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बांग्लादेश, पाकिस्तान से कैसे निपटे?

भारत के सामने नई बड़ी चुनौती बांग्लादेश की खड़ी हो गई है। वहां 12 फरवरी को राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं, जिसमें शेख हसीना की आवामी लीग चुनाव नहीं लड़ रही है। मुख्य मुकाबला दिवंगत खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात ए इस्लामी के बीच है। दोनों कट्टरपंथी पार्टियां हैं और दोनों का रुख बुनियादी रूप से भारत विरोधी रहा है। भारत के लिए कम खराब पार्टी बीएनपी है। लेकिन चुनाव से पहले जिस तरह से बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले शुरू हुए हैं और धारावाहिक की तरह हर दिन कहीं न कहीं किसी हिंदू के मारे जाने, हिंदू महिला को प्रताड़ित किए जाने या हिंदू घरों पर हमले की खबरें आ रही हैं और भारत सरकार कुछ नहीं कर पा रही है उससे सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े होते हैं।

यह सवाल इसलिए खड़े होते हैं क्योंकि आज की दुनिया में हर देश अपने नागरिकों और अपने धर्म को बचाने के लिए लड़ रहा है। पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाइजीरिया पर हमला कर दिया। उन्होंने इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर बमबारी की। नाइजीरिया पर हमले और बमबारी से पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि वहां ईसाई समुदाय के लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है। सोचें, अमेरिका ने नाइजीरिया में ईसाई बनाम मुस्लिम के झगड़े में दखल दिया। उन्होंने ईसाईयों को बचाने के लिए इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर हमला किया। उससे पहले उन्होंने जी20 से दक्षिण अफ्रीका को इसलिए बाहर किया क्योंकि उनका कहना था कि दक्षिण अफ्रीका में ईसाईयों के साथ भेदभाव हो रहा है और उनको परेशान किया जा रहा है।

बांग्लादेश में इसी तरह डेढ़ करोड़ की हिंदू आबादी प्रताड़ित हो रही है। लेकिन भारत सरकार ने राष्ट्रपति ट्रंप की तरह राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। राजनियक स्तर पर बांग्लादेश के उच्चायुक्त को बुला कर शिकायत करने के अलावा भारत ने कुछ नहीं किया। ध्यान रहे भारत ने जब से शेख हसीना को अपने यहां शरण दी है तब से बांग्लादेश में हिंदू प्रताड़ित हो रहे हैं लेकिन भारत निर्णायक दखल देने का फैसला नहीं कर पा रहा है। चुनाव के बाद निश्चित रूप से कट्टरपंथियों की सरकार बनेगी और तब भी ऐसे ही हमले जारी रहे तो भारत क्या करेगा? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि उसके बाद फिर बांग्लादेश से शरणार्थियों के भारत आने का सिलसिला बढ़ेगा। यह भारत के लिए बड़ी समस्या बन सकती है।

इसी तरह पाकिस्तान से निपटने का मामला भी है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद वह अपनी ताकत बढ़ा रहा है। वह चीन और तुर्किए से हथियार और ड्रोन खरीद रहा है। अपनी जीत का नैरेटिव बना रहा है और दावा कर रहा है कि भारत के साथ सीमित जंग के बाद उसके जे 17 विमानों की मांग बढ़ गई है। मुस्लिम देश उससे विमान खरीद रहे हैं। उसके सेना प्रमुख आसिम मुनीर ध्रुवीकरण कराने वाला नया चेहरा बन कर उभरे हैं। मुस्लिम नाटो बनाने की चर्चा वास्तविक रूप से शुरू हो गई है। खुद भारत के सेना प्रमुख ने सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा है कि सीमा पार फिर से दो दर्जन से ज्यादा आतंकी शिविर काम करने लगे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है।

तब सवाल है कि जब जारी है तो कैसे सीमा के पास आतंकियों को शिविर बनाने दिया जा रहा है? भारतीय सीमा के पास लगातार पाकिस्तानी ड्रोन दिखाई दे रहे हैं। कूटनीतिक व सामरिक स्तर पर पाकिस्तान के हर कदम को चीन का समर्थन है। वह बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव, नेपाल आदि सभी पड़ोसी देशों में अपना दखल स्थापित कर चुका है। ऐसे में भारत के लिए अपने बैकयार्ड में ही चुनौती बढ़ती हुई है। एक तरफ अमेरिका है, जिसने साफ कर दिया है कि उसके बैकयार्ड में यानी कैरेबियाई देशों या लैटिन अमेरिका के देशों में वह चीन और रूस का दखल नहीं बढ़ने देगा और सबको अपने हिसाब से चलाएगा। वही भारत अपने पड़ोस के छोटे से छोटे देश को भी अपने साथ नहीं रख पा रहा है। डरा नहीं पा रहा है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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