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सभी छात्र समान नहीं होते हैं

जॉर्ज ऑरवेल के महान उपन्यास ‘एनिमल फार्म’ की कहानी में जो पशुओं का फार्म है वहां एक दीवार पर लिखा होता है, ‘सारे पशु एक समान होते हैं’। लेकिन जब सुअरों का पूरा नियंत्रण फार्म पर हो गया और उनको सत्ता का चस्का लग गया तो इस नारे को बदल दिया गया। नया नारा था, ‘सारे पशु एक समान होते हैं, लेकिन कुछ पशु ज्यादा एक समान होते हैं’। भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 में भी लिखा हुआ है कि, ‘कानून के समक्ष सभी नागरिक समान होते हैं’। लेकिन सबको पता है कि कुछ नागरिक ज्यादा समान होते हैं। यह भेदभाव कई चीजों में दिखाई देता है।

सोचें, जब हर नागरिक समान होता है और हर जान की कीमत समान होती है तो अलग अलग घटनाओं, दुर्घटनाओं में मरने वालों को मिलने वाले मुआवजे में फर्क क्यों होता है? ऐसे ही एक ही तरह की घटना में हुई मौतों के लिए अलग अलग राज्य अलग मुआवजा क्यों देते हैं? बहरहाल, अभी यह चर्चा का विषय नहीं है।

चर्चा का विषय यह है कि क्या सभी छात्र और युवा एक समान होते हैं या उनकी पहचान इस आधार पर होती है कि वे कहां के हैं और किसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं? अंग्रेजी का यह मुहावरा है, जिसका हिंदी तर्जुमा यह है कि, किसी विषय पर आपका क्या रुख होगा यह इस बात से तय होगा कि आप कहां बैठे हैं। मिसाल के तौर पर संसद में कांग्रेस विपक्ष में है तो दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए छात्र आंदोलन में उसका रुख दूसरा होगा और झारखंड में कांग्रेस सत्ता में है तो वहां होने वाले छात्र आंदोलन में उसका रुख दूसरा होगा। यही बात भाजपा के संदर्भ में भी कही जा सकती है। जंतर मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन भाजपा के लिए देशद्रोह की तरह था लेकिन झारखंड का प्रदर्शन छात्र के जीवन मरण का प्रदर्शन है, जिसमें भाजपा के नेता शामिल हुए।

सोचें, राहुल गांधी जंतर मंतर पर आंदोलन खत्म होने के 10 दिन बाद तक उस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। उन्होंने यह स्टैंड लिया है कि जब तक 20 जुलाई को छात्रों पर हुई कार्रवाई के मामले में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह संसद में बयान नहीं देंगे तब तक संसद की कार्यवाही नहीं चलने देंगे। यह बात उन्होंने निजी तौर पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री कीरेन रिजिजू से कही। उन्होंने पिछले दो हफ्ते में तीन प्रेस कॉन्फ्रेंस की है। पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे साहिल लोचब को लेकर आए थे, जिनको पैलेट गन से गोली लगी है। दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस उन्होंने सीपीआई माले के छात्र संघ आईसा की तीन छात्रों के साथ की। इन तीन छात्रों ने भी जंतर मंतर पर भूख हड़ताल की थी। तीसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल चार अलग प्रदर्शनकारियों को लेकर आए, जिनमें एक रिया अहीर भी थीं, जिन्होंने मुंबई में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गाड़ी के आगे खड़े होकर गाड़ी रोक दी थी।

लेकिन उधर जब झारखंड में पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ छात्र आंदोलन कर रहे हैं तो उस पर राहुल गांधी या कांग्रेस के किसी नेता का कोई  स्टैंड नहीं है। वहां कांग्रेस हेमंत सोरेन की सरकार का हिस्सा है। उसे सिर्फ इतना कहना था कि मुख्यमंत्री छात्रों की बात सुनें और उनके सरोकारों को समझें। लेकिन कांग्रेस से ऐसा कहते नहीं बना। उलटे कांग्रेस कोटे से राज्य सरकार में शामिल मंत्री इरफान अंसारी ने छात्रों को भाजपा का एजेंट ठहराया। उनके प्रति हिकारत दिखाते हुए उन्होंने कहा कि छात्रों को आंदोलन नहीं करना चाहिए क्योंकि झारखंड में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। सोचें, वहां सिर्फ पेपर लीक नहीं हुआ, बल्कि सीधे नौकरियां बेच दी गई हैं। लेकिन कांग्रेस कोटे के मंत्री आंदोलन कर रहे छात्रों को ही दोष दे रहे हैं।

