पश्चिम एशिया की जंग भारत के नजदीक आती जा रही है। ईरान और अमेरिका या इजराइल के मिसाइल भले भारत की सीमा के आसपास नहीं गिर रहे हैं लेकिन ईरान या इजराइल या खाड़ी के किसी भी देश में गिरने वाली मिसाइल या ड्रोन का हमला भारत के हितों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में आ रही है तो खाद्यान्न सुरक्षा भी प्रभावित हो रही है। भूराजनीति में एक बड़ी शक्ति के रूप में भारत की मौजूदगी की धारणा भी इससे प्रभावित हो रही है। इसका कारण यह है कि पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई का सबसे बड़ा नुकसान कम से कम अभी भारत को हो रहा है। भारत एक तरह से युद्ध का बंधक हो गया है। होरमुज की खाड़ी से कुल चार जहाज निकले हैं और दो अन्य जहाजों के निकलने की खबर है। यह ऊंट के मुंह में जीरा की तरह है। भारत सरकार कह रही है कि पहले वह 35 देशों से तेल व गैस खरीदती थी और अब 41 देशों से खरीदने लगी है। लेकिन इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती है।
भारत सरकार ने देश के लोगों को भरोसा दिलाने के लिए अपने ऊर्जा भंडार के बारे में जानकारी जारी दी। इसमें बताया गया कि भारत के पास 74 दिन के भंडारण की क्षमता है लेकिन अभी उसमें 60 दिन के लिए जरूरी स्टॉक है। सोचें, जब 74 दिन की क्षमता है तो उसमें 60 ही दिन का स्टोरेज क्यों है? इसमें भी सरकार ने साफ कहा है कि कच्चा तेल, रिफाइंड किया हुआ तेल और डेडिकेटेड स्ट्रेटेजिक स्टोरेज भी शामिल है। जाहिर है कि सामरिक भंडार को तो सामान्य इस्तेमाल के लिए नहीं निकाला जा सकता है। इसका अर्थ है कि भारत के पास दो महीने से काफी कम का ऊर्जा भंडार है।
इस बीच ईरान की समुद्री सीमा वाले होरमुज की खाड़ी की बाधा बढ़ती जा रही है और उधर लाल सागर में व्यापार मार्ग बाधित होने की आशंका पैदा हो गई है क्योंकि हूती विद्रोहियों ने बाब अल मंदेब खाड़ी को रोकने का ऐलान किया है। ध्यान रहे यह होरमुज की खाड़ी के दूसरी तरफ है, जो स्वेज नहर को जोड़ता है। इसके एक तट पर पूर्वी अफ्रीकी देश हैं। अगर लाल सागर और अरब सागर की दो खाड़ियों में व्यापार मार्ग प्रभावित होता है तो भारत सहित पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा और दूसरी जरूरी चीजों का संकट होगा। एक तरफ अमेरिका और इजराइल ने ईरान की तेल उत्पादन क्षमता को प्रभावित किया है तो दूसरी तरफ ईरान ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, बहरीन सहित तमाम खाड़ी देशों के तेल व गैस उत्पादन की क्षमता को कमजोर कर दिया है। पूरी क्षमता बहाल होने में कई बरस लगेंगे।
अमेरिका का जो रवैया दिख रहा है उसमें ऐसा नहीं लग रहा है कि एक सीमा से ज्यादा वह ईरान व रूस को पाबंदी से मुक्ति देगा। वैसे भी रूस ने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। उसने तैयार पेट्रोल बेचने पर चार महीने की रोक लगा दी है। अगर किसी दिन कच्चे तेल की बिक्री भी नियंत्रित कर दी तो क्या होगा? वह ऐसा कर सकता है क्योंकि उसे भी मैसेज देना होगा कि अमेरिकी पाबंदी के बावजूद जो देश उससे तेल खरीदते रहे उनके प्रति वह ज्यादा प्रतिबद्ध है। भारत ने अमेरिकी पाबंदी के बाद रूस से तेल खरीदना बहुत कम कर दिया था। ईरान पर पाबंदी के बाद तो तेल खरीदना बंद ही कर दिया है। सोचें, इसके बावजूद यह प्रचारित किया जाता है कि भारत और ईरान दोस्त हैं। ईरान आखिर किस बात के लिए भारत को दोस्त मानेगा? खैर, तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने का असर भारत में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी की आपूर्ति पर तो दिख ही रहा है।
