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गपशप

बिहार में जात गणित से फैसला?

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भाजपा और नरेंद्र मोदी ने सोचा भी नहीं होगा कि 22 जनवरी को अयोध्या में राममंदिर का उद्घाटन होगा और सिर्फ तीन महीने में हिंदुत्व का छाता जाति की तेज आंधी में उड़ जाएगा। मंडल राजनीति की सबसे उर्वर जमीन बिहार में लालू प्रसाद की जात बिसात के आगे भाजपा का हिंदुत्व का कार्ड फेल होते हुए है। भाजपा ने यह होशियारी जरूर दिखाई जो नीतीश कुमार को साथ ले लिया लेकिन नीतीश अब अपने राजनीतिक करियर के प्राइम से ढलान पर हैं। वे उस तरह से जाति की बिसात नहीं बिछा सके, जैसे लालू और उनके बेटे तेजस्वी यादव ने  किया है।  

लालू ने भाजपा और जदयू के समूचे वोट बैंक को तोड़ने का कोई हवा हवाई काम नहीं किया। उन्होंने दो सबसे महत्वाकांक्षी ओबीसी जातियों की पहचान की, जिनको सत्ता की ललक है और उनके नेताओं को अपने साथ जोड़ा और सीटें दीं। नीतीश के कमजोर होने का फायदा उठाते हुए लालू ने उनके लव कुश समीकरण यानी कोईरी, कुर्मी वोट को टारगेट किया और भाजपा के अति पिछड़े वोट में सबसे मजबूत मल्लाह वोट को लक्ष्य बनाया।

लालू ने जाति की बिसात बिछाते हुए यह सुनिश्चित किया कि कहीं भी जाति का जाति से टकराव नहीं हो। तभी बिहार की 40 में से सिर्फ पांच सीटों पर ही एनडीए के उम्मीदवार की जाति का उम्मीदवार ‘इंडिया’ ब्लॉक ने दिया है। बाकी हर जगह दूसरी जाति का उम्मीदवार उतारा ताकि अपने समीकरण के वोट के साथ दूसरी जाति का वोट जुड़े। लालू, कांग्रेस और लेफ्ट का समीकरण मोटे तौर पर मुस्लिम और यादव का है यानी एमवाई समीकरण है, जो बिहार में 32 फीसदी है। इसके अलावा मल्लाह और उसकी तमाम उपजातियां नौ फीसदी के करीब हैं और कोईरी, कुर्मी, धानुक आठ फीसदी के करीब। इस तरह विपक्ष ने 50 फीसदी वोट का गणित बनाया है। 

इसका नतीजा यह हुआ कि बिहार की कम से कम आधी सीटों पर कांटे की टक्कर हो गई और बाकी सीटों पर अच्छी लड़ाई है। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने की तरह विपक्षी गठबंधन को मुकेश सहनी मिले। भाजपा के साथ उनकी बात नहीं बनी तो वे ‘इंडिया’ के साथ चले गए। उन्होंने पिछले 10 साल के अथक परिश्रम से अपने को मल्लाहों के सर्वमान्य नेता के तौर पर स्थापित किया है। उनकी वजह से हर सीट पर कुछ न कुछ मल्लाह वोट विपक्षी गठबंधन को मिल रहा है। 

