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ममता की चुनौतियां सबसे अलग हैं

ममता बनर्जी पहली क्षत्रप नेता नहीं हैं, जिनकी पार्टी चुनाव हारी है और चुनाव हारने के बाद टूट रही है। उनसे पहले उद्धव ठाकरे की पार्टी शिव सेना टूटी थी। उनके सांसद और विधायक सब अलग हो गए थे और पार्टी का नाम व चुनाव चिन्ह भी छिन गया था। हाल ही में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी टूटी है। उनके सात राज्यसभा सांसद भाजपा में चले गए हैं। तमिलनाडु में चुनाव हारने के बाद अन्ना डीएमके में बिखराव हुआ है। अगर चुनाव हारने की बात करें तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और बिहार में लालू प्रसाद की राजद भी हारी है।

चुनाव हारने के बाद धीरे धीरे पार्टी टूटने का सिलसिला ओडिशा में नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और तेलंगाना में चंद्रशेखर राव के बीआरएस में भी देखने को मिला है। लेकिन ममता बनर्जी की चुनौतियां इन बाकी प्रादेशिक पार्टियों से अलग और अनोखी है। इसलिए वे ज्यादा परेशान हैं और बचाव के लिए कांग्रेस की शरण में पहुंची हैं।

ममता बनर्जी की चुनौतियां दूसरी पार्टियों से अलग और ज्यादा गंभीर क्यों हैं इसके कई कारण हैं। पहला कारण तो पश्चिम बंगाल का राजनीतिक चरित्र है। वहां सही मायने ‘विनर टेक्स ऑल’ की राजनीति होती है। यानी जो जीतता है उसे सब मिलता है। यह नहीं हो सकता है कि हारने वाला भी राजनीति करता रहे। हारने वाले के सामने अस्तित्व का संकट होता है। जैसे 1977 में वाम मोर्चा के हाथों हारने के बाद कांग्रेस के साथ हुआ और 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के हाथों हारने के बाद वाम मोर्चे के साथ हुआ। सो, ममता बनर्जी को भी चिंता है कि भाजपा से हारने के बाद उनका भी हस्र कांग्रेस और वाम मोर्चे जैसा हो सकता है। इसकी शुरुआत भी हो गई है। उनकी पार्टी के सांसद, विधायक, पार्षद और दूसरे नेता पार्टी छोड़ने लगे हैं। उनके ज्यादातर विधायकों ने पार्टी छोड़ कर अलग गुट बना लिया है और ज्यादातर सांसद भी अलग हो गए हैं।

दूसरा कारण यह है कि ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का ब्रांड बहुत बदनाम हुआ है। 15 साल के शासन में तृणमूल कांग्रेस अराजकता, हिंसा, भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था का पर्याय बनी। उसके नेता कटमनी लेने के लिए बदनाम हुए। यही कारण है कि आज जहां भी तृणमूल के नेता निकल रहे हैं वहां लोग उनको चोर, चोर कह कर अपमानित कर रहे हैं। हो सकता है कि ऐसे कुछ काम भाजपा करा रही हो लेकिन ज्यादातर जगहों पर लोग खुद ही ऐसा कर रहे हैं। कई इलाकों में तृणमूल कांग्रेस के नेता लोगों के बीच जाकर उनसे वसूले गए पैसे लौटा रहे हैं। तृणमूल के शासन में सिंडिकेट कल्चर चलता था, जिसमें लोगों को अपना घर बनवाने या उसमें रिपेयर कराने के लिए तृणमूल के मस्तान लोगों से मंजूरी लेने की जरुरत पड़ती थी।

अब यह कल्चर समाप्त हो गया है और नेता लोगों से लिए गए पैसे लौटा रहे हैं। जहां नेता पैसे नहीं लौटा रहे हैं वहां लोग उनके घरों में घुस रहे हैं। पार्टी के स्थानीय कार्यालयों में दीमक लगे नोट, हथियारों का जखीरा और फर्जी आधार कार्ड बरामद हो रहे हैं। एक पूर्व विधायक शौकत मुल्ला बांग्लादेश भागने के क्रम में गिरफ्तार हुआ तो दूसरा जहांगीर खान नेपाल भागने के रास्ते में पकड़ा गया। सो, ममता बनर्जी के सामने यह बड़ी चुनौती है कि टीएमसी इस दागदार ब्रांड को कैसे फिर से चमकाए? इसका एक रास्ता ब्रांड बदलने में देखा जा रहा है। हालांकि वे अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में करेंगी इसमें संदेह है। वे विपक्षी गठबंधन के साथ जुड़ कर रिब्रांडिंग की कोशिश कर सकती हैं।

