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घुसपैठ पर क्या सिर्फ राजनीति होगी?

अयोध्या में राममंदिर का निर्माण, देश भर में समान नागरिक संहिता लागू करने और जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का मुद्दा राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनसंघ का सबसे पुराना एजेंडा था। आजादी के तुरंत बाद से इस पर बहस हो रही थी और अलग अलग समय पर आंदोलन भी हुए। इनमें से दो मुद्दे सुलझ गए हैं। अयोध्या में भव्य राममंदिर बन गया है और कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया है। जहां तक देश भर में समान कानून लागू करने की बात है तो उसकी भी शुरुआत हो गई है। उत्तराखंड पहला राज्य बना है, जहां यूसीसी लागू किया गया है। इसी तर्ज पर गुजरात और असम जैसे राज्यों में भी इसे लागू करने की तैयारी चल रही है।

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि राज्यवार समान नागरिक संहिता लागू हो। अब सवाल है कि इन तीन मुद्दों के हल होने के बाद आगे क्या? हिंदू राष्ट्र का निर्माण चिरंतन मुद्दा है वह चलता रहेगा लेकिन ऐसा लग रहा है कि भाजपा और संघ का नया मुद्दा घुसपैठ का है। अब हर बात में घुसपैठ का जिक्र होगा, हर चुनाव में यह मुद्दा होगा और इसे सुलझाने के प्रयास के लिए वोट मांगे जाएंगे। कहने की जरुरत नहीं है कि घुसपैठ की समस्या के लिए कांग्रेस और उसकी कथित तुष्टिकरण की नीतियों को जिम्मेदार बताया जाएगा। यह भी कहने की जरुरत नहीं है पहले के मुद्दों की तरह इसमें भी अंतर्निहित मुद्दा हिंदू-मुस्लिम का होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से लगातार 11 बार भाषण दिए तो उसमें उन्होंने घुसपैठ का जिक्र नहीं किया। घुसपैठ का जिक्र पहली बार उनके 12वें भाषण में आया। जाहिर है अनुच्छेद 370, यूसीसी और राममंदिर के बाद पैदा हुए खालीपन में एक नए मुद्दे की तलाश थी, जो घुसपैठ पर जाकर खत्म हुई है। हालांकि अभी तक इस मुद्दे के चुनाव जीता देने की क्षमता की परीक्षा नहीं हुई है। झारखंड में भाजपा ने बड़े जोर शोर से इस मुद्दे को आजमाया था लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इस मुद्दे के चैंपियन नेता असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को झारखंड में उतारा गया था लेकिन वे भी विफल रहे। लेकिन भाजपा ने हार नहीं मानी है। उसको पता है कि पुराने मुद्दे कितने दशक तक चले थे और कितने समय के बाद उनका राजनीतिक लाभ मिलना शुरू हुआ था। इसलिए घुसपैठ का मुद्दा पूरे जोरशोर से चलता रहेगा।

झारखंड के बाद इसकी परीक्षा बिहार में होगी और उसके बाद असम और पश्चिम बंगाल में  इसे आजमाया जाएगा। इन तीन राज्यों के चुनाव को ध्यान में रख कर ही इसे मुद्दा बनाया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से ऐलान किया कि सरकार एक उच्च अधिकार प्राप्त डेमोग्राफी कमीशन बनाएगी, जो घुसपैठ की समस्या का आकलन करेगी और इससे निपटने के उपाय करेगी। ध्यान रहे घुसपैठ की समस्या नई नहीं है। आजादी के बाद से ही भारत में कई तरफ से घुसपैठ हो रही है।

बुनियादी रूप से घुसपैठ की समस्या को लेकर ही भारत 1971 की लड़ाई में शामिल हुआ था। सो, पिछले कई दशक से यह समस्या भारत के सामने है और भाजपा हर चुनाव में इसे किसी न किसी रूप में उठाती भी रही है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि इसे मुख्य मुद्दे के तौर पर उठा कर राष्ट्रीय विमर्श में स्थापित करने  का प्रयास किया जा रहा है। कितनी कामयाबी मिलेगी इसकी परीक्षा नवंबर से लेकर मई तक होने वाले तीन राज्यों, बिहार, असम और पश्चिम बंगाल के नतीजों में होगी।

अब सवाल है कि सरकार घुसपैठ की समस्या को सिर्फ राजनीतिक मुद्दे के तौर पर उठा रही है या सचमुच इसका समाधान करना चाहती है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि पिछले 11 साल से लगातार केंद्र में भाजपा की सरकार है और अभी तक घुसपैठ रोकने का एक भी गंभीर प्रयास होता नहीं दिखा है। पिछले छह साल से लगातार अमित शाह केंद्रीय गृह मंत्री हैं। उन्होंने सबसे लंबे समय तक गृह मंत्री बने रहने का रिकॉर्ड बनाया है। लेकिन बांग्लादेश की सीमा की बाड़ेबंदी का काम पहले की तरह मंथर गति से ही चल रहा है।

