अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत आए तो चार दिन की यात्रा में कोलकाता, आगरा और जयपुर घूमते रहे। आखिरी दिन वे क्वाड सम्मेलन में शामिल हुए। यह विदेश मंत्रियों का सम्मेलन था लेकिन एक घंटे से थोड़े ज्यादा समय में ही समाप्त हो गया। विदेश मंत्रियों की बैठक में क्वाड की लीडरशिप समिट का समय तय होने वाला था लेकिन नहीं हुआ। यह भी तय होता है कि अगली बार क्वाड की अध्यक्षता या मेजबानी कौन करेगा उसकी भी घोषणा नहीं हुई। हालांकि यह तय है कि अगली बार अध्यक्षता ऑस्ट्रेलिया को जाएगी। ऑस्ट्रेलिया के विदेश पेनी वोंग विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में शामिल हुए। लेकिन भारत के बारे में सोचिए कि बिना लीडरशिप समिट के ही भारत से अध्यक्षता ऑस्ट्रेलिया को चली जाएगी।
ऐसा लग रहा है कि भारत में क्वाड की लीडरशिप का सम्मेलन नहीं होने वाला है। मार्को रुबियो ने जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का न्योता दिया उससे नहीं लग रहा है कि निकट भविष्य में राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा होने वाली है। इसी से लग रहा है कि लीडरशिप समिट भारत में नहीं होगी। सोचें, भारत 2024 में लीडरशिप समिट की मेजबानी करने वाला था। लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने गृह राज्य में सम्मेलन करने की इच्छा जताई तो मेजबानी अमेरिका के पास चली गई। इसके बाद 2025 में ट्रंप ने क्वाड को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और इसके नेताओं का सम्मेलन नहीं हुआ। विदेश मंत्रियों का सम्मेलन जरूर हुआ लेकिन नेताओं का नहीं हुआ। इस साल यानी 2026 में भी ऐसा होता नहीं दिख रहा है। इसके बाद अगले साल मेजबानी ऑस्ट्रेलिया को चली जाएगी।
दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने क्वाड को लेकर जैसा रवैया दिखाया है उससे भी जाहिर है कि इसका महत्व उनकी नजर में समाप्त है या बहुत कम रह गया है। राष्ट्रपति ट्रंप की पहल पर ही क्वाड का गठन हुआ था, जिसका मकसद चीन की विस्तारवादी नीतियों पर नियंत्रण रखना और खुले समुद्र की वैश्विक नीति को लागू रखना था। दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते दखल और उसे मिलिट्राइज करने के चीन के प्रयासों ने दुनिया को चिंतित किया। तभी अमेरिका ने हिंद प्रशांत के तीन देशों, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया को साथ लेकर क्वाड का गठन कराया। लेकिन अब खुद अमेरिका ने इस पर ध्यान देना बंद कर दिया है।
ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप चीन के प्रति अपनी नीति बदल रहे हैं। कुछ समय पहले तक वे चीन को प्रतिद्वंद्वी ताकत के तौर पर देख रहे थे और उसे संतुलित रखने के लिए हिंद प्रशांत में नए गठजोड़ बना रहे थे। लेकिन अब ऐसा लग रही है कि ट्रंप ने चीन की सुपरपावर वाली हैसियत स्वीकार कर ली है। उसके साथ सहअस्तित्व की कूटनीति कर रहे हैं। ट्रंप अपने को वेस्टर्न हेमिस्फियर में समेट रहे हैं और वहां वर्चस्व और मजबूत कर रहे हैं। ट्रंप की हालिया चीन यात्रा में भी यही दिखा है। ऊपर से उन्होंने क्यूबा का समुद्री रास्ता बंद करके और ईरान ने होर्मुज की खाड़ी बंद करके चीन को रास्ता दिखा दिया है कि कैसे समुद्री बाधा खड़ी करके वह ताइवान का गला घोंट सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप की इस कूटनीति से भी लगता है कि उनके लिए अब क्वाड का कोई मतलब नहीं रह गया है।
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