क्रिकेट के खेल की तरह राजनीति को भी अनिश्चितताओं का खेल माना जाता है। लेकिन नीतीश कुमार ने इसको भी इतनी प्रेडिक्टेबल बना दिया है कि जिसको राजनीति की ज्यादा समझ नहीं होती है वह भी कहता है कि बिहार के मुख्यमंत्री तो नीतीश कुमार ही बनेंगे। इसके बाद मजाकिया अंदाज में यह भी कहा जाता है कि चाहे जिसके साथ बनाएं लेकिन सरकार नीतीश ही बनाएंगे। हालांकि अब आगे शायद ऐसा नहीं हो पाए क्योंकि विधानसभा में संख्या का हिसाब इस बार कुछ अलग है।
बहरहाल, चुनाव नतीजों में एनडीए के जीते विधायकों की बड़ी संख्या को छोड़ दें तो कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है। चुनाव नतीजे और सरकार का गठन वैसे ही हुआ है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। चूंकि यह लगातार पांचवीं बार नीतीश कुमार की निरंतरता के लिए दिया गया जनादेश है इसलिए नई सरकार को कोई हनीमून पीरियड भी नहीं दिया जा सकता है। इसका अर्थ है कि पहले दिन से सरकार को अपने किए गए वादों को पूरा करने के लिए काम करना होगा और पहले दिन से हिसाब मांगा जाएगा।
ध्यान रहे सरकार के सामने कम से कम अभी राजनीतिक चुनौती नहीं है। हालांकि आगे इसके आसार हैं। भारतीय जनता पार्टी की ओर से जिस समय अपना मुख्यमंत्री बनाने का प्रयास होगा उस समय चुनौती आएगी। लेकिन ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव तक ऐसा नहीं होगा। सरकार के सामने कोई प्रशासनिक चुनौती भी नहीं है क्योंकि नौकरशाही वही है, जो पिछले 20 साल से नीतीश कुमार के साथ काम कर रही है। उनकी पसंद के अधिकारी सभी महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं और उनको पता है कि सरकार को किस एजेंडे को प्राथमिकता में रख कर काम करना है। इस बार चुनाव में भाजपा और जनता दल यू के बीच पहले से बेहतर तालमेल दिखा है। अब यह देखना होगा कि शासन चलाने में दोनों का तालमेल वैसा ही रहता है या नहीं?
माना जा रहा है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी सरकार पर पहले से ज्यादा नियंत्रण रखने का प्रयास करेगी। इसके तीन कारण हैं। एक कारण तो यह है कि नीतीश कुमार की सेहत पहले जैसी नहीं है और वे खुद रोजमर्रा के कामकाज को संभालने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते हैं। दूसरा कारण यह है कि भाजपा को बहुत ज्यादा सीटें मिली हैं। वह बिहार विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनी है, ऐसा पहली बार हुआ है। तीसरा कारण यह है कि बिहार में विकास की और लोक कल्याण की योजनाओं के लिए केंद्र सरकार से ज्यादा आवंटन मिलने की संभावना है, जिसके लिए बेहतर तालमेल की आवश्यकता है।
फिर सवाल है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है? सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजस्व की है। चुनाव से पहले सरकार ने जो वादे किए हैं उन वादों को पूरा करने के लिए बड़े राजस्व की जरुरत है। यहां यह ध्यान रखने की जरुरत है कि पहले नीतीश का विपक्ष लालू प्रसाद या तेजस्वी यादव होते थे, जो सरकार के ऊपर ज्यादा हमले नहीं करते थे क्योंकि उनको उम्मीद लगी रहती थी कि कब नीतीश के साथ सरकार बनाने का मौका मिल जाए!
दूसरे वे हमला करते थे तो लोग उनसे उनके राज के बारे में पूछने लगते थे। लेकिन अब प्रशांत किशोर के रूप में बिहार में एक सजग विपक्ष मौजूद है, जिसके ऊपर पहले के शासन का कोई बैगेज नहीं है। उन्होंने कहा भी है कि सरकार की योजनाओं और वादों को पूरा करने पर उनकी नजर रहेगी। वे इसमें सरकार की विफलता का मुद्दा उठाएंगे। सरकार की शपथ के दिन महात्मा गांधी के भितिहरवा आश्रम में एक दिन का उपवास करके उन्होंने अपने इरादे बता दिए हैं। सो, सरकार को गंभीर हो जाना होगा।
अभी एक करोड़ 51 लाख महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपए गए हैं। बचे हुई करीब सवा करोड़ महिलाओं के खाते में यह रकम जानी है। उसके बाद लाखों महिलाओं को दो दो लाख रुपए देने का भी वादा है। इसके लिए पैसे कहां से आएंगे? ऐसे ही एक करोड़ नौकरियों और रोजगार का वादा है, जिसके लिए लाखों सरकारी पद सृजित करने होंगे। सरकार ने उद्योग में एक लाख करोड़ रुपए के निवेश का वादा किया है। नए स्कूल, कॉलेज और अस्पताल बनवाने के वादे हैं।
125 यूनिट फ्री बिजली के बाद हर घर पर सोलर पैनल लगवाने का वादा है। सवाल है कि सरकार के पास राजस्व बढ़ाने का क्या तरीका है? क्या केंद्र के अनुदान और देसी, विदेशी संस्थाओं के कर्ज के भरोसे इतने वादे किए गए हैं? ध्यान रहे बिहार पर पहले से ही बहुत ज्यादा कर्ज है और हर दिन बिहार 63 करोड़ रुपया कर्ज के ब्याज के तौर पर चुका रहा है। सो, नया कर्ज बहुत सोच समझ कर लेना होगा। एक सवाल यह भी है कि शराबबंदी का क्या होगा? इससे सालाना 20 से 25 हजार करोड़ रुपए के राजस्व का घाटा हो रहा है। प्रशांत किशोर ने शराबबंदी खत्म करने का वादा किया था। यह नीतीश कुमार की लीगेसी है, जिसे देखना है कि कितने समय तक चलाया जाता है?
यह सही है कि सरकार के सामने मुख्य रूप से आर्थिक चुनौती है और कोई राजनीतिक या प्रशासनिक चुनौती नहीं है। लेकिन एक बात हमेशा ध्यान में रखने की है कि जब इतना बड़ा बहुमत मिलता है तो उसके बाद अनदेखे राजनीतिक संकट खड़े होते हैं। यह भारत का और बिहार का भी इतिहास रहा है। केंद्र में 415 के बहुमत के साथ राजीव गांधी की सरकार बनी थी लेकिन उसके बाद खुद राजीव गांधी का और कांग्रेस का क्या हुआ यह सबको पता है। उसी तरह बिहार में 2010 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को 206 सीटों का बहुमत मिला था। जनता दल यू को 115 और भाजपा को 91 सीटें मिली थीं।
लेकिन तीन साल के बाद ही हालात बदल गए थे। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव की कमान सौंपे जाने के विरोध में नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था और दो साल तक अकेले सरकार चलाई थी। उसके बाद उन्होंने राजद के साथ तालमेल करके 2015 का विधानसभा चुनाव लड़ा, जिसमें चार पार्टियों से तालमेल के बावजूद भाजपा 91 से घट कर 53 पर आ गई। 2010 में भी ऐसी कोई संभावना नहीं दिख रही थी कि नीतीश भाजपा को छोड़ेंगे और अब भी कोई आशंका नहीं दिख रही है कि दोनों पार्टियों के बीच कोई ऐसा घटनाक्रम दोहराया जा सकता है। लेकिन भविष्य किसने देखा है और राजनीति तो वैसे भी हमेशा संभावनाओं से भरी होती है।


