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नए नेताओं और पार्टियों के लिए मौका

देश की राजनीति इस समय एक बुनियादी बदलाव के दौर से गुजर रही है। यह दौर युवाओं की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उनके आक्रोश की अभिव्यक्ति का है। वे परिणामों से बेपरवाह होकर प्रदर्शन कर रहे हैं और अपनी मांगें दोहरा रहे हैं। उन्होंने दिल्ली के जंतर मंतर पर अर्धसैनिक बलों की परवाह नहीं की और न झारखंड में परवाह की है। बिहार में तो पुलिस का एक जवान एके 47 राइफल से गोलियां चला रहा था फिर भी छात्र मोर्चे पर डटे हुए थे। जाहिर है देश की पारंपरिक पार्टियों को यह परिघटना समझ में नहीं आ रही है। उनका प्रशिक्षण मोलभाव की राजनीति वाला रहा है। तभी वे हैरान हैं कि यह कैसी पीढ़ी है, जो मोलभाव नहीं कर रही है। झारखंड की सरकार ने इसी हैरानी के भाव में यह आंकड़ा पेश किया कि सरकार छात्रों की 98 फीसदी मांगें मान चुकी है। उनको हैरानी थी कि इसके बावजूद छात्र आंदोलन क्यों नहीं खत्म कर रहे हैं!

इससे पहले आमतौर पर यह होता था कि पेशेवर नेता आंदोलन करते थे, जिसमें बड़ी बड़ी मांगें रखी जाती थीं। बाद में सरकार के साथ मोलभाव में कुछ मांगें मान ली जाती थीं तो आंदोलन खत्म हो जाता था। लेकिन यह पीढ़ी समझौते के लिए तैयार नहीं है। उसने जो मांगा है वह उसे चाहिए। यह जिद उनको पेशेवर राजनेताओं और पहले के आंदोलनकारियों से अलग करती है। वे अल्वैर कामू के कालिगुला की तरह असंभव का संधान कर रहे हैं। कालिगुला कहता है, ‘मैं असंभव का संधान कर रहा हूं..देखो तर्क कहां ले जाता है…शक्ति अपनी सर्वोच्च सीमा तक, इच्छाशक्ति अपने अनंत छोर तक! नहीं अब वापसी नहीं हो सकती..मुझे आगे बढ़ते ही जाना है..’। वह कहता है कि उसे यह संसार असहनीय लगता है, इसलिए उसे चांद या ऐसी खुशी चाहिए जो पागलपन लगे। वह एक तानाशाह था, जिसकी अपनी सनक थी। लेकिन दुर्भाग्य से भारत के ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’ को जो खुशी चाहिए वह भी पुरानी पीढ़ी को पागलपन लग रहा है।

प्रदर्शन कर रहे ‘जेन जी’ के युवाओं की इस जिद से ही देश की राजनीति में एक बुनियादी बदलाव आने की संभावना है। जिस तरह से वे पेशेवर आंदोलनकारियों से अलग हट कर अपनी तरह से सरकार से डील कर रहे हैं वैसे ही वे पेशेवर राजनेताओं को भी खारिज करेंगे और अपने हिसाब से राजनेता चुनेंगे। हो सकता है कि यह बात सुनने में अजीब लगे या यह भी लगे कि अभी इसका समय नहीं आया है। लेकिन समय आता हुआ कम ही दिखाई देता है। इस किस्म का दावा करने पर यह भी कहा जा रहा है कि लोग प्रशांत किशोर की बांकीपुर जीत को कुछ ज्यादा पढ़ रहे हैं या तमिलनाडु में विजय की जीत का भी बहुत ज्यादा नतीजा निकाल रहे हैं। परंतु यह मामला सिर्फ विजय या प्रशांत किशोर की जीत का नहीं है। धरातल पर बदल रही राजनीति का है। जमीनी स्तर पर यह सोच बन रही है कि राजनीति में और शासन में ऐसे लोग आने चाहिए, जो युवाओं की भावनाओं को समझते हों। अभी जो राजनेता युवाओं को समझने या उनसे कनेक्ट करने की बात कर रहे हैं वे उनको एक स्टीरियोटाइप में देख रहे हैं और यह बात उनको और नाराज कर रही है।

