछ उग्रवादी अपना अभियान चलाते रहें क्योंकि सीपीआई माओवादी से अलग हुए कई गुट झारखंड में सक्रिय हैं।
ऐसे गुटों से निपटने के लिए स्थानीय स्तर की रणनीति बनानी होगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार ने नक्सलवाद को निर्णायक रूप से कमजोर कर दिया है। इसका प्रभाव क्षेत्र नगण्य रह गया है। अगर विकास, सामाजिक न्याय और स्थानीय लोगों के विश्वास को मजबूत बनाए रखा जाता है तो इनके बचे खुचे समूहों को भी खत्म किया जा सकता है और आगे पनपने से रोका जा सकता है। लेकिन उससे पहले दूरदराज के छोटे छोटे समूहों को भी खत्म करना होगा, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार की व्यवस्था करनी होगी और उनकी आर्थिक सुरक्षा का ध्यान रखना होगा ताकि वे फिर से किसी उग्रवादी संगठन में भर्ती न हो सकें। इसके साथ साथ विकास परियोजनाओं को जारी रखते हुए आदिवासी समूहों के साथ प्रशासन का नियमित संपर्क सुनिश्चित करना होगा।


