भारत में और दुनिया में भी दो तरह की राजनीति हमेशा होती है। एक असली और दूसरी दिखावे वाली, जिसे परफॉर्मेटिव पॉलिटिक्स कहते हैं। चुनावी सफलता के लिए दोनों के बीच एक निश्चित संतुलन की आवश्यकता होती है। अगर संतुलन बिगड़ जाए तो फिर समस्या हो जाती है। जब भारत में टेलीविजन मीडिया का प्रसार हुआ तो नेताओं में स्क्रीन पर दिखने की होड़ मची। तब परफॉर्मेटिव पॉलिटिक्स का अनुपात बढ़ गया। लालू प्रसाद जैसे नेताओं ने इस मीडियम का अपने लाभ के लिए खूब इस्तेमाल किया। हालांकि उन्होंने असली और दिखावे की राजनीति का अनुपात नहीं बिगड़ने दिया। पिछले कुछ समय से टेलीविजन के साथ साथ सोशल मीडिया का भी प्रसार बहुत तेजी से हुआ है और इससे ज्यादातर पार्टियों और नेताओं को दिखावे की राजनीति करने का ज्यादा अवसर मिला है।
इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता खास कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह असली और दिखावे की राजनीति का अनुपात नहीं बिगड़ने देते हैं। मोदी ने भी मीडियम का बहुत होशियारी से इस्तेमाल किया है। समस्या विपक्षी पार्टियों और उनके समर्थकों के साथ हैं। वे दिखावे की राजनीति यानी परफॉर्मेटिव पॉलिटिक्स को ही असली राजनीति मानने लगे हैं। उनको लग रहा है कि सोशल मीडिया में उनको ज्यादा ट्रैक्शन मिल रहा है, उनके उठाए मुद्दों पर ज्यादा चैटर है, ब्यूज और लाइक्स ज्यादा आ रहे हैं इसका अर्थ है कि उनका नैरेटिव चल रहा है और वे इस आधार पर चुनाव जीत जाएंगे।
हर महीने सोशल मीडिया पर इन्फ्लूएंसर्स को मिलने वाले व्यूज का आंकड़ा आता है तो टॉप 20 में गिन कर चार या पांच राइटविंग के इन्फ्लूएंसर होते हैं। बाकी सरकार और भाजपा के विरोधी होते हैं। टॉप पर तो हमेशा ही कोई भाजपा विरोधी इन्फ्लूएंसर होता है। इस आधार पर भी निष्कर्ष निकाला जाता है कि हवा बदल गई है और अब भाजपा हारेगी। लेकिन जब चुनाव में भाजपा जीत जाती है तब कहा जाता है कि चुनाव आयोग के कारण भाजपा जीत गई।
यह किसी हाल में संभव नहीं है कि जनभावना खिलाफ हो तो चुनाव आयोग किसी पार्टी को चुनाव जीता दे। पहले भी जब बैलेट से वोटिंग होती थी तो खूब बूथ कैप्चरिंग होती थी। लेकिन सिर्फ बूथ कैप्चरिंग के आधार पर कोई चुनाव नहीं जीत सकता था। बूथ कैप्चरिंग में भी वही पार्टी कामयाब होती थी, जिसके पास जन समर्थन होता था। इसलिए यह कहना की भाजपा चुनाव आयोग के कारण जीत रही है या चुनाव आयोग के कारण भाजपा के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी नहीं हो रही है या एसआईआर के कारण भाजपा जीत गई, नादानी होगी।
भाजपा की जीत के ठोस आधार हैं, जबकि कांग्रेस और विपक्ष की जीत के दावे का आधार आभासी हैं। आभासी यानी वर्चुअल माहौल के आधार पर ही कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के नेता भाजपा के हारने की उम्मीद करते हैं और सिविल सोसायटी के कांग्रेस समर्थक चेहरे भी कांग्रेस की जीत का दावा करते हैं।
अभी जब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानियों का खुलासा किया तो सबसे पहले दिन सीपीआई माले ने प्रदर्शन का ऐलान किया और उसमें हिस्सा लेने के लिए योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण भी जंतर मंतर पहुंच गए। पुलिस के साथ तकरार होने की दोनों की वीडियो भी खूब वायरल हुई, जिस पर काफी लाइक्स और व्यूज मिले और ये दोनों लोग लोकतंत्र बचाने के लिए सड़क पर उतरने वाले मसीहा कहलाए। लेकिन सवाल है कि इस परफॉर्मेटिव पॉलिटिक्स से कांग्रेस के नैरेटिव को कितना फायदा मिलेगा? क्या सिविल सोसायटी का प्रतिनिधित्व करने वाले ये दोनों चेहरे नई पीढ़ी के मतदाताओं को आकर्षित कर पाएंगे? क्या इनके वहां मौजूद होने और दीपांकर भट्टाचार्य या नेहा बोरा की जगह खुद लाइमलाइट में आ जाने से सरकार विरोधी माहौल बनाने में किसी को मदद मिलेगी? इन तीनों सवालों का जवाब नकारात्मक है।
