पहले दो तथ्यों को समझें। पहला, कांग्रेस पार्टी 12 साल से विपक्ष में है और दूसरा, सोनिया गांधी कभी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री नहीं रही हैं। इसके बावजूद कांग्रेस और सोनिया गांधी को भारत की विदेश नीति और उसकी बारीकियों की जानकारी है। उनको अपने दोस्त देशों की पहचान भी है और वे असल में तटस्थता की विदेश नीति को समझती हैं। तभी सोनिया गांधी ने ईरान पर इजराइल और अमेरिका के हमले के तुरंत बाद अंग्रेजी के अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लेख लिखा। उन्होंने ईरान पर हमले को अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन बताया। और साथ ही ईरान के साथ भारत के पुराने संबंधों की याद दिलाई। सोनिया ने पिछले साल जून में ईरान पर हुए हमले के बाद भी एक लेख लिख कर उसकी आलोचना की थी।
ताजा हमले के बाद सोनिया गांधी ने तीन मार्च को छपे अपने लेख में बहुत साफ शब्दों में कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर भारत का चुप रहना तटस्थता की नीति नहीं है, बल्कि अपनी जिम्मेदारी का परित्याग करना है। उन्होंने लिखा कि भारत की चुप्पी से साफ दिख रहा है कि भारत की विदेश नीति दिशाहीन हो गई है। सोनिया गांधी ने अयातुल्ला खामेनेई को राष्ट्र प्रमुख बताते हुए उनकी हत्या पर भारत जैसे बड़े देश के चुप रहने को खराब विदेश नीति बताया। सोनिया गांधी ने अपने लेख में याद दिलाया कि ईरान ने 1994 में नरसिंहराव के समय जम्मू कश्मीर के मसले पर संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की मदद की थी। गौरतलब है कि दुनिया भर के मुस्लिम देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में जम्मू कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश किया था। इसमें मानवाधिकार उल्लंघन के नाम पर भारत की निंदा करने और कुछ प्रतिबंध लगाने की अपील की थी। ईरान ने उस समय भारत का साथ दिया था और इस प्रस्ताव का विरोध करके इसे पारित होने से रोका था। अगर यह प्रस्ताव पास होता तो भारत के लिए शर्मिंदगी तो होती ही साथ ही पाबंदियों का रास्ता भी खुलता।
बहरहाल, सोनिया गांधी ने अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत को लेकर इजराइल और अमेरिका की आलोचना की तो उसके दो दिन बाद भारत सरकार की नींद खुली और उसने खामेनेई को श्रद्धांजलि दी। हालांकि तब भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री ने इस पर कुछ नहीं कहा। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने ईरान के दूतावास में जाकर खामेनेई को श्रद्धांजलि दी। गौरतलब है कि 28 फरवरी के पहले दिन के हमले में ही खामेनेई की मौत हो गई थी। एक मार्च को इसकी खबर आ गई थी लेकिन भारत को श्रद्धांजलि देने की तब सूझी जब सोनिया गांधी ने लेख लिखा। इस समय पूरी विश्व बिरादरी ईरान पर हमले को गैरजरूरी मान रही है और इसका विरोध कर रही है। ऐसे में भारत जैसे बड़े देश की ओर से किसकी प्रतिक्रिया को विश्व बिरादरी कूटनीतिक रूप से सही और बेहतर मानेगी?
कूटनीति को छोड़ दें या यह मान लें कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की कूटनीति है। तब भी ईरानी जहाज पर अमेरिका के हमले को क्या कहेंगे? असल में भारत में दुनिया भर की नौसेना का सुरक्षा अभ्यास हुआ था। ‘मिलन’ नाम से हुए इस सुरक्षा अभ्यास में भाग लेने के लिए ईरान का युद्धपोत आईआरआईएस डेना भारत आया था। अभ्यास के बाद यानी शांति मिशन से लौट रहे इस जहाज पर अमेरिका ने पनडुब्बी से हमला कर दिया और जहाज को डुबा दिया। इसमें ईरान की नौसेना के 87 जवान मारे गए। यह भारत के बैकयार्ड में हमला था। हिंद महासागर में फर्स्ट रिस्पॉन्डेंट या हिंद महासागार का गार्जियन भारत है। लेकिन भारत की हिम्मत नहीं हुई कि वह अमेरिका के इस हमले की आलोचना करे। आलोचना छोड़ दें भारत ने अमेरिकी हमले में मारे गए 87 जवानों को श्रद्धांजलि तक नहीं दी, उनकी मौत पर शोक संदेश तक जारी नहीं हुआ।
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