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और विदेश में सैर-सपाटा!

कहते हैं जनवरी से भारतीय हवाईअड्डों में भारतीयों के विदेश घूमने जाने का रिकॉर्ड है! दुबई, खाड़ी के देशों के रास्ते बंद हैं तो भीड़ दक्षिण-पूर्व एशिया यानी वियतनाम, श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया, मालदीव जैसे देशों में उमड़ पड़ रही है! वियतनाम के एयरपोर्ट पर भारतीयों की भीड़ के नजारे सिर चकरा देने वाले हैं! पूरा एयरपोर्ट ही मानों भारतीयों से भरा! सोच सकते हैं, भारतीयों से वियतनाम कितने डॉलर कमा रहा है। ऐसे ही जनवरी में 52 हजार भारतीयों का श्रीलंका जाना मामूली बात नहीं है। तय मानिए, इन गर्मियों में भारत की भीड़ के घूमने का ठिकाना या तो वियतनाम और आसियान देश होंगे या मध्य एशिया के छोटे देश!

और भारत की भीड़ क्या मैसेज बना रही है? बहुत खराब। हाल में एक वीडियो वायरल हुआ। लोग यह कहते दिखे कि वियतनामी रेस्टोरेंट ने भारतीय होने के कारण महिलाओं को भी प्रवेश नहीं दिया। कई जगहों के बाहर “Indians are not allowed” जैसे बोर्ड लगे थे। एक साइनबोर्ड पर “No smoking, No Indian” लिखा दिखा! पर्यटन उद्योग से जुड़े व्यक्ति का कहना था कि वियतनाम में भारतीयों को कहीं-कहीं अनौपचारिक रूप से “ब्लैकलिस्ट” जैसा माना जाता है। यह दुखद है। एक भारतीय से यदि अच्छी छाप बनती है तो पांच इमेज बिगाड़ने वाले होते हैं। ये स्थानीय परंपराओं और नियमों का सम्मान किए बिना अविकसित देश मान मनमानी पर आमादा होते हैं। इससे सभी भारतीयों को स्थानीय लोग एक ही नजर से देखने लगते हैं।

भारतीय पर्यटकों को लेकर ऐसी धारणा नई नहीं है। सवाल है कि दुबई, वियतनाम, श्रीलंका आदि देशों में ऐसा क्या है जो भारत में नहीं है? भारत में हिमालय, समुद्री तट, जंगल से लेकर मंदिर, कंक्रीट की बिल्डिंगों के महानगर आदि सब हैं। हर रेंज के होटल हैं। पर फिर विदेश घूमने का शगल क्यों? दरअसल पिछले बीस सालों में भारत के नौकरशाहों, ठेकेदारों, बिल्डरों, व्यापारियों, उद्यमियों, नेताओं, आईटी-प्रबंधन के बीस लाख या उससे ज्यादा के सालाना पैकेज या कमाई और भ्रष्टाचार के बोनस वाले दस-बारह करोड़ लोगों के परिवारों में पैसा दिखलाने का नशा बढ़ा है। और ये नए अमीर मिजाज में कैसे हैं? वैसे ही जैसे अधजल गगरी छलकत जाए। पैसा है, मगर प्रवृत्तियों, अभिरुचियों में सौ टका भदेस। स्वाद, शराब, भोग का वह भोंडापन जो दुनिया की निगाहों में शर्मनाक।

सचमुच भारत के दस-बारह करोड़ लोगों (अर्थात दो ब्रिटेन से भी ज्यादा संख्या वाली आबादी) के सफेद-काले धन की अमीरी-नकदी ने देश में नकली विकास (ऑटो खरीद, प्रॉपर्टी, शराब खपत, विदेश घूमने) के चस्के पैदा किए हैं। विकसित-सभ्य देशों में नागरिकों की छुट्टी और घूमने के पीछे एक विशेष दृष्टि होती है। जबकि भारत में घूमना विदेश जाने का मात्र शगल है। वहां विकास की भव्यता, अच्छी व्यवस्था से सुकून पाते हैं। मतलब, देखा कैसा दुबई और सिंगापुर चमचमाता हुआ है! ऐसे ही बैंकॉक, एम्स्टर्डम, वियतनाम के मसाज सेंटर या नाइट क्लब या तुर्की की भीड़ के बीच वहां गुब्बारों में उड़ पर्यटन करना। सो, पर्यटन की मार्केटिंग और घूमने के शगल में बस वह एक भेड़चाल है, जिसमें सस्ते टिकट, सस्ते पैकेज से अलग एयरपोर्ट पर रैला बनता है। और सोचिए, जो वियतनाम भारत से बहुत पीछे था, वह यह फील कर रहा है, ओह, भारतीय पर्यटक असहनीय! परिणामतः “No smoking, No Indian”

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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