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संस्थाओं का जवाबदेह होना अच्छी बात है

संस्थाओं का जवाबदेह होना और जन भावना के अनुरूप काम करना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है। हालांकि कई बार जन भावना को संतुष्ट करना संविधान और कानून सम्मत नहीं होता है। फिर भी लोकतंत्र में जनता की ताकत सबसे बड़ी है और सभी संस्थाएं कम से कम सिद्धांत रूप में जनता के लिए ही काम करती हैं। हाल के दिनों में यह परिघटना देखने को मिली है कि संसद से लेकर सरकार और अदालतों तक तमाम संस्थाएं जन भावना को महसूस कर रही हैं और जन दबाव में फैसला कर रही हैं। इसे अच्छा संकेत मानना चाहिए। हालांकि इसमें भी अगर थोड़ा और बारीकी में जाएं तो दिखेगा कि जन भावना असल में युवाओं की भावना है, जिसने सरकार और अन्य संस्थाओं को मजबूर किया है। यह बहुत शानदार परिघटना है कि देश की संस्थाएं युवाओं से डर रही हैं या उनकी भावना का सम्मान कर रही हैं।

याद करें इससे पहले कब ऐसा हुआ था कि कोई संगठन अपनी मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन की इजाजत मांगे और प्रदर्शन शुरू होने से पहले सरकार उसकी मांग मान ले? प्रदर्शन से घबरा कर सरकारें मांगें मानती रही हैं लेकिन इतनी जल्दी और इतने सहज तरीके से नहीं। जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन और युवाओं के तेवर ने सरकार को डराया है। नई पीढ़ी के युवाओं ने दिखाया कि वे किसी तरह के मोलभाव या समझौते को स्वीकार नहीं करते। उनकी मांग उनकी शर्तों पर मानी जानी चाहिए। सरकार को पहली बार यह बात स्वीकार करने में समय लगा था। तभी जंतर मंतर पर 35 दिन आंदोलन हुआ। लेकिन उसके बाद तो आंदोलन करने की जरुरत ही नहीं पड़ी। सिर्फ ऐलान किया और काम हो गया।

अच्छी बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी के पांच सितंबर को होने वाले मार्च पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। यह भी एक अच्छी मिसाल है। युवाओं ने सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा कर पांच सितंबर को मार्च का ऐलान किया तो एक सज्जन यह कहते हुए कोर्ट पहुंच गए कि 12 और 13 सितंबर को दिल्ली में ब्रिक्स का सम्मेलन है इसलिए सीजेपी को प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। उनका कोई लोकस स्टैंडाई यानी कानूनी आधार नहीं था। लेकिन ऐसा लगता है कि वे दिल्ली पुलिस और सरकार के प्रॉक्सी के तौर पर याचिका दायर करने गए थे। तभी सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही इसे खारिज किया वैसे ही दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आग्रह किया कि वह संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सारे एफआईआर रद्द करने का आदेश दे। गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी की यही मांग थी। इसका वादा सरकार ने 25 जुलाई को उनसे किया था। लेकिन एक महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी 20 जुलाई के संसद मार्च के समय हुए मुकदमे वापस नहीं हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सहित देश भर में दर्ज मुकदमे रद्द करने का आदेश दिया और साथ ही नीट यूजी के पेपर लीक के बाद सुसाइड करने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवजा देने का भी आदेश दिया।

यह और अच्छी बात है कि न्यायपालिका भी युवाओं की भावना का ख्याल रख रही है। इसकी दो मिसालें हैं। पहली तो यह कि कॉकरोच जनता पार्टी के मार्च को अदालत ने नहीं रोका और सारे एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया। दूसरी मिसाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा को अच्छा सबक सिखाया। असल में बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष का कार्यकाल दो साल का था, जिसे मनमाने तरीके से बढ़ा कर पांच साल कर दिया गया था। अदालत ने इसका संज्ञान लिया। इस संज्ञान लेने की भी एक पृष्ठभूमि है। असल में हैदराबाद की लॉ यूनिवर्सिटी नलसार के छात्रों ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाने का विरोध किया था। वे कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान चीफ जस्टिस की कथित टिप्पणियों से नाराज थे। नलसार के छात्रों ने जब यह ऐलान किया तो बीसीआई ने आगे बढ़ कर कह दिया कि नलसार के इस बैच के छात्रों का वकील के तौर पर एनरॉलमेंट नहीं होगा। पहले तो चीफ जस्टिस ने इस पर फटकार लगाई, जिसके बाद बीसीआई को यह फैसला वापस लेना पड़ा और अब चीफ जस्टिस ने बीसीआई के चीफ मनन मिश्रा को कार्यकाल कम करने और चुनाव कराने को कहा है। वे चुनाव तक तदर्थ अध्यक्ष रहेंगे।

चाहे इसे जन दबाव कहें या युवाओं का दबाव कहें या चुनाव की मजबूरी कहें देश के कई हिस्सों में यह देखने को मिला है कि सरकार पीछे हट रही है। राजधानी दिल्ली में राहुल गांधी संसद मार्ग थाने में जाकर धरने पर बैठे तो वे पैलेट गन का शिकार बने साहिल लोचब की ओर से एफआईआर दर्ज कराने में कामयाब हुए। उससे पहले पुलिस एफआईआर करने को तैयार नहीं थी। गौरतलब है कि साहिल को जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान 20 जुलाई को हुई पुलिस कार्रवाई में पैलेट गन के छर्रे लगे थे। इसी तरह की एक और घटना हाल में हुई, जब कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं ने संसद मार्ग थाने में बैठ कर एक बड़बोले राइटविंग कार्यकर्ता के ऊपर मुकदमा दर्ज कराया, जो दावा कर रहा था कि उसने जंतर मंतर पर एक सीजेपी कार्यकर्ता के पिता का सिर फोड़ दिया था। इसे लेकर एक राय यह भी है कि भीड़तंत्र के आगे संस्थाओं का सरेंडर करना ठीक नहीं है। लेकिन माईबाप सरकार और संस्थाओं की मनमानी की तुलना में तो यह ठीक ही है! हां, यह कह सकते हैं कि इसे एक दिशा देने की जरुरत है।

बहरहाल, सजग नागरिकों के सामने सरकार के झुकने की एक मिसाल राजस्थान की है, जहां भजनलाल सरकार ने साढ़े 12 सौ करोड़ रुपए का एक फंड बनाया है, जिससे स्कूलों का कायाकल्प किया जाएगा। इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी के लोगों ने स्कूलों की दुर्दशा दिखानी शुरू की तो शुरू में उनके ऊपर हमले हुए लेकिन बाद में सरकार झुकी। इसी तरह गोवा की सरकार ने धर्मांतरण का कानून टाल दिया है। उत्तराखंड, असम और गुजरात की तर्ज पर गोवा में भी धर्मांतरण रोकने का सख्त कानून लाया जा रहा था। लेकिन अगले साल के शुरू में होने वाले विधानसभा चुनाव की चिंता में गोवा की प्रमोद सावंत सरकार ने इसे टाल दिया है। ध्यान रहे एफसीआरए में बदलाव का बिल भी पहले केरल चुनाव की चिंता में टला और अब कुछ अज्ञात कारणों से टाल दिया गया है। सो, चाहे चुनाव की चिंता हो या सजग नागरिकों के दबाव की सरकारें और संस्थाएं जनता की बात सुन रही हैं और उनकी परवाह कर रही हैं तो इसे अच्छा और सुखद बदलाव कह सकते हैं।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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