बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री ने भगवान कृष्ण को लेकर जो बयान दिया वह अनायास नहीं था और न भाव में बह कर दिया गया था। वह एक सोची समझी टिप्पणी थी, जिसका बड़ा राजनीतिक अर्थ है और गहरा सांस्कृतिक उद्देश्य भी है। इस बात को समझने के लिए दो बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। पहली बात तो यह कि धीरेंद्र शास्त्री के बयान पऱ भारतीय जनता पार्टी ने पूरी तरह से चुप्पी साध ली। भाजपा के किसी भी कथित सनातनी नेता ने इसका प्रतिकार नहीं किया।
धर्मशास्त्र के ज्ञाता सुधांशु त्रिवेदी से लेकर हर मुद्दे पर बयान देने वाले गिरिराज सिंह तक सब खामोश रहे। भाजपा के छोटे मोटे प्रवक्ताओं ने इस पर बयान दिया लेकिन उनका निशाना धीरेंद्र शास्त्री नहीं, बल्कि अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव थे। भाजपा की चुप्पी और धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और पप्पू यादव की मुखरता से इसके राजनीतिक उद्देश्य को समझा जा सकता है।
दूसरी बात यह है कि धीरेंद्र शास्त्री के इस बयान को उनके पिछले दिनों दिए गए बयानों से मिला कर देखना चाहिए। उन्होंने कुछ दिन पहले पश्चिम बंगाल जाकर लोगों से दुर्गापूजा के दौरान मांसाहार नहीं करने की अपील की थी। जब इस पर विवाद हुआ तो प्रदेश भाजपा के नेताओं ने मंदिर में बैठ कर मांसाहार किया और उसकी वीडियो पोस्ट की। उस समय भी प्रदेश के कुछ नेताओं ने धीरेंद्र शास्त्री की खूब आलोचना की। लेकिन राष्ट्रीय नेता उस समय भी चुप्पी साधे रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि हिंदू हितों के झंडाबरदार संगठनों ने भी उनकी बातों के प्रति मौन सहमति प्रदर्शित की। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह बयान राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा के प्रोजेक्ट हिंदुत्व की धारणाओं के संगत बैठता था।
बहरहाल, भगवान कृष्ण को लेकर दिया गया धीरेंद्र शास्त्री का बयान पहली नजर में विशुद्ध रूप से राजनीतिक दिखता है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले इस पर जैसी प्रतिक्रिया वांछित थी वैसी ही हुई है। बयान आते ही अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, पप्पू यादव जैसे नेता धीरेंद्र शास्त्री के विरोध में उतर गए। उन्होंने मुद्दा तो सनातन धर्म और हिंदुत्व का बनाया लेकिन लोगों को यह समझ में आया यदुकुल में पैदा हुए भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण की निंदा हुई तो यदुवंशी नेता नाराज हुए और इसके खिलाफ उतरे। यह हिंदुत्व के व्यापक छाते से यादवों को बाहर करने की रणनीति हो सकती है। इससे भाजपा द्वारा गैर यादव पिछड़ों और अन्य हिंदुओं को एकजुट करने के प्रयास में मदद मिलेगी। कम से कम पहली नजर में यह उद्देश्य दिख रहा है। इसलिए भी भाजपा के तमाम बड़े नेता चुप्पी साध गए। तभी सवाल है कि क्या मथुरा में बांके बिहारी मंदिर और शाही ईदगाह का विवाद आस्था से ज्यादा सांप्रदायिक तनाव पैदा करने और राजनीतिक लाभ लेने का मुद्दा है? अगर नहीं है तो भगवान श्रीकृष्ण के अपमान के विरोध में पूरी भाजपा को धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ उतरना चाहिए था।
