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नक्सल-मुक्त होने का मियांमिट्ठुई उत्सव

दूसरों के किए का श्रेय भी जबरन ख़ुद के बीजक में लिख कर, नाच-गा कर, उस का बिगुल बजा-बजा कर, ही तो भाजपा ने यह सियासी मुक़ाम हासिल किया है। सो, भाजपा के लिए जरूरी है कि वह कांग्रेस को नक्सलवाद का जन्मदाता बताए, कांग्रेस को उस का पालनहार बताए, कांग्रेस और नक्सलियों के बीच सांठगांठ के इल्ज़ाम लगाए और कहे कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी शुरू से वाम-षक्तियों के इशारे पर काम कर रहे हैं। राहुल को देशद्रोही करार दिए बिना नरेंद्र भाई की देशभक्ति का परचम भला कैसे लहराएगा? मेरे जैसे बहुत-से लोग चूंकि यथार्थदर्शी हैं, सो, अमित भाई के सुर-में-सुर मिला कर बेसुरे बनने को तैयार नहीं हैं। बाक़ी का बाक़ी जानें!

इस सप्ताह की शुरुआत के पहले दिन सूरज डूबने के थोड़ी देर बाद हमारे गृह मंत्री अमित भाई शाह ने लोकसभा में ख़ुद की पीठ ज़ोर-ज़ोर से ख़ुद ही थपथपा कर हमें बताया कि देश अब पूरी तरह नक्सल-मुक्त हो गया है। उन्होंने तफ़सील से बताया कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद से यशस्वी और पराक्रमी प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के मार्गदर्शन में कैसे यह काम हुआ, कितने नक्सलियों को इन बारह बरस में ‘ढेर कर दिया गया’, कितनों को पकड़ा गया और कितनों ने आत्मसमर्पण कर दिया। उन्होंने यह मिथ्या-विमर्श भी पूरे ज़ोरशोर से गढ़ने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी कि देश में नक्सलवाद कांग्रेस की वज़ह से जन्मा, कांग्रेस की वज़ह से पनपा और कांग्रेस ने बजाय नक्सलवाद का ख़ात्मा करने के नक्सलवादियों से मिलीभगत बनाए रखने का काम किया।

अमित भाई के 83 मिनट लंबे दोषारोपण-उवाच और मियांमिट्ठुई-डींगें ख़त्म होने के ठीक 83 मिनट बाद नरेंद्र भाई ने ट्वीट कर देश को बताया कि गृह मंत्री का आज का भाषण संसदीय इतिहास के सब से असाधारण भाषणों में दर्ज़ हो गया है। इस पोस्ट में प्रधानमंत्री ने अपने गृह मंत्री के भाषण में मौजूद ‘महत्वपूर्ण तथ्यों, इतिहास के संदर्भों और एक दशक में सरकार की तरफ़ से हुई अनथक कोशिशों‘ के ज़िक्र की दरियादिली से वाहवाही की। ज़ाहिर है कि नरेंद्र भाई की इस ‘आफ़रीन-आफ़रीन’ ने अमित भाई के बदन में दौड़ रहे साढ़े पांच लीटर रक्त को बढ़ा कर ग्यारह लीटर कर दिया होगा।

मगर मैं अमित भाई से कुछ बातों का जवाब चाहता हूं। 1967 के मई महीने में जब पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग ज़िले के नक्सलबाड़ी में किसान विद्रोह हुआ तो वहां किस की सरकार थी? उस साल की 25 मई को किसानों पर चली जिन पुलिस-गोलियों ने नक्सलवाद को जन्म दिया, वे किस ने चलवाई थीं? तब वहां कांग्रेस की सरकार तो थी नहीं। तो फिर कांग्रेस नक्सलवाद को जन्म देने की ज़िम्मेदार कैसे हो गई? पश्चिम बंगाल में नक्सलवादियों के ख़िलाफ़ सब से तगड़ी मुहीम तो 1972 से 1977 के बीच तब चली, जब कांग्रेस के सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री थे। इंदिरा गांधी तब प्रधानमंत्री थीं। पिछले 49 साल से तो पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की सरकार ही नहीं है।

अमित भाई ने संसद को बताया कि नक्सलवाद प्रभावित लाल-गलियारे में 12 राज्य थे, देश का 17 प्रतिशत भूभाग था और 20 करोड़ की आबादी उस की ज़द में थी। इन 12 प्रदेशों की सियासी हक़ीकत क्या रही है? छत्तीसगढ़ सन् 2000 में बना। इन 26 वर्षों में से कांग्रेस की सरकार वहां सिर्फ़ 8 साल रही है और 18 साल भाजपा ने हुकूमत की है। आज भी वहां भाजपा की ही सरकार है। नक्सल-प्रभावित तेलंगाना 2014 में बना। वहां अभी सवा दो साल से कांग्रेस की सरकार है और उस के पहले सवा नौ साल के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में भारत राष्ट्र समिति की सरकार थी।