झारखंड में परीक्षा की गड़बड़ी का मॉडस ऑपरेंडी हैरान करने वाला है। वहां एक व्यक्ति पकड़ा गया है अभय तिवारी उर्फ मनोज तिवारी, जो राज्य सरकार का कर्मचारी भी था और परीक्षा कराने वाली निजी एजेंसी में मार्केटिंग ऑफिसर के तौर पर भी काम करता था। सरकार में रहते हुए पिछले 12 साल में 13 परीक्षाओं में बैठा और हर परीक्षा में अव्वल आया। उसने अपने सारे रिश्तेदारों को प्रतियोगिता परीक्षाएं पास करा कर नौकरी दिलाई है। वहां सरकार ने एक ब्लैक लिस्टेड कंपनी को परीक्षा कराने का ठेका दिया, जिसके कार्यालय से 14वीं संयुक्त जेपीएससी परीक्षा की ओएमआर शीट्स पकड़ी गई हैं। यह खुलासा हुआ है कि परीक्षा में ज्यादा सही जवाब देने वालों को कम नंबर मिले और कम सही जवाब देकर छात्र पास हो गए। ऐसे कई कई छात्र और कई एजेंट पकड़े गए हैं।

झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन यानी जेपीएससी के चेयरमैन एल ख्यांगते को इस्तीफा देना पड़ा है और उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। लेकिन कांग्रेस कोटे के मंत्री इरफान अंसारी कह रहे हैं कि कोई गड़बड़ी नहीं हुई है और भूख हड़ताल पर बैठे देवेंद्र नाथ महतो भाजपा के एजेंट हैं। हैरानी की बात है कि राहुल गांधी या किसी अन्य बड़े कांग्रेस नेता ने इस बात पर उनसे जवाब तलब नहीं की है। कांग्रेस में इतनी शर्म तो होनी चाहिए कि सरकार परीक्षा ठीक से नहीं करा पा रही है और पार्टी छात्रों का समर्थन नहीं कर पा रही है तो कम से कम उनके आंदोलन को अपमानित न करे!

वहीं दूसरी ओऱ जंतर मंतर के आंदोलन को विदेशी साजिश बताने वाले भाजपा नेता झारखंड की राजधानी रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों से मिलने जा रहे हैं। उनके लिए दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्र देशद्रोही थे, लेकिन रांची में प्रदर्शन कर रहे छात्र अपने हैं और छात्र हित की लड़ाई लड़ रहे हैं। नीट यूजी पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन कर रहे युवा जंतर मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रहे थे तो उससे भाजपा नेताओं के कानों के परदे फट रहे थे लेकिन नौकरी बेचे जाने के खिलाफ छात्र रांची में आंदोलन कर रहे हैं तो उनके नारे भाजपा के कानों में संगीत की तरह गूंज रहे हैं।

जाहिर है भाजपा हो या कांग्रेस या कोई दूसरी पार्टी उसे छात्रों के सरोकार से कोई मतलब नहीं है। छात्र या कोई भी प्रदर्शनकारी उनके लिए उनके लिए सिर्फ इनता मतलब रखते हैं कि उनके आंदोलन से उनको राजनीतिक लाभ मिल रहा है या नुकसान हो रहा है। अगर छात्रों से सरकार और विपक्ष का कोई सरोकार होता, उनके प्रति संवेदनशीलता होती तो सब अपने अपने शासन वाले राज्यों में पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी रोकने के गंभीर प्रयास करते। इसके बावजूद अगर कोई गड़बड़ी हो जाती तो यह कोशिश करते कि छात्रों को आंदोलन करने की नौबत न आए। लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई भी सरकार पेपर लीक और परीक्षा की गड़बड़ी नहीं रोक पा रही है और न छात्रों के प्रति संवेदनशीलता दिखा रही है। तभी पारंपरिक पक्ष और विपक्ष से अलग अन्य राजनीतिक ताकतों के लिए जगह बन रही है।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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