nayaindia Lok Sabha election उद्धव और शरद के इलाके में सुधरा मतदान
गपशप

उद्धव और शरद के इलाके में सुधरा मतदान

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हालांकि महाराष्ट्र में तीसरे चरण के मतदान में भी पिछली बार के मतदान की बराबरी नहीं हुई लेकिन इतना जरूर हुआ कि मतदान का प्रतिशत 61 से ऊपर चला गया। पहले दो चरण में मतदान इससे कम रहा था। लेकिन तीसरे चरण में जब शरद पवार और उद्धव ठाकरे के गढ़ में मतदान हुआ तो मतदान प्रतिशत 61.4 फीसदी हो गया। इसमें थोड़ी और बढ़ोतरी हो सकती है। यह अंतरिम आंकड़ा है। पिछली बार इन 11 सीटों में 61.7 फीसदी मतदान हुआ था। तीसरे चरण में कोल्हापुर में 70 फीसदी से ऊपर मतदान हुआ। सांगली में 61 फीसदी तो सातारा में 63 फीसदी वोट पड़े। माढा में 62 फीसदी और हटकणंगले में 68 फीसदी मतदान हुआ। 60 फीसदी से कम मतदान तीन जगह रिकॉर्ड हुआ, जिसमें एक बारामती भी है। नारायण राणे की रत्नागिरी सिंधुदुर्ग सीट पर भी 60 फीसदी से कम वोट पड़ा। ऐसी तीसरी सीट रायगढ़ की है।

इस बार महाराष्ट्र में जिन 11 सीटों पर मतदान हुआ उसमें सबकी दिलचस्पी बारामती सीट पर थी, जहां शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले चुनाव लड़ी हैं। उनका मुकाबला अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार से हुआ है। इस सीट पर सिर्फ 56 फीसदी वोट पड़े। जिन 11 सीटों पर सात मई को मतदान हुआ उनमें सबसे कम वोट इसी सीट पर पड़े। इसका बहुत दिलचस्प कारण है, जो सिर्फ किसी ऐसी ही सीट पर देखने को मिल सकता है। बताया जा रहा है कि मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग चुनाव से इसलिए दूर रहा क्योंकि वह साहेब यानी शरद पवार और दादा यानी अजित पवार में से किसी एक का पक्ष नहीं चुनना चाहता था। मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग, जो पवार परिवार के साथ जुड़ा रहा है और उसे अपना परिवार मानता है वह मतदान से गैरहाजिर रहा। सोचें, कोई देख नहीं रहा था कि कौन किसको वोट दे रहा है लेकिन अपनी प्रतिबद्धता के कारण लोग वोट डालने नहीं गए कि जाएंगे तो किसे वोट देंगे।

बहरहाल, 56 फीसदी जो वोट पड़े हैं वह शरद और अजित पवार के प्रतिबद्ध समर्थकों के हैं। दोनों नेता अपनी ताकत और कमजोरी को जानते हैं और मतदान के आधार पर अपना हिसाब लगा रहे होंगे। अजित पवार के बेटे पार्थ का कहना है कि तीन विधानसभा क्षेत्रों- इंदापुर, पुरंदर और खड़कवासला में उनकी मां यानी सुनेत्रा पवार को बढ़त है। दूसरी ओर शरद पवार के दूसरे पोते रोहित पवार का कहना है कि सुप्रिया सुले दो विधानसभा क्षेत्रों भोर और दौंड में बड़े अंतर से आगे हैं।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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