देश के नागरिकों के असली सरोकार अलग हैं और उनकी राजनीतिक चिंताएं या प्राथमिकताएं अलग हैं। यह पिछले 12 साल की राजनीतिक उपलब्धि है। पहले लोगों के जीवन की समस्या का रिफ्लेक्शन उनकी चुनावी प्राथमिकता में दिखता था। लोग सरकार से नाराज होते थे तो सरकार बदल देते थे। विपक्षी पार्टियों की रैलियों में नारा लगता था कि ‘जो सरकार महंगाई न रोके वो सरकार निकम्मी है’ और ‘जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है’। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह से बदल गई है। विपक्ष नारे तो लगा रहा है और लोग समझ भी रहे हैं कि सरकार महंगाई नहीं रोक पा रही है, सरकार रोजगार नहीं दे रही है, सरकार गरीबी कम नहीं कर पा रही है, सरकार दाखिला व रोजगार वाली परीक्षाएं ठीक से नहीं करा पा रही है फिर भी ऐसी सरकार बदल देनी है यह बात नहीं दिख रही है।
क्यों? यह दो भारत की तरह का मामला नहीं है, बल्कि एक ही भारत के दो चरित्र हैं। एक ही व्यक्ति के दो चरित्र हैं। एक चरित्र तो वह है, जिसमे वह अपने और अपने परिवार के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी बातों की चिंता करता है। इसमें उसकी सबसे बड़ी चिंता है कि नौकरी नहीं मिल रही है। आर्थिक संकट है। महंगाई बढ़ रही है और दिन प्रतिदिन हालात खराब होते जा रहे हैं। उसका दूसरा चरित्र यह मजबूरी जाहिर करना है कि क्या करें, कोई रास्ता भी तो नहीं है। यह बड़ी कमाल की बात है कि हर मुश्किल के लिए पहले की सरकारों को जिम्मेदार ठहराया जाता है या फिर यह मजबूरी जाहिर की जाती है कि क्या करें अगर इस सरकार को हटाएं तो किसको चुन दें? ऐसा कहने वाले या तो बहुत शातिर हैं या इतने भोले हैं कि उन्होंने सरकार की ओर से व्य़वस्थित तरीके से चलाए गए इस कैम्पेन को स्वीकार कर लिया है कि विपक्ष बहुत निकम्मा है और इसलिए जो लोग अभी सरकार चला रहे हैं, वे जैसा चला रहे हैं वैसा ही चलने दिया जाए।
ऐसा भारत में पहले नहीं होता था और न दुनिया में किसी दूसरे देश में ऐसा होता है। यह कहीं नहीं होता है कि वास्तविकता के ऊपर झूठ का नैरेटिव इतना हावी हो जाए कि लोग अपनी वास्तविक समस्याओं को भूल कर नैरेटिव के आधार पर राजनीतिक विचार बनाएं और चुनाव में मतदान करें। नैरेटिव क्या है कि हिंदू राष्ट्र बन रहा है, नैरेटिव क्या है कि हिंदुत्व की भावना मजबूत हो रही है, नैरेटिव यह भी है कि मुसलमानों को ठीक किया जा रहा है, यह भी नैरेटिव है कि कांग्रेस या दूसरी पार्टियां आ जाएंगी तो हिंदुओं का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा यानी सिर्फ भाजपा ही हिंदुओं को बचा सकती है। इस किस्म के राजनीतिक नैरेटिव की वजह से देश के लोग अपनी वास्तविक समस्याओं को भूल कर वोट देते हैं।
सो आम आदमी का वास्तविक सरोकार जो है वह उसकी राजनीतिक प्राथमिकता से अलग है। वास्तविक सरोकार बेरोजगारी, गरीबी, पलायन, अशिक्षा, खराब परीक्षा व्यवस्था, बेकार स्वास्थ्य सुविधा, कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार आदि की है। वह कहता भी है कि इससे परेशानी हो रही है। इसके लिए वह सरकार को गालियां भी देता है। भाजपा के सांसदों, विधायकों की शिकायत भी करता है। मंत्रियों पर भी सवाल उठाता है। वह शिकायत करते हुए मतदान केंद्र तक जाता है लेकिन वहां जाकर अपनी शिकायतों को दरकिनार कर देता है और भाजपा को वोट करता है। हिंदुओं के इस चरित्र को भाजपा नेतृत्व समझ गया हैं। तभी उन्होंने अपना नैरेटिव इस स्तर पर स्थापित कर दिया है कि उनको कुछ भी करने की जरुरत नहीं है। लोग खुद ही उस नैरेटिव के जाल में फंसे हैं और अपनी वास्तविक समस्य़ाएं छोड़ कर सरकार की ओर से प्रचारित किए गए मुद्दों पर वोट करते हैं।