ममता बनर्जी की तीसरी चुनौती यह है कि तमाम बदनामी के बावजूद वे अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को कैसे उत्तराधिकारी बनाएं? ध्यान रहे तृणमूल कांग्रेस की बदनामी ममता की नहीं, बल्कि अभिषेक की बदनामी है। लोग उनसे बेहद नाराज हैं और पार्टी के अंदर तो तृणमूल के नेता उनको नफरत की हद तक नापसंद करते हैं। लेकिन ममता बनर्जी ने चुनाव हारने के बाद भी उनको फिर से पार्टी का महासचिव बनाया। सो, उनके लिए जरूरी है कि वे अभिषेक की छवि चमकाएं। उनको दिल्ली लाना, ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में साथ रखना और राहुल गांधी से मुलाकात कराना इसी प्रयास का हिस्सा है।

चौथी चुनौती वोट आधार की है। इस बार ममता बनर्जी के जो 80 विधायक जीते उनमें से 34 यानी 43 फीसदी विधायक मुस्लिम हैं। उन्होंने 47 मुसलमानों को टिकट दिया था, जिनमें से 34 जीते हैं। दूसरी ओर 247 हिंदू उम्मीदवारों में से सिर्फ 46 जीते। इससे जाहिर होता है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ममता बनर्जी की पार्टी को पूरा वोट मिला लेकिन हिंदू मतदाताओं ने उनका साथ छोड़ दिया। पहले आमतौर पर लोकसभा चुनाव में ऐसा होता था कि हिंदू वोट अपेक्षाकृत थोड़ा ज्यादा भाजपा के साथ जाता था लेकिन विधानसभा में वह ममता के साथ लौट आता था। इस बार वह लौटा नहीं, उलटे ज्यादा मात्रा में साथ छोड़ कर चला गया। इससे यह मैसेज गया कि ममता की पार्टी पूरी तरह से मुस्लिम वोट पर निर्भर है। असम में कांग्रेस के बारे में भी यह मैसेज है।

तभी पश्चिम बंगाल और असम में मुस्लिम पार्टियों के उदय की संभावना देखी जा रही है। ध्यान रहे आजादी से पहले मुस्लिम लीग की सक्रियता का क्षेत्र बंगाल और संयुक्त प्रांत ही था। सो, बंगाल में अगर मुस्लिम मतदाताओं को लगता है कि ममता बनर्जी को हिंदू वोट नहीं दे रहा है और मुस्लिम वोट मिलने के बावजूद वे भाजपा को नहीं रोक पाएंगी तो मुस्लिम उनका साथ छोड़ेंगे और हुमायूं कबीर, असदुद्दीन ओवैसी, नौशाद सिद्दीकी या बदरूद्दीन अजमल जैसे नेताओं की ओर देखेंगे। हो सकता है कि यह प्रक्रिया एकाध चुनाव के बाद तेज हो लेकिन उससे पहले भी मुस्लिम ममता की बजाय कांग्रेस या लेफ्ट को प्राथमिकता दे सकते हैं।

इस तरह की चुनौतियां अभी दूसरे राज्यों में प्रादेशिक पार्टियों के सामने नहीं है। उनके सामने सामान्य राजनीतिक चुनौती है, जो सबके सामने है। वह चुनौती भाजपा की है। भाजपा की धार्मिक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का राजनीतिक नैरेटिव, सत्ता की ताकत का हर तरह से इस्तेमाल करने की सोच और बेहिसाब खर्च करके चुनाव लड़ने की हैसियत ने बाकी पार्टियों के लिए चुनाव जीतना पहले के मुकाबले मुश्किल बना दिया है। यह चुनौती ममता बनर्जी के सामने भी है। लेकिन उनके सामने इसके अलावा भी चुनौतियां हैं। बंगाल का राजनीतिक चरित्र, मुस्लिम वोट की राजनीति, तृणमूल के ब्रांड पर लगा धब्बा और अभिषेक को स्थापित करना ये चुनौतियां हैं। ममता इन चुनौतियों से पार पाने में कांग्रेस की मदद की जरुरत महसूस कर रही हैं। कांग्रेस भी इसमें अपने लिए मौका देख रही है।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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