राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

किसकी डिग्री असली और कौन परजीवी नहीं

यह बड़ा सवाल है क्योंकि चीफ जस्टिस ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने फर्जी डिग्री वाले लोगों को कॉकरोच और परजीवी कहा था। ऐसे लोगों को जिनके पास डिग्री नहीं है या फर्जी है और वकील या एक्टिविस्ट बन कर सरकार व सिस्टम पर सवाल उठा रहे हैं। तभी सवाल है कि भारत में किसकी या कितने लोगों की डिग्री असली है और उसी से जुड़ा सवाल यह कि कौन परजीवी नहीं है? भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है और सही से जांच हो जाए तो सबसे ज्यादा फर्जी डिग्री वाला देश भी भारत ही होगा। यहां कॉलेज और तकनीकी संस्थान डिग्री देने के लिए खोले जाते हैं। उच्च शिक्षा के जितने संस्थान पढ़ाई कराने के लिए हैं उससे ज्यादा संस्थान डिग्री देने के लिए बने हैं। हर व्यक्ति गले में एक डिग्री लटका कर घूम रहा है।

भारत संभवतः एकमात्र देश है, जहां खुलेआम विज्ञापन दिया जाता है कि 30 हजार या 40 हजार रुपए दें और डिग्री प्राप्त करें। भारत एकमात्र देश है, जहां विज्ञापन लिखा हुआ होता है कि सातवीं और आठवीं में फेल सीधे दसवीं पास करें या 10वीं में फेल सीधे 12वीं पास करें। भारत में कुकुरमुत्ते की तरह लॉ और शिक्षक प्रशिक्षण यानी बीएड की डिग्री देने वाले कॉलेज खुले हें। बिना एक भी दिन कॉलेज गए डिग्री हासिल की जा सकती है। उस डिग्री के दम पर शिक्षक भी बना जा सकता है और वकील भी। आए दिन इस किस्म के वीडियो वायरल होते हैं कि कक्षा में पढ़ा रहे शिक्षक को अपने विषय का बुनियादी ज्ञान नहीं होता है।

कई राज्यों के शिक्षा बोर्ड के टॉपर को अपने विषय का ज्ञान नहीं था। पेपर लीक करा कर लोग मेडिकल की परीक्षा पास कर रहे हैं और चार साल तक एमबीबीएस की पढ़ाई के बाद जब पीजी कोर्स में दाखिले के लिए नीट पीजी की परीक्षा देते हैं तो उसमें माइनस 40 अंक मिल रहे हैं। सोचें, उस मेडिकल की डिग्री के बारे में, जिसे हासिल करने वाले डॉक्टर साहेब लोगों को उसी पढ़ाई की परीक्षा में माइनस में अंक मिल रहे हैं। दिव्यांगता और आर्थिक रूप से कमजोर होने के फर्जी सर्टिफिकेट से तो लोग देश की सबसे बड़ी परीक्षा में उतीर्ण होकर कलेक्टर, एसपी बन रहे हैं। सो, अगर जांच हो जाए तो यह पता लगाने में बड़ी समस्या हो जाएगी कि किसकी डिग्री असली है। ऐसा लगता है कि असली डिग्री वाले ज्यादातर लोग देश से बाहर ही चले जाते हैं। तभी पूरा देश फर्जी डिग्री वालों के हवाले हो गया है।

इसी तरह यह सवाल भी है कि इस देश में परजीवी कौन नहीं है? वैसे यह क्रोनोलॉजी भी दिलचस्प है कि कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कार्यक्रम में कहा कि कांग्रेस अब परजीवी पार्टी हो गई है। उसके बाद चीफ जस्टिस को भी इस शब्द का इस्तेमाल करने की जरुरत पड़ी। इसी से परजीवी विमर्श की शुरुआत हुई। हकीकत यह है कि इस देश में सब परजीवी हैं, पुरुषार्थी दीया लेकर खोजने से मिलेंगे। बुद्धि, ज्ञान, बल से पुरुषार्थी वो लोग हैं, जिन्होंने दुनिया को अपना बनाया है। अमेरिका, यूरोप के वैज्ञानिक, उद्यमी, शोधकर्ता असली पुरुषार्थी हैं। भारत में तो जो सबसे अमीर है वह भी जोंक की तरह इस देश के संसाधनों का इस्तेमाल करके और देश के लोगों का खून चूस कर क्रोनी खरबपति है। इसी तरह जाति, धर्म या पैसे के दम पर जनता को ठग कर, मूर्ख बना कर नेता बड़े हुए हैं। नौकरशाही का पूरा ढांचा ही परजीवी होने के सिद्धांत पर खड़ा है। चाहे देश के नेता हों, अधिकारी हों या उद्योगपति सब परजीवी दीमकों की तरह क्या इस देश को खोखला नहीं बनाते आ रहे हैं?

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

thirteen − 10 =