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जंग का असर साफ दिख रहा है

ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल की जंग थम गई है और भारत में दो तरह के नैरेटिव बनाए जा रहे हें। पहला, कि भारत कोई पाकिस्तान नहीं है और पाकिस्तान तो दलाली कर रहा है। हर प्लेटफॉर्म पर यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि पाकिस्तान जो कर रहा है वह मध्यस्थता नहीं है, बल्कि वह तो बिचौलिए वाला काम कर रहा है। हालांकि वह जो भी काम कर रहा है उससे उसकी हैसियत दुनिया में बढ़ रही है। कम से कम मुस्लिम देशों में तो वह सिरमौर बन ही रहा है। दूसरा नैरेटिव यह है कि भारत में जंग का असर नहीं पड़ने दिया गया। हर जगह इस बात को प्रचारित किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति और ऊर्जा सुरक्षा की नीति से भारत पर कोई असर नहीं हुआ। कूटनीति की कामयाबी इसमें बताई जा रही है कि भारत के आठ या नौ जहाज जंग के दौरान होर्मुज की खाड़ी से निकले।

हकीकत इससे उलट है। भारत पर जंग का बड़ा असर हुआ है। वह असर दिख भी रहा है। अगर असर नहीं हो रहा होता तो जंग रूकने की घोषणा के साथ ही पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी कतर के दौरे पर नहीं चले जाते। विदेश मंत्री का संयुक्त अरब अमीरात का दौरा नहीं होता। जाहिर है कि भारत में तेल और गैस का संकट गहरा है और जंग थमने के बाद भी काफी समय तक जारी रहने की आशंका है। पश्चिम एशिया की जंग का असर भारत के हर सेक्टर पर हुआ है। अलग अलग सेक्टर पर हुए असर की अनेक कहानियां मीडिया में आ रही हैं, लेकिन सबसे बड़ा सबूत यह है कि हर एजेंसी एक एक करके भारत के आर्थिक विकास का अनुमान घटाती जा रही है।

ताजा आंकड़ा विश्व बैंक का आया है, जिसने भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की विकास दर का अनुमान 7.2 से घटा कर 6.6 फीसदी कर दिया है। सबसे पहले गोल्डमैन सॉक्स ने विकास दर का अनुमान सात से घटा कर 5.9 फीसदी किया था। उसके बाद अर्नस्ट एंड यंग ने भी भारत के अनुमानित विकास दर में एक फीसदी की कमी करके इसे छह फीसदी पर रखा। खुद भारतीय रिजर्व बैंक ने विकास दर का अनुमान 7.2 से घटा कर 6.9 फीसदी कर दिया है। सोचें, विकास दर में रिजर्व बैंक ने 0.3 फीसदी, विश्व बैंक ने 0.6 फीसदी, ईएंडवाई ने एक फीसदी और गोल्डमैन सॉक्स ने 1.1 फीसदी की कमी की है। फिर भी भारत में कहा जा रहा है कि पश्चिम एशिया की जंग का असर नहीं होगा!

भारत का सकल घरेलू उत्पाद चार ट्रिलियन यानी चार सौ लाख करोड़ रुपए के करीब है। इसमें एक फीसदी की कमी का मतलब है चार लाख करोड़ की कमी आना। इसके बावजूद कोई सरकार कहे और यह नैरेटिव बनवाए कि युद्ध का कोई असर नहीं हुआ है तो क्या कहा जा सकता है! ये आंकड़े आधिकारिक हैं और जंग के दौरान देश भर से जैसी खबरें आई हैं उनको देखें तो पता चलता है कि कितना बड़ा असर हुआ है।

सरकार ने कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में एक मार्च को 115 रुपए और एक अप्रैल को 228 रुपए तक की बढ़ोतरी की। क्या 19 किलो के सिलेंडर की कीमत में 40 दिन के अंदर 343 रुपए की बढ़ोतरी को सामान्य माना जाएगा? ऊपर से अब भी कॉमर्शियल गैस की सप्लाई 28 फरवरी से पहले के मुकाबले 70 फीसदी ही हो रही है। यानी उपलब्धता कम है और कीमत ज्यादा हो गई। इससे देश के सभी शहरों में होटल, ढाबे, रेस्तरां आदि बंद हुए या उन्होंने अपना काम न्यूनतम कम कर दिया। गैस की महंगाई से अस्थायी तौर पर ही सही लाखों लोगों की नौकरी गई और खाना बनाना महंगा हुआ तो लोगों का पलायन शुरू हुआ। देश के हर शहर में रसोई गैस की कालाबाजारी की खबरें है। अलग अलग राज्य सरकारों की ओर से जारी आंकड़ों के आधार पर एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कालाबाजारी रोकने के लिए एक लाख से ज्यादा छापे मारे गए। उधर विमान का ईंधन यानी जेट फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, जिससे हवाई यात्रा महंगी हुई।

एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 50 हजार से ज्यादा छोटी विनिर्माण इकाइय़ों के कामकाज पर असर हुआ और 20 हजार के करीब फैक्टरियां बंद हो गईं। गुजरात से लेकर राजस्थान और उत्तर प्रदेश से लेकर आंध्र प्रदेश तक कपड़े की फैक्टरियों में काम ठप हुआ तो केमिकल फैक्टरियां बंद हुईं, प्लास्टिक के सामान, खिलौने आदि बनाने वाली फैक्टरियों पर सबसे ज्यादा असर हुआ। चमड़े के उत्पाद बनाने वाली फैक्टरियों पर बड़ा असर हुआ। जिन फैक्टरियों से निर्यात होता था वहां काम पूरी तरह से ठप्प हुआ क्योंकि एक तरफ कच्चे माल की आपूर्ति कम हुई थी और दूसरी ओर शिपिंग काफी महंगी हो गई थी।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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