हीलियम की आपूर्ति प्रभावित होने से सेमीकंडक्टर उद्योग और मेडिकल जांच का काम प्रभावित हो रहा है। रासायनिक खाद खास कर यूरिया और डीएपी के उत्पादन पर असर पड़ रहा है। अगर खरीफ की फसल के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध नहीं हुआ तो खाद्यान्न सुरक्षा प्रभावित होगी। छोटे छोटे उद्योग अभी से प्रभावित हुए हैं। होटल, रेस्तरां, ढाबे आदि बंद हो रहे हैं और लघु व कुटीर उद्योग भी बंद हो रहे हैं। आर्थिक गतिविधियां ठप्प हो रही हैं। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में दो फीसदी तक की गिरावट की आशंका जताई जा रही है और भारत की विकास दर को लेकर पहला अनुमान गोल्डमैन सॉक्स का आया है, जिसने अनुमानित विकास दर सात से घटा कर 5.9 फीसदी कर दी है। खाड़ी से पांच लाख भारतीय वापस लौट चुके हैं और हर दिन खाड़ी से भरे हुए जहाज भारत आ रहे हैं और भारत से खाली जहाज लौट रहे हैं। इससे डॉलर के रूप में भारत को मिलने वाला रेमिटेंस भी कम होता जा रहा है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों को लेकर ऊपर कही गई बातें और ऐसी कई बातें पहले से लिखी और बोली जा चुकी हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि युद्ध से सर्वाधिक प्रभावित हो रहे भारत की इसमें क्या भूमिका है? क्या भारत युद्ध का असर झेलने वाला एक मूक दर्शक देश है? इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत का नुकसान कोलैटरल डैमेज की श्रेणी में है। यानी लड़ रहे हैं दूसरे देश और नुकसान भारत झेल रहा है। तभी सवाल है कि भारत क्या इसमें कोई प्रोएक्टिव रोल नहीं निभा सकता है? इसका जवाब नकारात्मक होगा। कई ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से भारत इस युद्ध में किसी तरह की भूमिका नहीं निभा सकता है। सबसे पहला कारण तो यह है कि भारत ने लंबे समय के लिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की है। भारत के पास तेल व गैस की बहुत कम भंडारण क्षमता है। तेल व गैस की खोज का काम भारत में लगभग ठप्प है।
भारत रिफाइनरी के मामले में चौथा सबसे बड़ा देश है लेकिन वह दूसरे देशों के तेल को ही रिफाइन करता है। इसके अलावा नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने जो पहल की है वह भी सीमित है और उसका लाभ मिलना अभी शुरू नहीं हुआ है। सोचें, चीन के पास 10 महीने से एक साल तक की जरुरत का ऊर्जा भंडार है। साथ ही उसके लिए रूस और ईरान का रास्ता हमेशा खुला हुआ है और अफ्रीका से भी तेल मंगाना उसके लिए आसान है। फिर भी वह चुपचाप तमाशा देख रहा है। अगर उसकी कोई भूमिका है भी तो वह परोक्ष रूप से है। वह निश्चित रूप से चाह रहा है कि अमेरिका इस युद्ध में जितने लंबे समय तक फंसा रहे उतना अच्छा है।
लेकिन चूंकि वह इस युद्ध से बहुत प्रभावित नहीं हो रहा है इसलिए उसे ज्यादा चिंता करने की जरुरत नहीं है। भारत कई तरह से प्रभावित है। फिर भी भारत कोई भूमिका नहीं निभा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां वहां के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या प्रिंस, क्राउन प्रिंस को फोन कर सकते हैं। उससे जनता के बीच यह धारणा बनेगी कि सरकार कुछ कर रही है लेकिन असल में उससे कुछ हासिल नहीं होगा। इसका कारण यह है कि भारत ने युद्ध रूकवाने या युद्ध के बीच भारत के हितों की रक्षा करने की नैतिक ताकत गंवा दी है। जंग से दो दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी इजराइल में थे। उसके बाद जब इजराइल व अमेरिका ने ईरान पर हमला किया और उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को मार डाला तब भारत खामोश रहा।
भारत ने न तो हमले की निंदा की और न खामेनेई की मौत पर शोक जताया। घटना के पांच दिन के बाद पांच मार्च को भारत के विदेश सचिव ने ईरान के दूतावास में जाकर शोक पुस्तिका पर दस्तखत किया। आज जो देश मध्यस्थता कर रहे हैं उनके पास नैतिक ताकत इसलिए है क्योंकि उन्होंने युद्ध की निंदा की और खामेनेई की मौत के बाद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान को फोन करके दुख जताया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी पेजेशकियान से फोन पर बात की लेकिन यह नहीं बताया गया कि उन्होंने खामेनेई की मौत पर दुख जताया या नहीं। ऐसे ही अमेरिकी पनडुब्बी ने भारत में युद्ध अभ्यास करके लौट रहे ईरानी जहाज को मार कर समुद्र में डुबो दिया और भारत ने इसकी भी निंदा नहीं की। निंदा छोड़िए उस हमले में ईरान के 84 सैनिक मारे गए, जो निहत्थे थे और भारत के मेहमान थे, लेकिन भारत ने उनकी हत्या पर शोक तक नहीं जताया। सो, किसी भी युद्ध के समय मध्यस्थता करने के लिए जिस स्तर की तटस्थता, निरपेक्षता और नैतिक बल होना चाहिए था, उसकी कमी के कारण भारत इसमें कोई भूमिका नहीं निभा सका है।


