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संकट से मुंह चुराने का रवैया

भारत में जब भी आर्थिक संकट की बात होती है तो सरकार की ओर से एक ही बात कही जाती है कि भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। इसमें यह भी जोड़ दिया जाता है कि सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है। सरकार का कोई ज्यादा समझदार व्यक्ति होगा तो वह चीन का चार या पांच फीसदी का आंकड़ा पेश करेगा और बताएगा कि भारत सात फीसदी से ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहा है। अब सोचें कहां 21 ट्रिलियन डॉलर की चीन की अर्थव्यवस्था  और कहां चार ट्रिलियन डॉलर से कम की भारत की अर्थव्यवस्था! इन दोनों में भला क्या तुलना हो सकती है? कम रफ्तार से भी बढ़े तो चीन हर साल भारत के मुकाबले अपनी जीडीपी में कई गुना ज्यादा इजाफा करेगा।

बावजूद  इसके सरकार की ओर से हर संकट में यह कहा जा रहा है भारत सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सात सौ अरब डॉलर से ज्यादा का है। वास्तविकता यह है कि भारत की विकास दर का आंकड़ा भी सवालों के घेरे में है और बदलती वैश्विक स्थितियों में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का भी कोई खास मतलब नहीं रह गया है। जिस अनुपात में भारत का आयात बिल बढ़ रहा है उसमें विदेशी मुद्रा भंडार को संभाले रहना बड़ी चुनौती है।

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा यह समझा रहे हैं कि भारत की मुद्रा असल में इतनी कमजोर नहीं है, जितनी दिख रही है। सोचें, इसमें असल में और दिखने में क्या फर्क है? उनका कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही है और देश का विदेशी मुद्रा भंडार बेहद मजबूत है और इसलिए रुपए को थोड़ा और मजबूत होना चाहिए था, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों के चलते बाजार में इसकी कीमत वास्तविक मूल्य से कम हो गई है। उन्होंने मार्केट में यह नया जुमला उतारा है कि भारतीय मुद्रा वास्तविकता से थोड़ा ज्यादा अंडरवैल्यूड हो गई है। उनके हिसाब से स्थिति इतनी खराब नहीं है। वे यह भी कह रहे हैं कि रुपए की गिरावट अस्थायी है और इसमें रिकवरी हो सकती है। उनके मुताबिक रुपया अपनी वास्तविक वैल्यू से कम पर ट्रेड कर रहा है।

मतलब वे समझाना चाह रहे हैं कि रुपए की सेहत में कोई खराबी नहीं है, बल्कि दुनिया भर में चल रही उथल पुथल के कारण बाजार ने इसे अस्थायी रूप से कम आंका है। सोचें, क्या भारत के किसी नागरिक को याद है कि पहले कभी भारतीय मुद्रा की क्या रिकवरी हुई है? पिछले 12 साल में रुपए की कीमत में 50 फीसदी से ज्यादा की गिरावट हुई है और इन 12 वर्षों में कोई समय ऐसा नहीं रहा है कि गिरने के बाद रुपए ने वापसी की। इसलिए अभी अगर एक डॉलर की कीमत 97 रुपए के करीब है तो यह रिकवर होकर 90 रुपए नहीं होने वाली है। उलटा होगा रूपया धीरे-धीरे गिरता ही जाएगा।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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