लालू प्रसाद ने भाजपा और जनता दल यू के वोट तोड़ने के लिए उनके सामाजिक समीकरण वाली जातियों के उम्मीदवार जिन सीटों पर उतारे वहां अपने आप कड़ा मुकाबला है। औरंगाबाद सीट पर भाजपा के ठाकुर उम्मीदवार सुशील कुमार सिंह के मुकाबले लालू ने कुशवाहा उम्मीदार अभय कुशवाहा को उतारा और नवादा में भाजपा के भूमिहार उम्मीदवार विवेक ठाकुर के मुकाबले श्रवण कुशवाहा को टिकट दिया। दोनों सीटों पर कुशवाहा वोट पूरी तरह से राजद उम्मीदवार के साथ गया और ऊपर से यादव, मुस्लिम का वोट जुड़ गया, जिससे दोनों सीटों पर जबरदस्त लड़ाई हो गई। पूर्वी चंपारण सीट पर भाजपा के राधामोहन सिंह के मुकाबले विपक्षी गठबंधन की विकासशील इंसान पार्टी से राजेश कुशवाहा उम्मीदवार हो गए। वहां मुस्लिम यादव के साथ कुशवाहा और मल्लाह का समीकरण बहुत मजबूती से बन गया है और जमीन पर जबरदस्त लड़ाई दिखने लगी है। राजद का एक और कुशवाहा उम्मीदवार आलोक मेहता उजियारपुर सीट पर हैं, जहां केंद्रीय गृह मंत्री नित्यानंद राय के लिए लड़ाई मुश्किल हो गई है। पांचवें कुशवाहा उम्मीदवार अंशुल अविजीत हैं, जो पटना साहिब सीट पर भाजपा के रविशंकर प्रसाद को टक्कर दे रहे हैं। 

इसी तरह विपक्षी गठबंधन के तीन वैश्य उम्मीदवारों ने भाजपा और जदयू के लिए मुश्किल खड़ी की है। शिवहर सीट पर वैश्य सांसद रमा देवी की टिकट कट गई और सीट जदयू के खाते में चली गई, जिसने ठाकुर समाज की लवली आनंद को उतारा। वहां राजद ने रितू जायसवाल को टिकट देकर भाजपा के कोर वोट आधार में सेंध लगाई। इसी तरह झंझारपुर में जदयू के रामप्रीत मंडल के मुकाबले विकासशील इंसान पार्टी ने सुमन महासेठ को और आरा में भाजपा के आरके सिंह के खिलाफ सीपीआई माले के सुदामा प्रसाद को उतारा। इन तीनों वैश्य उम्मीदवारों को वैश्य मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है। भाजपा के एक और कोर वोट भूमिहार में सेंध लगाने के लिए विपक्षी गठबंधन ने तीन भूमिहार उम्मीदवार उतारे। राजद ने वैशाली में मुन्ना शुक्ला को और कांग्रेस ने महाराजगंज में आकाश कुमार सिंह और भागलपुर में अजीत शर्मा को उतारा। इन तीनों सीटों पर एनडीए का कोर वोट टूटने की खबर है। 

जिन पांच सीटों पर दोनों गठबंधनों से एक ही जाति के उम्मीदवार हैं उनमें मुजफ्फरपुर, काराकाट, बांका और पाटलिपुत्र शामिल हैं। काराकाट सीट पर एनडीए के उपेंद्र कुशवाहा के मुकाबले विपक्षी गठबंधन के सीपीआई माले से राजाराम कुशवाहा उम्मीदवार हैं और दोनों के बीच वोट बंट रहा है। मुजफ्फरपुर में भाजपा के राजभूषण निषाद के मुकाबले कांग्रेस ने अजय निषाद को उतारा है। तीन सीटों, बांका, पाटलिपुत्र और मधेपुरा पर यादव बनाम यादव है। इन पांच से तीन सीटों- बांका, पाटलिपुत्र और काराकाट पर विपक्ष अच्छी टक्कर दे रहा है। 

बिहार में जाति की राजनीति के साथ साथ रोजगार एक बड़ा मुद्दा हो गया है। अगस्त 2022 से जनवरी 2024 तक नीतीश कुमार के साथ उप मुख्यमंत्री रहे तेजस्वी यादव को रोजगार देने वाले नेता के तौर पर देखा जाने लगा है। इस अवधि में दो लाख से ज्यादा लोगों को सरकारी नौकरी मिली है। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री होने के नाते इसका श्रेय ले रहे हैं। लेकिन आम युवाओं में यह मैसेज है कि रोजगार तेजस्वी की वजह से मिले। भाजपा इस नैरेटिव को काट नहीं पाई।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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