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बौद्धिक जमात की बेलगाम उम्मीदें

कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर सरकार की घबराहट दिखी है तो दूसरी ओर भाजपा व नरेंद्र मोदी सरकार का विरोध करने वालों की बेलगाम उम्मीदें दिख रही हैं। पिछले डेढ़ दशक से कई असफल प्रयोग कर चुके योगेंद्र यादव को कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से बने एक सोशल मीडिया हैंडल से उम्मीदें बंध गईं हैं। यह एक औपचारिक पार्टी बने या संगठन का रूप ले तब तो कुछ कहा भी जा सकता है लेकिन एक सोशल मीडिया हैंडल, चाहे वह कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो जाए, उससे क्या उम्मीद की जा सकती है? इस सोशल मीडिया हैंडल को फॉलो करने वाला एक भी व्यक्ति सड़क पर उतर कर वही बात नहीं कर रहा है, जो वहा लिखा जा रहा है। फिर भी योगेंद्र यादव, शशि थरूर, ध्रुव राठी जैसों को लग रहा है कि क्रांति दरवाजे पर दस्तक दे रही है।

सोचें, योगेंद्र यादव के ऊपर। वे इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जुड़े और आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे। उससे न तो करप्शन के खिलाफ आंदोलन का कुछ हासिल हुआ और न आम आदमी पार्टी से कुछ बना। फिर स्वराज इंडिया नाम से संगठन और पार्टी बनाई। उसका भी कुछ नहीं बना। राहुल गांधी के साथ जुड़े और भारत जोड़ो यात्रा में योगदान किया। अब कॉकरोच जनता पार्टी से उम्मीदें जोड़ी हैं। सवाल है कि क्या इस सोशल मीडिया हैंडल से जो युवा जुड़े हैं उनकी सोशल प्रोफाइलिंग योगेंद्र यादव के पास है? क्या उनको लग रहा है कि ये युवा उनके विचारों का समर्थन करेंगे? योगेंद्र यादव आखिर कहां तक जाएंगे? उनके पास जाति जनगणना करा दो, जाति के अनुपात में आरक्षण बढ़ा दो, निजी सेक्टर व न्यायपालिका में आरक्षण दो, इसके अलावा क्या वैकल्पिक योजना है? एक बार वे इस सोशल मीडिया हैंडल वालों से आरक्षण बढ़ाने के बारे में बात करके तो देखें। हो सकता है कि सब उसके विरोधी निकलें।

इसी तरह शशि थरूर को लग रहा है कि कॉकरोच जनता पार्टी नाम से बना सोशल मीडिया हैंडल इतना लोकप्रिय हुआ हो तो इसके पीछे युवाओं के अंदर पिछले अनके बरसों से पल रही निराशा है। उसके अंदर भरा हुआ गुस्सा है, जिसकी वजह से वह इस हैंडल से जुड़ रहा है। यह कहते हुए क्या शशि थरूर ने सोचा है कि वे देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता हैं, जिसे लोगों ने 99 सीटें लोकसभा में जिताई हैं? मुख्य विपक्षी पार्टी के नाते जो करने की जिम्मेदारी उनके ऊपर थी उसमें उन्होंने क्या किया है?

अगर सचमुच गुस्से और निराशा की वजह से युवा इस सोशल मीडिया हैंडल से जुड़ रहे हैं तो फिर कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों की इससे बड़ी विफलता क्या हो सकती है कि वे इतनी निराशा और गुस्सा होने के बावजूद युवाओं को अपने साथ नहीं जोड़ पाए? विपक्ष को इस बारे में सोचना चाहिए। लेकिन इसकी बजाय विपक्ष बीजेपी बनाम सीजेपी का नारा लगा रहा है। सीजेपी कोई पार्टी नहीं है और न कोई आंदोलन है। विपक्ष और सरकार दोनों को इससे सबक लेना चाहिए। विपक्ष को प्रयास करना चाहिए कि वह युवाओं के गुस्से को अपनी तरफ मोड़े तो सरकार को भी इसका संकेत समझना चाहिए और उसके हिसाब से अपनी नीतियां बनानी चाहिए।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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