इसमें कोई तेजी नहीं आई है। बांग्लादेश की सीमा से होने वाली घुसपैठ के लिए 11 साल पहले की कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाता है और पश्चिम बंगाल सरकार पर हमला किया जाता है वह जमीन नहीं दे रही है। अगर बंगाल सरकार जमीन नहीं दे रही है तो सवाल है कि क्या असम से लगती सीमा पर बाड़ लगा दी गई है या त्रिपुरा से लगती बांग्लादेश की सीमा पर बाड़ लगा दी गई है। असम में 10 साल से और त्रिपुरा में आठ साल से भाजपा की सरकार है। डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद बांग्लादेश से लगती सीमा पर बाड़ नहीं लगाई गई है और इंसानों से लेकर पशुओं तक की तस्करी जारी है। पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्यों में भाजपा या एनडीए की सरकार है लेकिन म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या घुसपैठियों को नहीं रोका जा सका है। रोहिंग्या घुसपैठियों की समस्या तो बढ़ी ही पिछले 11 साल में है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घुसपैठ की समस्या को बड़ा मुद्दा बताया है और कहा है कि इससे देश की जनसंख्या संरचना बदल रही है। इसके लिए उन्होंने सीमावर्ती जिलों के अधिकारियों को सचेत किया है और निगरानी बढ़ाने को कहा है। सवाल है कि कई साल पहले जब राज्यों के विरोध के बावजूद केंद्र सरकार ने सीमावर्ती राज्यों में सीमा या नियंत्रण रेखा से डेढ़ सौ किलोमीटर के अंदर तक निगरानी करने, जांच करने, छापा मारने और गिरफ्तार करने का अधिकार केंद्रीय अर्धसैनिक बल बीएसएफ को सौंप दिया फिर भी घुसपैठ क्यों नहीं रूकी, जो अब सीमावर्ती जिले के अधिकारियों को सचेत किया जा रहा है? ध्यान रहे पहले बीएसएफ को 50 किलोमीटर अंदर तक जांच करने और संदिग्धों को गिरफ्तार करने का अधिकार था, जिसे बढ़ा कर डेढ़ सौ किलोमीटर कर दिया गया है। जब सीमा से लेकर 50 किलोमीटर तक की निगरानी बीएसएफ कर रही थी तो घुसपैठ कैसे बढ़ी और अब जबकि डेढ़ सौ किलोमीटर तक निगरानी उसके जिम्मे है तब भी घुसपैठ क्यों जारी है? सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है। यह भी नहीं बताया जा रहा है कि अगर यह योजना कामयाब नहीं हुई है तो दूसरा क्या रास्ता अपनाया जाएगा।

बिना किसी योजना के यहां वहां घुसपैठियों की धरपकड़ शुरू कर दी गई है। दिल्ली में और एनसीआर के शहरों, जैसे गुरुग्राम, गाजियाबाद और नोएडा में धरपकड़ हो रही है। लेकिन किसी को पता नहीं है कि पकड़े जा रहे बांग्लाभाषी लोग पश्चिम बंगाल के हैं या बांग्लादेश के। अवैध घुसपैठियों को निकालने का काम कैसे व्यवस्थित तरीके से किया जाता है यह अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने दिखाया। अमेरिका ने भारत के सैकड़ों अवैध प्रवासियों को हथकड़ी और बेड़ी में जकड़ कर सेना के जहाज में बैठा कर भारत भेज दिया। भारत अगर गंभीर है तो घुसपैठियों की पहचान ऐसे व्यवस्थित तरीके से करे और उन्हें बांग्लादेश की सीमा में जाकर छोड़े। लेकिन ऐसा कोई प्रयास करने की बजाय इसका राजनीतिक नैरेटिव बनाया जा रहा है।

झारखंड में भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी आरोप लगे हैं कि राज्य में घुसपैठियों को बसा कर उनको नागरिक बनाया जा रहा है, जो एक दिन विधायक बन कर विधानसभा में पहुंचेंगे। केंद्र में भाजपा की सरकार होने और सीमा प्रबंधन उसके हाथ में होने के बावजूद कैसे बांग्लादेशी घुसपैठिए झारखंड पहुंच कर वहां बस रहे हैं, इसका जवाब कौन देगा? इसी तरह असम में चुनाव है तो हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने नियम बनाया है कि अगर जमीन की अंतरधार्मिक खरीद बिक्री होती है तो उसके लिए पहले पुलिस की मंजूरी लेनी होगी। ध्यान रहे झारखंड और असम में एक जैसा मुद्दा उठाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए भारत में आकर शादी कर रहे हैं  और जमीन खरीद रहे हैं। इस आरोप में सचाई भी है लेकिन सरकार इसे रोकने के लिए गंभीरता से प्रयास नहीं कर रही है। भाजपा के लिए घुसपैठ बड़ा मुद्दा है लेकिन उसे सुलझाने से पहले उसका राजनीतिक लाभ लेने की सोच दिख रही है।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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