योगेंद्र यादव पहले समाजवादी जन परिषद के नेता थे। फिर चुनाव विश्लेषक बने। फिर आम आदमी पार्टी में शामिल हुए। वहां से निकाले गए तो अपनी पार्टी बनाई और अब पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। पिछले 12 साल में उन्होंने इतने चुनावों में भाजपा के हारने और कांग्रेस के जीतने की भविष्यवाणी की है कि अब उनकी भविष्यवाणियों पर कोई ध्यान नहीं देता है। हैरानी की बात है कि राहुल गांधी ने उनके ऊपर भरोसा किया। राहुल गांधी जब भारत जोड़ो यात्रा पर निकल रहे थे तो उन्होंने सिविल सोसायटी के लोगों से मुलाकात की थी। योगेंद्र यादव के जरिए वह बैठक हुई और योगेंद्र यादव सहित सिविल सोसायटी के अनेक लोग उस यात्रा से जुड़े। इ
समें कोई संदेह नहीं है कि भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल गांधी की एक गंभीर राजनेता वाली छवि स्थापित की और उसके तुरंत बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को कर्नाटक में बड़ी जीत मिली। लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस की सीटें अगर दोगुनी हो गईं तो उसमें कहीं न कहीं राहुल गांधी की छवि और उनकी भारत जोड़ो यात्रा का हाथ था। उस यात्रा के बाद ही भाजपा ने राहुल गांधी को ‘पप्पू’ कहना बंद किया। उसके बाद से उनको देश विरोधी कहा जाने लगा।
खैर, राहुल गांधी ने योगेंद्र यादव या सिविल सोसायटी पर इसलिए भरोसा किया कि वे कांग्रेस के राजनीतिक अभियान को सप्लीमेंट करेंगे। लेकिन सिविल सोसायटी के जो नामी चेहरे हैं उनका एजेंडा अपने ऊपर फोकस बनवाने का है। उनको मुद्दों से ज्यादा अपनी मार्केटिंग की परवाह है। वे कांग्रेस या विपक्ष के एजेंडे को सप्लीमेंट नहीं कर रहे हैं, बल्कि खुद उसका हिस्सा बन रहे हैं। सत्ता विरोधी माहौल बनाने में विपक्ष के एजेंडे को कैसे सप्लीमेंट किया जाता है इसकी मिसाल 2011 से 2014 तक का घटनाक्रम है।
सिविल सोसायटी ने कैसे आम जनता के गुस्से को बढ़ाने में भूमिका निभाई यह सबने देखा। अन्ना हजारे से लेकर अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव से लेकर आर्ट ऑफ लिविंग वाले रविशंकर तक और क्रिकेटर्स, उद्योगपतियों से लेकर फिल्मी कलाकारों ने कैसे महंगाई, भ्रष्टाचार आदि के मुद्दे पर उस समय के विपक्ष यानी भाजपा के एजेंडे को आगे बढ़ाने में पूरक का काम किया। उस समय योगेंद्र यादव भी जाने अनजाने में कांग्रेस विरोधी माहौल बनाने के अभियान में लगे थे।
बहरहाल, उस समय सिविल सोसायटी ने जैसा काम किया वैसा कोई भी काम आज सिविल सोसायटी नहीं कर पा रही है। कह सकते हैं कि भाजपा की सरकार ने सिविल सोसायटी को कमजोर किया है और उनके अंदर भय पैदा किया है। लेकिन योगेंद्र यादव या प्रशांत भूषण अगर भयभीत नहीं हैं तो वे क्यों सिर्फ दिखावे की राजनीति कर रहे हैं? पुरानी कहावत है कि काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती या बासी कढ़ी में उबाल नहीं आता। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोगों को यह बात समझनी चाहिए। हर मौके पर अपना चेहरा चमकाने की बजाय अगर वे नैरेटिव की ताकत को बढ़ाने के लिए काम करें तो उसका ज्यादा असर होगा।
कांग्रेस को और विपक्ष को भी को भी इस समय राहुल गांधी के रूप में नेता मिल गया है। अब उनके पीछे एक मजबूत संगठन और एक प्रभावशाली नैरेटिव की जरूरत है। ध्यान रहे नरेंद्र मोदी ने जब दिल्ली का अभियान शुरू किया था तो वे एक करिश्माई नेता के तौर पर स्थापित थे, उनके पीछे भाजपा व संघ जैसा बड़ा संगठन था और कांग्रेस की सरकार के खिलाफ मजबूत नैरेटिव था। मोदी के पास नेतृत्व और संगठन अब भी है। नैरेटिव जरूर कमजोर हुआ है लेकिन सिर्फ उस आधार पर मोदी को नहीं हराया जा सकता है। इसका कारण यह है कि नैरेटिव अभी ऐसे गुस्से में नहीं बदला है, जिससे लोग सरकार को उखाड़ फेंकने वाले मोड में आ जाएं।
सिविल सोसायटी की सीमाएं हैं। उससे न तो संगठन की मजबूती बनती है और न नेतृत्व की। लेकिन अगर उसकी विश्वसनीयता हो तो उससे नैरेटिव में एडवांटेज हासिल करने में मदद मिल सकती है। उसकी मदद से समाज में विपक्ष और राहुल गांधी के प्रति बने पूर्वाग्रहों को मिटाने का काम हो सकता है। लेकिन अफसोस की बात है कि अभी सिविल सोसायटी के चेहरों की खुद की विश्वसनीयता बहुत खराब हो गई है इसलिए वे बेअसर हो गए हैं। राहुल गांधी को भी यह बात समझनी होगी।
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