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सुरक्षा का असली मुद्दा बनाम पाकिस्तान

भारत में हर चीज कैसे असली और नकली में विभाजित है या असली और नैरेटिव वाले भारत में विभाजित है, इसकी एक मिसाल सुरक्षा चिंता और पाकिस्तान को लेकर बनाया गया नैरेटिव है। जो सुरक्षा के जानकार हैं वे मानते है कि पाकिस्तान एक ही तरह से भारत के लिए खतरा है कि वह छद्म युद्ध छेड़े रहता है। वह आतंकवाद को बढ़ावा देता है और अपने कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से में आतंकवादी शिविर बना रखे हैं। इसके अलावा वह कभी भी भारत की सीमा सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा नहीं है।

भारत की सीमा सुरक्षा के लिए असली खतरा चीन है। वह लगातार भारत की जमीन कब्जा कर रहा है। लेकिन भारत की सरकार सारा गुस्सा पाकिस्तान पर निकालती है क्योंकि मुस्लिम विरोध से वोट पकते हैं।

मतलब चीन ‘सलामी स्लाइसिंग’ यानी छोटी छोटी परतों में काट कर भारत की जमीन कब्जा कर रहा है। भारत का आर्थिक तौर पर आश्रित बना रहा है। हिमालय के पूर्वी हिस्से में वह एक एक करके अपने सैनिक पोस्ट बढ़ा रहा है। वह सीमा पर सैन्य गांव बसा रहा है। वह सीमा के किनारे सड़कें बना रहा है। वह भारत की जमीन कब्जा कर रहा है और भारत के हिस्से वाली जमीन के गांवों, कस्बों, नदियों, पहाड़ों के नाम बदल रहा है। लेकिन उसे कभी भी चेतावनी नहीं दी जाती है। उसे कभी लाल आंख नहीं दिखाई जाती है। भारत की सरकार का सारा गुस्सा पाकिस्तान के लिए रिजर्व है। देश की जनता भी यही मानती है। सोचें, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में, उसके हकीकत में भी भारतके दो व्यवहार हैं तो बाकी मामलों में क्या कहा जा सकता है? एक भारत है, जो चीन से असुरक्षित है, सीमा से लेकर अर्थव्यवस्था तक चीन के कारण असुरक्षित है तो दूसरा भारत है, जो पाकिस्तान को सबक सीखा देने के भ्रम में जी रहा है और चीन की तरफ से आंखें मूंदे हुए है!

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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