भारत एक बहस प्रधान देश है। प्राचीन काल से भारत में शास्त्रार्थ या बहस की परंपरा रही है। धर्म और जीवन के साथ साथ राजकाज से जुड़े अधिकतर बड़े प्रश्न शास्त्रार्थ के जरिए ही सुलझाए गए हैं। जगद्गुरू शंकराचार्य शास्त्रार्थ के लिए ही वाराणसी पहुंचे थे। लेकिन तब तक कुमारिल भट्ट अग्नि समाधि में बैठ चुके थे। कुमारिल भट्ट ने ही उनको अपने बहनोई मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ के लिए भेजा। उसकी कथा बहुत प्रचलित है। मंडन मिश्र पराजित हो गए तो उनकी पत्नी उदया भारती ने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया।
बाद में शंकराचार्य दोनों को लेकर शृंगेरी गए, जहां उन्होंने पहला मठ बनाया और मंडन मिश्र को उसका पहला शंकराचार्य नियुक्त किया। मठ के बाहर उदया भारती की प्रतिमा लगाई गई। उससे भी बहुत पहले राजा जनक के दरबार में विदुषी महिला गार्गी ने महान दार्शनिक, चिंतक य़ाज्ञवल्क्य को चुनौती दी थी और दर्शन के गंभीर प्रश्नों पर शास्त्रार्थ किया था। कुछ समय पहले ही नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने हम भारतीयों को लेकर ‘आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन्स’ नाम से एक किताब लिखी।
कहने का आशय है कि भारत में बड़े सवालों पर बहस की परंपरा रही है और छोटी छोटी बातों पर भी खूब बहस होती है। इसलिए बहस की चुनौती को अहंकार पर चोट की तरह नहीं लेना चाहिए। अगर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहस की चुनौती दी है तो यह चुनौती स्वीकार करने में उन्हें कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। आखिर वेस्टमिनिस्टर मॉडल के मुताबिक लोकसभा का नेता प्रतिपक्ष शैडो प्राइम मिनिस्टर होता है। इसलिए प्रधानमंत्री को छाया प्रधानमंत्री के साथ बहस में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। सो, भाजपा के जो नेता कह रहे हैं कि राहुल कैसे मोदी से बहस कर सकते हैं और चुनौती दे रहे हैं कि राहुल उनसे बहस करें, उन्हें इस मामले से दूर रहना चाहिए।
निश्चित रूप से थोड़े से लोग हैं, जो मानते हैं कि बहस में कोई समस्या नहीं है। लेकिन वे भी मानते हैं कि बहस संसद में होनी चाहिए। वे संसद से बाहर बहस की चुनौती या प्रस्ताव को ऐसे देख रहे हैं, जैसे यह कोई अपराध हो। हकीकत यह है कि दुनिया के अनेक देशों में संसद से बाहर बहस की परंपरा है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच खुली बहस होती है। किसी मीडिया समूह का कोई बड़ा पत्रकार बहस का संचालन करता है और विषयवार सवाल जवाब होते हैं। अगर अमेरिका का राष्ट्रपति, जिसे फ्री वर्ल्ड का सबसे पॉवरफुल व्यक्ति माना जाता है वह भी दोबारा उम्मीदवार है तो उसकी बहस प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार से होती है।
अमेरिका का राष्ट्रपति पुनर्निवाचन के समय यह नहीं कहता है कि वह राष्ट्रपति है तो ऐसे व्यक्ति से क्यों बहस करे जो उसके बराबर के कद का नहीं है। वहां राष्ट्रपति की ओर से उसकी पार्टी का कोई व्यक्ति बहस करने नहीं जाता है। अमेरिका के नागरिक राष्ट्रपति और संभावित राष्ट्रपति से ही सभी विषयों पर उनकी राय सुनना चाहते हैं। वहां राष्ट्रपति इसे अपने ईगो पर नहीं लेता है।
यह भारत में ही होता है कि जैसे ही राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे बहस करें वैसे ही भाजपा के कई नेता खामख्वाह सामने आ गए कि राहुल पहले उनसे बहस करें। यह पहले इनसे और फिर उनसे बहस का मुद्दा नहीं है। बहस राहुल और प्रधानमंत्री मोदी के बीच होगी अन्यथा नहीं होगी। अगर मोदी बहस कर लेंगे तो इससे उनका न तो कद छोटा हो जाएगा और न राहुल का कद अभी जितना है उससे बड़ा हो जाएगा। वह फैसला जनता को करना है। जनता ही मतदान के जरिए फैसला करती है कि किसका कद कितना बड़ा होगा।
राहुल गांधी के बहस के चैलेंज को लेकर दूसरी समस्या विषय की है। राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहस की चुनौती इसलिए दी क्योंकि मोदी ने 31 अक्टूबर को गुजरात के एकता नगर में एकता परेड के दौरान भाषण में राहुल गांधी का नाम लिए बगैर सवालिया लहजे में कहा था कि विदेशों में गुप्त मुलाकातें किसकी होती हैं और देश के दुश्मनों का समर्थन किसको मिलता है? राहुल ने कहा कि इस विषय पर बहस करते हैं। उन्होंने दावा किया कि वे पांच मिनट में साबित कर देंगे कि प्रधानमंत्री देश के विरोधियों से मिले हुए हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उनको नियंत्रित करते हैं।
भाजपा की ओर से जितने नेता राहुल को बहस की चुनौती दे रहै हैं या संसद में बहस की बात कर रहे हैं वे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और अन्य मसलों पर बहस की बात कर रहे हैं। उनमें से कोई यह नहीं कह रहा है कि भाजपा बहस में यह साबित करने को तैयार है कि राहुल गांधी देशद्रोही हैं, देश के दुश्मनों से मिले हुए हैं और विदेश जाते हैं तो देश के दुश्मनों से गुप्त मुलाकातें करते हैं।
भाजपा की सरकार है और अगर प्रधानमंत्री इस तरह के आरोप लगा रहे हैं तो उनके पास निश्चित रूप से पुख्ता सबूत होंगे। फिर उन्हें क्यों बहस से पीछे हटना चाहिए या विषय बदलना चाहिए? उनको तो सामने से बहस करके राहुल की मौजूदगी में सारे सबूत मीडिया और जनता के सामने रख देने चाहिए। ऐसा नहीं हो रहा है तो इसका अर्थ है कि सबूत नहीं हैं और राहुल गांधी की छवि व साख बिगाड़ने के लिए सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी हो रही है।
अब रही बात बहस के तरीके को लेकर तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि सार्थक बहस वह होती है, जिसमें एक एक सवाल पर बारी बारी से दोनों पक्ष जवाब दें। शास्त्रार्थ की परंपरा भी यही रही है। इसके उलट संसद की बहस में राहुल गांधी एक घंटे तक भाषण देकर आरोप लगाते हैं तो प्रधानमंत्री दो घंटे भाषण देकर दूसरे आरोप लगाते हैं। आरोपों का बिंदुवार जवाब कोई नहीं देता है। यहां, ‘एक सवाल मैं करूं, एक सवाल तुम करो, हर सवाल का सवाल ही जवाब हो’ वाले अंदाज में बहस होती है। बहस ऐसी होनी चाहिए, जिससे स्पष्टता आए। जिसमें सवालों के जवाब मिलें और आरोपों को प्रमाणित करने के सबूत रखे जाएं। ऐसी बहस एक बार जरूर होनी चाहिए।
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