लाल-गलियारे का प्रमुख हिस्सा रहे ओडिशा में 1967 से 1971 तक स्वतंत्र पार्टी की सरकार थी। फिर ‘77 से ‘80 तक जनता पार्टी की सरकार रही। ‘90 से ‘95 तक जनता दल के बीजू पटनायक की सरकार थी। 2004 से 24 साल तक नवीन पटनायक लगातार मुख्यमंत्री रहे। वे भाजपा के साथ थे और अब करीब दो साल से वहां भाजपा की खुद की सरकार है। महज़ 9 महीने के लिए कांग्रेस का अंतिम मुख्यमंत्री ओडिशा में 27 साल पहले बना था। महाराश्ट्र भी नक्सल-प्रभावित 12 राज्यों में रहा है। 2014 के बाद वहां सिर्फ़ 2 साल के लिए उद्धव ठाकरे की सरकार रही। बाकी दस साल तो भाजपा और उस के सहयोगी दल ही हुकूमत में रहे।

मध्यप्रदेश में भी 2004 से अब तक, महज़ एक साल के लिए, कांग्रेस के कमल नाथ की सरकार रही। बाकी के 21 साल तो भाजपा रही और आज भी है। नक्सलियों के लिए बदनाम झारखंड 2000 में बना था। इन 26 वर्षों में, अभी के 5-6 साल से छोड़ दें तो, 20 साल तो भाजपा और उस के सहयोगी दल ने ही सरकारें चलाईं। 1967 में जब नक्सलवाद का जन्म हुआ तो क्या बिहार में कांग्रेस की सरकार थी? तब तो बिहार क्रांति दल और शोषित दल की सरकारें चल रही थीं। 1990 के बाद 36 साल से बिहार में भी कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहीं बना है। 20 साल तो वहां नरेंद्र भाई और अमित भाई के ‘प्राणों के समान प्रिय’ नीतीश कुमार का ही राज रहा।

केरल में 74 साल में से सिर्फ 21 साल कांग्रेस की सरकारें रही हैं। बाकी 53 साल कम्युनिस्टों की। यही स्थिति लाल-गलियारे के कर्नाटक की है। अगर कर्नाटक बनने के पहले के मैसूर को भी जोड़ लें तो 72 साल में से सिर्फ 32 साल वहां कांग्रेस की सरकारें रहीं। बाकी 40 साल भाजपा और दूसरों की। उत्तर प्रदेश के तीन नक्सल-प्रभावित ज़िलों की बात अमित भाई ने संसद में की। उत्तर प्रदेश में भी 1990 के बाद 36 साल से कांग्रेस दूर-दूर तक कहीं नहीं है। तो अमित भाई कृपया यह बताएं कि लाल-गलियारे के 12 में से 6 राज्यों में तो डबल-इंजन सरकारें चल रही हैं और कांग्रेस की हुकूमत तो फ़िलवक़्त इन में से सिर्फ़ दो में ही है और इन दो में भी वह दशकों तक हाशिए पर रही, तो फिर कांग्रेस ने कैसे नक्सलवाद को जन्म दे कर उसे इतना पनपा दिया कि एक वक़्त देश के 200 से ज़्यादा ज़िलों पर उस का घना साया छा गया?

एक बात और। 2014 में जब नरेंद्र भाई मोदी प्रधानमंत्री बने तो देश में 126 ज़िले नक्सल-प्रभावित थे। तो अगर कांग्रेस नक्सलवादियों से मिली हुई थी तो 2004 से 2014 तक उस के दस बरस के शासनकाल में 200 से ज़्यादा नक्सल-प्रभावित ज़िलो की संख्या 126 पर कैसे गिर गई? इन 74 ज़िलों में नक्सलवाद पर काबू क्या साबरमती के किनारे बैठ कर नरेंद्र भाई-अमित भाई की जोड़ी कर रही थी? एक वक़्त था कि पूरे देश में नक्सली आतंक से ‘बहुत ही बुरी तरह प्रभावित’ ज़िलों की तादाद 90 थी। जब नरेंद्र भाई प्रधानमंत्री बने तो इस श्रेणी के ज़िले घट कर 36 रह गए थे। 54 ज़िलों को इतने बदतर हालात से बाहर कांग्रेस नहीं लाई तो कौन लाया था?

मगर दूसरों के किए का श्रेय भी जबरन ख़ुद के बीजक में लिख कर, नाच-गा कर, उस का बिगुल बजा-बजा कर, ही तो भाजपा ने यह सियासी मुक़ाम हासिल किया है। सो, अगर भारत सचमुच ही नक्सल-मुक्त हो गया है तो इस के लिए मिलने वाली मुबारक़बाद में वह किसी और को हिस्सेदारी कैसे करने देगी? इस का उत्सव तो वह ताली-थाली बजा कर अकेले ही मनाएगी। इसलिए यह ज़रूरी है कि वह कांग्रेस को नक्सलवाद का जन्मदाता बताए, कांग्रेस को उस का पालनहार बताए, कांग्रेस और नक्सलियों के बीच सांठगांठ के इल्ज़ाम लगाए और कहे कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी शुरू से वाम-षक्तियों के इषारे पर काम कर रहे हैं। राहुल को देशद्रोही करार दिए बिना नरेंद्र भाई की देशभक्ति का परचम भला कैसे लहराएगा? मेरे जैसे बहुत-से लोग चूंकि यथार्थदर्शी हैं, सो, अमित भाई के सुर-में-सुर मिला कर बेसुरे बनने को तैयार नहीं हैं। बाक़ी का बाक़ी जानें!

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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