असल में ‘जेन जी’ का अपना एक ‘सेंस ऑफ हिस्ट्री’ है। वे निकट अतीत की या अपने जीवन की चीजों को अलग नजरिए से देखते हैं। जब वे यह नजरिया अपने परिवार में अभिव्यक्त करते हैं तो उसे सिरे से खारिज कर दिया जाता है। यहां से उनका अलगाव शुरू होता है। यहां से उनके मन में यह बात बैठती है कि अगर वे अपने से ऊपर वाली पीढ़ी के सामने अपने को अभिव्यक्त करेंगे तो उन्हें गलत समझा जाएगा। इसलिए वे अपने को सोशल मीडिया में अभिव्यक्त करते हैं और ज्यादातर मामलों में छद्म नाम से अपने को प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा वे अपने पीयर ग्रुप के साथ अपने को ज्यादा सहज पाते हैं। उनकी यह मनोवैज्ञानिक स्थिति ही राजनीति में उन्हें अलग तरह के और नए नेताओं को चुनने के लिए प्रेरित करेगी। ऐसे नेताओं को जो पर्यावरण व पारिस्थितिकी के बदलाव को समझते हों, जो मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का मजाक नहीं उड़ाते हों, जो एलजीबीटीक्यू का मजाक नहीं उड़ाते हों और जो नौकरी, रोजगार आदि के पुराने ढांचे से बाहर, अलग कुछ सोचने को स्वीकार करते हों। पेशेवर राजनेताओं और पार्टियों से इसकी उम्मीद कम है।

तभी ऐसा लग रहा है कि ये युवा, जिनकी आबादी अगले चुनाव के समय करीब 40 करोड़ होगी, कुछ बड़े बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं। वह बदलाव कैसा होगा? कौन उसकी ड्राइविंग सीट पर होगा? कोई एक व्यक्ति होगा या अलग अलग राज्यों में अलग चेहरे होंगे? इन सब सवालों के जवाब अभी तुरंत नहीं दिख रहे हैं। लेकिन ऐसा होने की संभावना इसलिए भी बन रही है क्योंकि सभी पारंपरिक पार्टियों का एक जैसा रुख छात्रों व युवाओं को दिखने लगा है। अगर दिल्ली के जंतर मंतर पर लाठियां चलीं तो झारखंड विधानसभा का घेराव करने जा रहे छात्रों पर भी लाठियां चलीं। जंतर मंतर पर हुई पुलिस कार्रवाई पर जैसी राजनीति कांग्रेस ने की वैसी ही राजनीति झाऱखंड की घटना पर भाजपा कर रही है। इसलिए युवाओं की नजर में दोनों में फर्क नहीं है।

अब तक की राजनीति में ऐसा होता था कि हर हाल में राष्ट्रीय पार्टियां अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले चार चुनाव में कुल पड़ने वाले वोट का 60 फीसदी हिस्सा राष्ट्रीय पार्टियों को जाता रहा है। बाकी 40 फीसदी के आसपास वोट प्रादशिक पार्टियों औऱ निर्दलीय उम्मीदवारों को मिलते रहे हैं। 2019 का चुनाव अपवाद था, जब राष्ट्रीय पार्टियों को 68 फीसदी वोट मिल गए थे। तब प्रादेशिक पार्टियों का वोट घटा था। आने वाले समय में यह परिघटना पलट भी सकती है। अगर पारंपरिक पार्टियों से उबे हुए युवा नई पार्टियों और नए नेताओं को चुनने के लिए मतदान करते हैं तो अगले चुनाव में और उसके आगे बिल्कुल नई परिघटना देखने को मिल सकती है। तमिलनाडु में विजय की जीत में जो दिखा या अरविंद केजरीवाल की दिल्ली जीत में जो दिखा था वह अपवाद की घटना नहीं रह जाएगी। वैसी परिघटनाएं भारतीय राजनीति की मुख्यधारा बन सकती हैं।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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