यह फालतू का तर्क है कि हिंदू धर्मग्रंथों में निंदा स्तुति के प्रमाण हैं। भाजपा के समर्थक अलग अलग धर्मग्रंथों की मिसाल देकर कह रहे हैं कि आराध्य की निंदा या उनसे शिकायत पहले भी की जाती रही है और हर निंदा को द्वेष नहीं कह सकते हैं। इस तर्क के सहारे राइटविंग इकोसिस्टम के लोग धीरेंद्र शास्त्री का बचाव कर रहे हैं। परंतु धीरेंद्र शास्त्री जिस अंदाज में ‘हमारे वाले’ और ‘तुम्हारे वाले’ ठाकुर जी की बात कर रहे थे, उस समय उनके चेहरे का जैसा भाव था, जैसी देह भंगिमा थी वह स्तुति करने वाली तो कहीं से नहीं थी। वह विशुद्ध रूप से चिढ़ाने या अपमानित करने के भाव से अपनी बात कह रहे थे। उनके भाव में भक्ति नहीं थी और न भक्त का कोई हठ था। तुलसीदास के नाम से एक दोहा बहुत प्रचलित है, ‘का बरनौं छवि आपकी भले बने हो नाथ, तुलसी मस्तक तब नवै जब धनुष बाण हो हाथ’। हालांकि यह दोहा तुलसीदास के किसी प्रमाणिक ग्रंथ में संकलित नहीं है लेकिन लोकश्रुति के माध्यम से बहुत प्रचलित है।
इसके पीछे की कहानी यह है कि तुलसीदास ने वृंदावन के मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने सिर नहीं झुकाया था क्योंकि वे भगवान राम को अपना आराध्य मानते थे। तब उन्होंने यह दोहा कहा और भगवान विष्णु ने उन्हें धनुष, बाण के साथ यानी श्रीराम के रूप में दर्शन दिए। इस दोहे में भगवान श्रीकृष्ण की निंदा नहीं की गई है या उनका मजाक नहीं उड़ाया गया, बल्कि उनके मोहक रूप को अद्भुत बताया गया है। इसके उलट धीरेंद्र शास्त्री कृष्ण के रूप और गुण दोनों की आलोचना कर रहे थे। वे श्रीकृष्ण को रूप में ‘टेड़ा’ बता रहे थे और बांसुरी बजाने के लिए कह रहे थे कि ‘यह तो खेल है’।
असल में भगवान विष्णु के अलग अलग अवतारों को मानने के मामले में हिंदू समाज में पहले भी एक पतली सी विभाजन रेखा रही है। लेकिन किसी धर्मगुरू ने उस विभाजन रेखा को पार करने का ऐसा कुत्सित प्रयास नहीं किया था। क्षत्रिय कुल में पैदा होने के कारण मात्र से एक बड़ी आबादी अपने को भगवान राम से जोड़ती है और भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम के प्रति नाराजगी का भाव रखती है। लेकिन अपने को परशुराम का वंशज मानने वालों ने ही सहस्त्राब्दियों से रघुवंश व यदुवंश दोनों के अवतारों को हिंदू मानस में स्थापित किया।
यह भी ध्यान रखने की जरुरत है कि सहस्त्राब्दियों के बाद हिंदू धर्म की अलग अलग मान्यताओं और परंपराओं को एक सूत्र में पिरोया गया है। बड़ी मुश्किल से शैव और वैष्णव या वैष्णव व शाक्त का विवाद या वैष्णव धर्म के अखाड़ों की लड़ाइयां सुलझाई गई हैं।
ऐसे में धीरेंद्र शास्त्री का यह बयान या पश्चिम बंगाल में दिया गया बयान सदियों पहले बंद हो चुके उस अध्याय को खोलने और विभाजन रेखा को चौड़ा करने का प्रयास दिख रहा है। यह व्यापक रूप से हिंदू समाज को एक रंग में रंगने का प्रयास है, जिससे अंततः हिंदू धर्म कमजोर होगा। यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि हिंदू धर्म की ताकत इसकी विविधता और लचीलापन है। बहुदेववाद की अवधारणा और सभी देवताओं के लिए एक समान सम्मान का भाव इसके अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। इसे चुनौती देना या इस व्यवस्था को जोर जबरदस्ती बदलने का प्रयास करना अंततः नुकसान पहुंचाने वाला साबित होगा। कम से कम अपने को पीठाधीश्वर कहने वालों को इस तरह की बातों से बचना चाहिए। इसमें चिंता की बात यह भी है कि अब तक ‘हम’ और ‘वे’ की अभिव्यक्ति हिंदू बनाम अन्य धर्म का भेद दिखाने के लिए किया जाता था। अब हिंदू धर्म के भीतर ही ‘हमारे वाले’ और ‘तुम्हारे वाले’ ठाकुर जी की विभाजन रेखा खींची जा रही है। अगर इसे अभी नहीं रोका गया तो भविष्य में इसका कितना बड़ा नुकसान होगा इसकी कल्पना भी डराने वाली है।
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