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भारत अधबीच का मात्र यूजर

दुनिया की दो छोरों की चिंता के बीच में भारत है। भारत में एआई का अपना कोई मॉड्य़ूल नहीं है लेकिन चैटजीपीटी से लेकर जेमिनी और ग्रोक से लेकर परप्लेक्सिटी तक के सबसे ज्यादा यूजर भारत में हैं। वे इनका किया इस्तेमाल कर रहे हैं वह हैरान करने वाला है। जो भी व्यक्ति कंप्यूटर, स्मार्ट फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है वह छोटी छोटी बातों के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहा है। कविता, कहानी लिखने से लेकर न्यायपालिका की ड्राफ्टिंग का काम और राजनीतिक नारे लिखने से लेकर मीम्स बनाने और विरोधियो को अपमानित करने के लिए कंटेंट तैयार करने में इसका जम कर इस्तेमाल हो रहा है। लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं है कि उनके एक सवाल का जवाब देने के लिए या उनके एक टास्क को पूरा करने के लिए चैटजीपीटी या किसी अन्य आर्टिफिशियल जेनेरेटिव इंटेलिजेंस यानी एजीआई के ऊपर कितना पानी खर्च होता है।

भारत में कंप्यूटर और सूचना क्रांति के समय भी ऐसा ही हुआ। असल में भारत में लोगों को कोई भी नई बात या नई चीज बहुत आकर्षित करती है। जैसे जब कंप्यूटर का जमाना आया था तब चारों तरफ कंप्यूटर की बात होती थी। किसी का कोई भी बिजनेस हो, भले उसमें कंप्यूटर का कोई लेना देना नहीं हो लेकिन वह ग्राहक लुभाने के लिए बोर्ड पर लिखता था कि कंप्यूटराइज्ड काम होता है। जिसने दुकान के बाहर कंप्यूटराइज्ड का बोर्ड लगा दिया उसकी दुकान चल पड़ती थी। सरकार भी लोगों को ऐसे ही मूर्ख बनाती थी। चारों तरफ कंप्यूटर ट्रेनिंग देने का काम होता था।

जैसे आज प्रधानमंत्री ऐलान कर रहे हैं कि एक करोड़ युवाओं को एआई में ट्रेनिंग दिलाएंगे वैसे ही उस समय के प्रधानमंत्री ऐलान करते थे कि एक करोड़ युवाओं को कंप्यूटर की ट्रेनिंग दिलाएंगे। सबको पता है कि उस समय कंप्यूटर की ट्रेनिंग करने वाले युवाओं ने क्या किया! बहरहाल, जब मोबाइल का जमाना आया तो चारों तरफ मोबाइल रिपेयरिंग और सिम बेचने की दुकानें खुलीं। इसके बाद सोशल मीडिया में रील बनाने का करोबार चला।

अब हर जगह एआई सुनने को मिल रहा है। हर दुकानदार बोर्ड लगाए बैठा है कि यहां एआई से काम होता है। जिस काम में एआई का कोई मतलब नहीं है वहां भी ऐसा दावा किया जा रहा है। नेताओं के भाषण में हर दूसरी लाइन में एआई सुनने को मिल रहा है। लेकिन जैसे कंप्यूटर, मोबाइल या सोशल मीडिया से भारत में गुणात्मक रूप से कोई बदलाव नहीं आया वैसे ही एआई से भी कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होने वाला है। इससे थोड़े से लोगों को कारोबार मिल जाएगा और थोड़े से होशियार लोगों का काम आसान हो जाएगा। बाकी तो सब जैसे चल रहा है वैसे ही चलता रहेगा।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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