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बंगाल में पुनर्जागरण या पुनरूत्थान?

बंगाल के बारे में कहा जाता था कि बंगाल जो आज सोचता है पूरा देश कल उस पर विचार करता है। ऐसा इसलिए कहा जाता था क्योंकि बंगाल देश के बाकी राज्यों से बुनियादी रूप से भिन्न था। अंग्रेजों के आने से पहले का भारत अलग था। लेकिन ब्रिटिश शासन में भारत के राज्यों का अलग अलग चरित्र उभरा। उस समय बंगाल अपनी बौद्धिक क्षमता, कलात्मक उत्कृष्टता और सांस्कृतिक महानता की वजह से बाकी राज्यों से अलग और विशिष्ट हो गया। देश के बाकी राज्य जहां अतीत की गाथा में डूबते गए वही बंगाल भविष्य पर विचार करने लगा। देश के दूसरे हिस्सों में पुनरूत्थानवादी सोच पनपी तो बंगाल में पुनर्जागरण शुरू हुआ।

यह पुनर्जागरण हर प्रकार का था। धार्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर अगर रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद हुए तो कला और साहित्य में गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगेर और बंकिमचंद्र चटर्जी हुए। समाज सुधार के क्षेत्र में राजा राम मोहन राय और ईश्वर चंद् विद्यासागर जैसे महापुरुष हुए। आजादी की लड़ाई में शामिल और शहीद होने वालों की सूची देश के दूसरे किसी भी राज्य के मुकाबले ज्यादा लंबी है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से लेकर खुदीराम बोस तक का लंबा इतिहास है।

सो, बंगाल पुनर्जागरण वाला राज्य था। वह इस ट्रैप में नहीं फंसा कि भारत में सब कुछ पहले से था। दुनिया में जो भी आविष्कार हो उसके बारे में कह दिया जाए कि वह भारत में पहले से था। सारा ज्ञान वेद, पुराण और उपनिषदों में है यह कह शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन गाड़ लेने की सोच जब सारे देश में थी तब बंगाल इससे अलग सोच रहा था। उसे पुनरूत्थान की दिशा में यानी अतीत में नहीं लौटना था। तभी समाज सुधार से लेकर आजादी की लड़ाई को दिशा देने का काम वहां से शुरू हुआ। बंगाल के महापुरुष कैसे थे इसकी कई मिसालें दी जा सकती हैं कि लेकिन गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर को प्रतीक मान कर समझ सकते हैं कि वह प्रदेश कैसे समय से आगे चल रहा था।

उन्हें अंग्रेजों ने नाइटहुड की उपाधि दी थी, जिसे उन्होंने जलियांवाला बाग कांड के बाद लौटा दिया था। वे भारत में पहले व्यक्ति थे, जिन्हें नोबल पुरस्कार मिला। रविंद्र साहित्य से लेकर रविंद्र संगीत तक बंगाल की पहचान बनी। उन रविंद्रनाथ टैगोर ने अपने बेटे रथिंद्र नाथ का विवाह एक बाल विधवा से किया था। प्रतिमा देवी ठाकुरबाड़ी की पहली बहू थीं, जो विधवा थीं और बहू बन कर आईं। ऐसे ही ईश्वरचंद्र विद्यासागर का बाल विवाह हुआ था लेकिन उन्होंने बाल विवाह की प्रथा खत्म करने के लिए व्यापक जन जागरूकता अभियान चलाया। राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा की समाप्ति का आंदोलन किया।

बांग्ला पुनर्जागरण का दौर एक समय के बाद समाप्त हो गया। इसके बावजूद आजादी के बाद भी संगीत, कला, संस्कृति, साहित्य आदि के क्षेत्र में बांग्ला वर्चस्व कायम रहा। सत्यजीत रे और बिमल रॉय तब भी कला का प्रतिमान बने रहे। क्. भारतीय जनता पार्टी पुनर्जागरण का पक्ष लेगी या पुनरूत्थान का? ध्यान रहे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ यानी आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी व्यापक रूप से पुनरूत्थान के समर्थक रहे हैं। ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि सब कुछ पहले से भारत में थे। भारत एक समय विश्वगुरू था तो अब भी उसे विश्वगुरू बनना है।

कई लोग तो मानते हैं कि भारत विश्वगुरू बन चुका है। परमाणु खोज से लेकर क्वांटम फिजिक्स तक और सर्जरी से लेकर पुष्पक विमान तक भारत में सब कुछ कई हजार साल पहले था। इस सोच के साथ भारतीय जनता पार्टी बंगाल में क्या कर पाएगी? भाजपा की सरकार अगर कला व संगीत को बढ़ावा दे तो कोई बात बने। साहित्य को प्रोत्साहित करे तब माना जाए कि वह बंगाल में पुनर्जागरण करने आई है। भाजपा पिछले 12 साल से केंद्र की सत्ता में है और उससे पहले से कई राज्यों में सरकार चला रही है। गुजरात से लेकर दिल्ली तक ऐसी कोई उपलब्धि या ऐसा कोई ट्रैक रिकॉर्ड तो नहीं दिख रहा है, जब भाजपा की सत्ता के संरक्षण में संगीत, कला, साहित्य या विज्ञान के क्षेत्र में कोई अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल हुई हो।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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